Balbir Singh Sr: 15 मार्च साल 1975 की तारीख.. मलेशिया के कुआलालंपुर के मर्डेगा फुटबॉल स्टेडियम में एक इतिहास रचा गया.. भारतीय पुरुषो की हॉकी टीम का मुकाबला पाकिस्तान से हो रहा था.. और ये तारीख कि फिनाले की। भारत ने इस मैच में इतिहास रचते हुए अपने चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 2-1 से हराकर पहली बार हॉकी का विश्व कप खिताब जीता था। ये भारतीय हॉकी के इतिहास में पहला और अब तक आखिरी विश्वकप खिताब था.. लेकिन भारत को ये खिताब दिलाने का श्रैय किसे जाता है.. कौन था इसल जीत का सूत्रधार.. जी हां, इस ऐतिहासिक जीत के पीछे हाथ था तत्कालीन टीम के मैनेजर और मुख्य कोच बलबीर सिंह सीनियर। खिलाड़ियों में पहले ऐसे खिलाड़ी जिन्हें उनके योगदान के लिए पहली बार पद्मश्री पुरुस्कार से नमाजा गया.. जिन्होंने भारत को 3 ओलंपिक पदक दिलाये है.. जिनका रिकॉर्ड आज तक कोई तोड़ नहीं सका.. अपने इस वीडियो में हम बात करेंगे हॉकी विश्वकप की जीत के सूत्रधार बलबीर सिंह सीनियर के बारे में .. जिन्होंने हॉकी को भारत की शान बना दिया था।
जानें कौन है बलबीर सिंह सीनियर?
बलबीर सिंह सीनियर, जिनका असली नाम बलबीर सिंह दोसांझ था, 10 अक्टूबर 1924 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के हरिपुर खालसा में हुआ था। उनके पिता का नाम दलीप सिंह दोसांझ और मां का नाम करम कौर था। दलीप सिंह दोसांझ एक स्वतंत्रता सेनानी थे, जिस कारण बलबीर सिंह सीनियर को बचपन अपने पिता के बिना ही गुजरना पड़ा था। लेकिन उन्होंने अपने पिता के रास्ते पर चलने के बजाये देश के लिए वो करने की ठानी, जो उन्हें एक बड़ी पहचान और सम्मान दिलाये। वहीं पिता के पास न होने के कारण उन्हें ज्यादातर अपने ननिहाल मून गांव में रहना पड़ता था.. जहां 5 साल की उम्र में पहली हार उन्होंने हॉकी स्टिक थामी थी, लेकिन तब तक वो बच्चो के खेल अनुसार ही इसे खेला करते थे लेकिन 12 साल की उम्र में उन्होंने पहली बार भारत की 1936 ओलंपिक हॉकी जीत का समाचार सुना था, इस खेल को लेकर जिस तरह से बखान किया जा रहा था, और खिलाड़ियों को सम्मानित किया जा रहा था, उसे सुनने के बाद बलबीर सिंह ने भी तय कर लिया कि वो भविष्य में हॉकी खिलाड़ी बनेंगे औऱ भारत के लिए खेलेंगे।
शुरुआत में गोलकीपर के रूप में खेले
उनकी स्कूलिंग मोगा के देव समाज हाई स्कूल में हुई थी, जहां वो एक एवरेज छात्र थे.. वो पढ़ाई से ज्यादा हॉकी खेलने पर फोकस करते थे। हालांकि हॉकी में रमे रहने के कारण उन्हें माता पिता से काफी डांट भी सुननी पड़ती थी, लेकिन वो अपना फैसला कर चुके थे। शुरुआत में वो गोलकीपर के रूप में खेलते थे, लेकिन धीरे धीरे उन्हें मौका मिला फुल बैक डिफेंस पॉजीशन पर खेलने का, और जब वो सेंटर फॉरवर्ड स्ट्राइकर बने, तो ये पॉजीसन उन्हें भा गई.. लेकिन जैसा कि पिता को डर था, वो दसवी की परिक्षा में फेल हो गए.. लेकिन पिता ने गुस्सा करने के बजाय उनका दाखिला खेल के कोटे से डीएम कॉलेज मोगा में करा दिया। जहां उनके हॉकी को नई दिशा मिली..इसके बाद उन्होंने सिक नेशनल कॉलेज औऱ फिर अमृतसर के खालसा कॉलेज में दाखिला लिया।
पहली बार पंजाब राज्य टीम में खेलने का मौका मिला
खालसा कॉलेज में हॉकी टीम के कोच हरबैल सिंह ने उनके अंदर की उस आग को पहचाना और उने खेल को और तराशा। वहां वो अपने खेल के दम पर कप्तान चुने गए और तीन बार चैंपियनशिप में जीत दर्ज कराई थी। उनकी प्रतीभा को देखते हुए उन्हें पंजाब राज्य टीम में खेलने का मौका मिला.. और उन्होंने पंजाब को 1946 और 1947 में लगातार दो राष्ट्रीय खिताब दिलाये थे। 1948 में उन्हें पहली बार नेशनल टीम के साथ खेलने का मौका मिला और उन्होंने 1948 के लंदन ओलंपिक में अर्जेंटीना के खिलाफ हुए मैच में हिस्सा लिया.. जिसमें जीत हुई, लेकिन उनकी उपलब्धि में चार चांद तब लगा जब ग्रेट ब्रिटेन के खिलाफ फाइनल भारत ने ब्रिटेन को 4-0 से जीत दिलाई थी। इन 4 गोल में से दो गोल अकेले बलबीर सिंह सीनियल ने दागे थे। इस मैच में भारत में स्वर्ण पदक जीता था। वहीं जब 1952 में ओलंपिक गेम्स हुए तो बलबीर सिंह की परफोर्मेंस ने जो किया उससे सबकी आंखे फटी की फटी रह गई.. नीदरलैंड्स के खिलाफ फाइनल में भारत में 6-1 की जीत में दर्ज की.. जिसमें से 5 गोल अकेले बलबीर सिंह सीनियर ने ही दागे थे।
16 मैचों में भारत की जीत हुई
भारत ने फिर गोल्ड मेडल जीता। वहीं फिर आया 1954 का समय, जब बलबीर सिंह को ने भारतीय हॉकी महासंघ XI टीम की कप्तानी सौंपी गई.. और जैसा कि उम्मीद थी, उन्होंने अपने प्रशंसको को जरा भी निराश नहीं किया। मलाया और सिंगापुर के दौरे में खेले गए सभी 16 मैचों में भारत की जीत हुई। जिसमें बलबीर सिंह ने टीम के लिए 44 गोल दागे थे। फिर 1956 ओलंपिक में वो कुछ समय के लिए चोटिल हो गए लेकिन उन्होंने निराश नहीं किया और सेमिफिनाले और फिनाले में वापसी की, और भारत ने फाइनल में पाकिस्तान को 1-0 से हराया था, और फिर से भारत के पास स्वर्ण पदक आया। ये हैट्रीक बलबीर सिंह सीनियर की ही देन थी। हॉकी में उनके योगदान के लिए उन्हें 1957 में खिलाड़ी के तौर पर पहली बार पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
1982 में उन्हें सदी का सर्वश्रैष्ठ भारतीय खिलाड़ी चुना
1971 में उन्हें हॉकी टीम के बतौर कोच और मैनेजर के तौर पर नियुक्त किया गया, हालांकि भारत ने तब कांस्य पदक जीता था, लेकिन बलबीर सिंह ने हार नहीं मानी,, 1975 में फिर से भारत ने वापसी की और बलबीर सिंह की छत्रछाया में भारत ने पहला विश्व कप जीता। इस जीत के बाद उन्होंने अपनी आत्मकथा द गोल्डन हैट ट्रिक लिखी थी जो कि 1977 में प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा उन्होंने अपनी एक और किताब द गोल्डन यार्डस्टिक: इन क्वेस्ट ऑफ हॉकी एक्सीलेंस भी लिखी थी जो 2008 में प्रकाशित हुई थी। 1982 में उन्हें सदी का सर्वश्रैष्ठ भारतीय खिलाड़ी चुना गया था। साल 2015 में, उन्हें हॉकी इंडिया के मेजर ध्यानचंद लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 25 मई 2020 को बलबीर सिंह सीनियर का 95 साल की उम्र में मोहाली में निधन हो गया था। उनके मरणोपरांत उनकी पहली पुण्यतीथि को 25 मई 2021 को मोहाली अंतर्राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम का नाम बदल कर ओलंपियन बलबीर सिंह सीनियर अंतर्राष्ट्रीय हॉकी स्टेडियम रखा गया। बलबीर सिंह सीनियर का योग भारतीय हॉकी में जितना है उसे शब्दों में कहना बेहद मुश्किल है। उनकी उपलब्धियां से ही आप गर्व से फूल उठते है।












































