Trains Generate Electricity: क्या आपने कभी सोचा है कि जब एक भारी-भरकम ट्रेन पटरी से गुजरती है, तो वो कितनी ऊर्जा बर्बाद करती है? लेकिन ट्रेनों से बिजली खाने का दौर अब पुराना होने जा रहा है। विज्ञान और तकनीक की दुनिया से एक ऐसी क्रांतिकारी खबर आई है, जो भारतीय रेलवे और एनर्जी सेक्टर की तस्वीर बदल सकती है।
अब पटरियों पर दौड़ती ट्रेनों की थरथराहट से करंट पैदा होगा, जिससे रेलवे खुद अपनी बिजली बनाने में सक्षम हो सकेगा। वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई तकनीक तैयार की है जो पटरियों के कंपन (Vibration) को सीधे बिजली में बदल देगी। तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं कि यह पूरी तकनीक कैसे काम करती है।
यह तकनीक कैसे काम करती है?
यह नई तकनीक मुख्य रूप से पाइज़ोइलेक्ट्रिक इफ़ेक्ट (Piezoelectric Effect) और इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम (Electro-Mechanical System) पर काम करती है। इसका आसान मतलब यह है कि जब भी पटरियों पर दबाव या कंपन (Vibration) होता है, तो यह सिस्टम उस फिजिकल मूवमेंट को करंट में बदल देता है।
जब एक भारी-भरकम ट्रेन (जिसका वजन सैकड़ों टन होता है) पटरी से गुजरती है, तो पटरियों पर दो तरह की चीजें होती हैं। पहियों के भारी दबाव से पटरी हल्की सी नीचे दबती है और फिर ऊपर आती है। ट्रेन की स्पीड के कारण पटरियों में बहुत तेज़ कंपन होता है। इस तकनीक के तहत, पटरियों के नीचे या उनके स्लीपर्स (Sleepers) के पास खास सेंसर्स, जनरेटर या पाइज़ोइलेक्ट्रिक मटीरियल फिट किए जाते हैं।
73% मैकेनिकल एफिशिएंसी के साथ काम करता है सिस्टम
कंपन से सीधे बड़ी बिजली नहीं बनाई जा सकती, इसलिए वैज्ञानिक एक इलेक्ट्रो-हाइड्रोलिक या गियर मैकेनिज्म (Electro-hydraulic / Gear Mechanism) का इस्तेमाल करते हैं। जैसे ही पटरी नीचे दबती है, यह सिस्टम उस सीधे (Linear) दबाव को सोख लेता है। एक खास वन-वे क्लच (One-way Clutch) और गियर सिस्टम इस ऊपर-नीचे होने वाले मूवमेंट को एकतरफा घूमने वाली गति (Rotational Motion) में बदल देता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे आप साइकिल के पैडल को आगे-पीछे करें, लेकिन साइकिल का पहिया सिर्फ आगे की तरफ ही घूमता है।
यह घूमती हुई गति (Rotational Motion) एक छोटे लेकिन बेहद कुशल मैग्नेटिक जनरेटर (Magnetic Generator) से जुड़ी होती है। जब जनरेटर के अंदर का हिस्सा तेज़ी से घूमता है, तो मैग्नेटिक फील्ड (Magnetic Field) बदलने के कारण बिजली (Current) पैदा होती है। हालिया रिसर्च के मुताबिक, यह सिस्टम 73% से ज़्यादा की मैकेनिकल एफिशिएंसी के साथ काम करता है, यानी पटरियों के हिलने से पैदा हुई ज़्यादातर ऊर्जा को यह बिजली में बदल देता है।
चौबीसों घंटे चालू रखा जा सकेगा रेलवे Signals
यह तकनीक सिर्फ तभी बिजली नहीं देती जब ट्रेन ऊपर से गुजर रही हो। ट्रेन के गुजरने पर जो भारी मात्रा में करंट पैदा होता है, उसे पटरियों के किनारे लगे एडवांस बैटरी बैंक (Supercapacitors or Lithium Batteries) में स्टोर कर लिया जाता है। जब ट्रैक खाली होता है (यानी कोई ट्रेन नहीं गुजर रही होती), तब रेलवे के सेंसर्स और सिग्नल्स इसी स्टोर की हुई बैटरी पावर से 24 घंटे लगातार चलते रहते हैं।
भारत जैसे देश में, कई मुख्य रेलवे रूट्स (जैसे दिल्ली-मुंबई या दिल्ली-हावड़ा) और मेट्रो लाइन्स पर हर 10 से 15 मिनट में ट्रेनें गुजरती हैं। इतने व्यस्त रूट्स पर पटरियों को आराम ही नहीं मिलता। वहां यह सिस्टम लगातार चार्ज होता रहता है, जिससे बिजली की सप्लाई में एक सेकंड का भी गैप नहीं आता।
सौर ऊर्जा (Solar Energy) की तरह यह तकनीक धूप पर निर्भर नहीं है, इसलिए रात के समय या भारी बारिश और कोहरे में भी यह उतनी ही बिजली बनाएगी जितनी दिन में। जब तक ट्रेनें चलेंगी, चाहे दिन हो या रात, पटरियों में थरथराहट होगी और बिजली बनती रहेगी।












































