Meerut court death penalty: उत्तर प्रदेश के मेरठ की जिला अदालत ने बीते 48 घंटों में दो बेहद चर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाले हत्याकांडों में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कुल 4 दोषियों को फांसी (मौत की सजा) का हुक्म दिया है। पहले मामले में चर्चित ‘नीले ड्रम हत्याकांड’ में अपने पति सौरभ राजपूत की हत्या करने वाली पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को फांसी सुनाई गई। वहीं इसके ठीक बाद, अमित कश्यप हत्याकांड में कोर्ट ने उसकी पत्नी रविता और उसके प्रेमी अमरदीप को भी मौत की सजा दी। इन दोनों पर आरोप था कि इन्होंने अमित की गला घोंटकर हत्या की और मामले को सांप के काटने से हुई मौत साबित करने की पूरी साजिश रची थी।
महज दो दिनों के भीतर चार मुजरिमों को फांसी की सजा मिलने के बाद देश में एक बार फिर कैपिटल पनिशमेंट यानी मौत की सजा और न्यायपालिका के रुख को लेकर बहस छिड़ गई है।
‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ का सिद्धांत: सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस क्या कहती हैं? Meerut court death penalty
भारत में किसी भी दोषी को फांसी देना आसान नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने 1980 के ऐतिहासिक ‘बचन सिंह बनाम पंजाब सरकार’ मामले में साफ कर दिया था कि मौत की सजा सिर्फ ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभ से दुर्लभतम) मामलों में ही दी जा सकती है। देश के कानून के मुताबिक उम्रकैद ही सामान्य सजा है और फांसी अपवाद है। इसके लिए अदालतें 5 प्रमुख कसौटियों पर मामले को परखती हैं:
- अपराध की गंभीरता: कत्ल किस बेरहमी, प्लानिंग और मकसद के साथ किया गया।
- दोषी की पृष्ठभूमि: उसकी उम्र, पारिवारिक स्थिति और सामाजिक परिवेश कैसा है।
- सुधरने की गुंजाइश: क्या दोषी जेल में रहकर सुधर सकता है और कभी समाज का हिस्सा बन सकता है? अगर सुधार की जरा भी उम्मीद है, तो फांसी नहीं दी जा सकती।
- दोनों पक्षों का संतुलन: अपराध को गंभीर बनाने वाले कारकों के साथ-साथ दोषी के पक्ष में जाने वाली बातों (मिटिगेटिंग फैक्टर्स) को भी तोला जाता है।
- उम्रकैद का विकल्प नाकाफी होना: जब अदालत यह तय कर ले कि उम्रकैद की सजा समाज और न्याय के लिहाज से बेहद कम है, तभी फांसी की सजा मुकर्रर होती है।
जिला अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक: 10 साल के आंकड़े क्या बताते हैं?
आंकड़ों पर गौर करें तो ट्रायल कोर्ट (जिला अदालतें) फांसी की सजा सुनाने में जितनी सख्त दिखती हैं, ऊपरी अदालतों तक पहुंचते-पहुंचते तस्वीर उतनी ही बदल जाती है:
- सेशन कोर्ट: बीते 10 वर्षों में देशभर की जिला अदालतों ने कुल 1,310 दोषियों को फांसी की सजा सुनाई।
- हाईकोर्ट का रुख: हाईकोर्ट ने इस दौरान 842 मामलों पर फैसला दिया, लेकिन केवल 70 मामलों (करीब 8.31%) में ही मौत की सजा को बरकरार रखा। 411 मामलों में फांसी को उम्रकैद में बदल दिया गया, जबकि 285 मामलों में तो आरोपियों को बरी ही कर दिया गया।
- सुप्रीम कोर्ट का रिकॉर्ड: सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 10 सालों में मौत की सजा के 153 मामलों पर विचार किया और केवल 19 मामलों (करीब 12.41%) में फांसी बरकरार रखी। 71 मामलों में शीर्ष अदालत ने इसे अन्य सजा में बदल दिया।
गौर करने वाली बात यह भी है कि पिछले 3 वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने किसी भी मामले में मौत की सजा की पुष्टि नहीं की है। साल 2020 में निर्भया कांड के दोषियों को फांसी पर लटकाए जाने के बाद से देश में किसी भी कैदी को फांसी नहीं दी गई है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता की तल्ख टिप्पणी
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपांकर दत्ता ने फांसी की सजा को लगातार उम्रकैद में बदलने के चलन पर गहरी चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि जघन्य अपराधों में नरमी बरतने की भी एक तय सीमा होनी चाहिए। अब मेरठ कोर्ट के इन दोहरे फैसलों ने फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या ऊपरी अदालतों में इन चारों दोषियों की फांसी बरकरार रह पाएगी या फिर आंकड़ों के मुताबिक यह भी उम्रकैद में बदल जाएगी।













































