Superstar Dilip Kumar: पेशावर का एक साधारण लड़का यूसुफ खान… जो विभाजन का दर्द सीने में छिपाकर बन जाता है भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा शहंशाह। उन्होंने सिर्फ एक्टिंग नहीं की, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सिखाया कि पर्दे पर मोहब्बत, दर्द और देशभक्ति को जिया कैसे जाता है। जब भी अधूरी मोहब्बत का जिक्र होता है, तो देवदास याद आते हैं और जब भी इतिहास की सबसे बड़ी प्रेम कहानी की बात होती है, तो मुगल-ए-आजम का नाम आता है। इन दोनों ही किरदारों के पीछे एक ही चेहरा था, जिसकी असल जिंदगी भी बेइंतहा मोहब्बत, गहरे दर्द से भरी थी। आज बात करेंगे हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार, द ट्रैजेडी किंग—दिलीप कुमार की… जिनके बिना बॉलीवुड के इतिहास की कहानी अधूरी है। विभाजन के थपेड़ों से निकलकर सिनेमा के सिंहासन पर राज करने वाले यूसुफ खान की यह दास्तान, सिर्फ एक अभिनेता की नहीं, बल्कि खुद सिनेमा के इतिहास की कहानी है।
कौन है युसूफ खान
बात है साल 1922 की, जब अविभाजित भारत के पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में लाला गुलाम सरवर खान के घर एक बच्चे ने जन्म लिया, नाम रखा गया यूसुफ खान। लाला गुलाम सरवर खान फल के एक बड़े व्यापारी थे। उनका भरा-पूरा परिवार था और घर में सुख-शांति थी। लेकिन किसे पता था कि पेशावर की तंग गलियों में दौड़ने वाले इस बच्चे की किस्मत में पूरे हिंदुस्तान के दिलों पर राज करना लिखा है।
समय बदला, और 1930 के दशक में काम के सिलसिले में उनका पूरा परिवार पेशावर छोड़कर सपनों के शहर बॉम्बे यानी आज के मुंबई आ गया। मुंबई आने के बाद यूसुफ खान का शुरुआती जीवन आसान नहीं था। पिता के बिजनेस में घाटा होने लगा, जिसके कारण घर की माली हालत बिगड़ने लगी। अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण यूसुफ खान ने पिता की मदद करने की ठानी। घर के हालात को सुधारने के लिए, इस नौजवान ने पुणे की एक मिलिट्री कैंटीन में ड्राई फ्रूट्स बेचने और सैंडविच बनाने का काम शुरू कर दिया।
फिल्मो से आने से पहले कैंटीन में काम
लेकिन किस्मत यूसुफ खान को कैंटीन चलाने के लिए नहीं, बल्कि इतिहास रचने के लिए सिनेमा की दुनिया में ले आई थी। बात है साल 1943 की, जब सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करता था, लेकिन पर्दे पर भावनाओं के रंग सबसे गहरे थे। तब मुंबई के चर्चगेट रेलवे स्टेशन पर इस शर्मीले नौजवान की मुलाकात उस दौर की मशहूर अभिनेत्री और ‘बॉम्बे टॉकीज’ की मालकिन देविका रानी से हुई। देविका रानी ने इस हैंडसम नौजवान में वो चिंगारी देखी, जो आगे चलकर एक अंगारा बनने वाली थी। उन्होंने यूसुफ खान को फिल्मों में काम करने का ऑफर दिया, लेकिन एक शर्त के साथ—कि उन्हें अपना नाम बदलना होगा।
देविका रानी ने उन्हें नाम दिया—’दिलीप कुमार’। और फिर आया साल 1944, जब सिनेमाघरों में रिलीज हुई उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई, लेकिन इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को उसका सबसे चमकीला सितारा दे दिया था।
ट्रैजेडी किंग दिलीप कुमार
शुरुआती असफलताओं के बाद, दिलीप कुमार अपनी पहचान बना ही रहे थे कि साल 1947 आया। यह वो साल था जब देश आजाद तो हुआ, लेकिन अपने साथ विभाजन की वो त्रासदी लाया जिसने करोड़ों दिलों को चीर दिया। दिलीप कुमार का घर, बचपन की यादें और दोस्त सब कुछ सरहद के उस पार पेशावर में छूट चुके थे। विभाजन का यह दर्द, अपनों से बिछड़ने का यह गम यूसुफ खान के दिल में इतनी गहराई तक बैठ गया कि जब वे पर्दे पर आते, तो उनके किरदारों की आँखों में वो उदासी साफ झलकती थी।
इसी गहरे दर्द को उन्होंने अपने अभिनय की ताकत बनाया। मेला, अंदाज और दीदार जैसी फिल्मों में उन्होंने टूटे हुए आशिक और गमजदा किरदारों को इतनी शिद्दत से जिया कि पूरी दुनिया उन्हें ‘ट्रैजेडी किंग’ के नाम से पुकारने लगी। वे कैमरे के सामने इस कदर रोते और तड़पते थे कि सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों के आंसू रुकने का नाम नहीं लेते थे।
मधुबाला और दिलीप कुमार की लव स्टोरी
सिनेमा के पर्दे पर दर्द को जीने वाले दिलीप कुमार की असल जिंदगी में रंगों की एंट्री तब हुई, जब उनकी लाइफ में आईं मधुबाला। साल 1951 में फिल्म ‘तराना’ के सेट पर इन दोनों की मुलाकात हुई। मधुबाला की हँसी और दिलीप कुमार की संजीदगी का यह मिलन सिर्फ पर्दे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि असल जिंदगी में भी दोनों एक-दूसरे की मोहब्बत में पूरी तरह डूब गए। यह उस दौर की सबसे खूबसूरत और चर्चित प्रेम कहानी थी। दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान इस रिश्ते के खिलाफ थे। एक कोर्ट केस के विवाद और पारिवारिक जिद के कारण इस अटूट मोहब्बत में ऐसी दरार पड़ी जो कभी भर नहीं सकी। दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई, रास्ते अलग हो गए। लेकिन त्रासदी देखिए, जब दोनों के रास्ते अलग हुए, ठीक उसी दौरान वे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी प्रेम कहानी ‘मुगल-ए-आजम’ की शूटिंग कर रहे थे। सेट पर दोनों एक-दूसरे से बात तक नहीं करते थे, लेकिन जब कैमरे के सामने आते, तो शहजादा सलीम और अनारकली बनकर मोहब्बत का वो इतिहास रच देते, जिसे आज भी दुनिया सलाम करती है। दिलीप साहब का यह अधूरा प्यार उनकी जिंदगी का वो सबसे गहरा घाव बन गया, जिसने उन्हें असल जिंदगी का ‘देवदास’ बना दिया।
जब दिलीप कुमार ने की थी सायरा बानो से शादी
अधूरी मोहब्बत के इस गहरे दर्द से उबरने और खुद को संभालने में दिलीप साहब को लंबा वक्त लगा। लेकिन एक लेजेंड कभी हार नहीं मानता। साल 1966 में उनकी जिंदगी में एक नया सवेरा हुआ, जब उन्होंने खुद से 22 साल छोटी अभिनेत्री सायरा बानो से शादी की। सायरा जी ने दिलीप कुमार को सिर्फ अपना जीवनसाथी नहीं माना, बल्कि उनके आखिरी पलों तक एक साए की तरह उनकी सेवा की और उनकी जिंदगी को खुशियों से भर दिया।
इसके बाद शुरू हुआ यूसुफ खान के ‘महानायक’ यानी एक सच्चे लेजेंड बनने का सफर।
दिलीप कुमार भारत के पहले ‘मेथड एक्टर’ (Method Actor) बने, जिन्होंने अभिनय की एक ऐसी नई परिभाषा लिखी जिससे आगे चलकर अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख़ खान तक, हर अभिनेता ने एक्टिंग सीखी। नया दौर, गंगा जमुना, क्रांति, विधाता, और सौदागर जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने साबित कर दिया कि दौर चाहे ब्लैक एंड व्हाइट का हो या रंगीन सिनेमा का, इस सिंहासन का राजा सिर्फ एक ही रहेगा।
सिनेमा में उनके इस ऐतिहासिक योगदान के लिए उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े पुरस्कार ‘दादा साहब फाल्के’ और देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया। दिलीप कुमार सिर्फ एक नाम या एक अभिनेता नहीं हैं, वे भारतीय सिनेमा का वो सुनहरा अध्याय हैं जो सदियों तक आने वाले कलाकारों का मार्गदर्शन करता रहेगा। तो यह था पेशावर के यूसुफ खान से लेकर हिंदुस्तान के दिलों पर राज करने वाले शहंशाह दिलीप कुमार का वो सफर, जो विभाजन के दर्द, अधूरी मोहब्बत और बेमिसाल कामयाबी की दास्तान बयां करता है।































