Bhagat singh: जब बात बहादुरी की हो, अपनी जान की बाजी लगाने की हो किसी भी राज्य, किसी भी धर्म के योद्धा होगा, उनकी बहादुरी की तुलना किसी दूसरे से नहीं की जा सकती है। मराठा हो, या मारवाड़ हो, चोल हो या सिख लड़ाके, सबने अपनी अपनी धरती को बचाने की लड़ाई लड़ी है। लेकिन इसमें सबसे ज्यादा बलिदान जिन्होंने दिया वह थे सिख लड़ाके। उन्होंने भारत के द्वारा पर रहने की सबसे ज्यादा कीमत चुकाई। केवल मुगलों अफगानों और ईरानी फौज का ही सामना नहीं किया बल्कि उनलोगों ने ब्रिटिश हुकूमत की जड़े खोदने में भी अहम भूमिका निभाई। शहीद भगत सिंह हो या करतार सराभा, इन्होंने भारत को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए जो लड़ाई लड़ी वो हमेशा सुनहरा पन्नों में लिखी जाएगी। विडंबना ये है कि शहीद भगत सिंह के बलिदान को हम सभी सलाम करते है, लेकिन खुद भगत सिंह जिन्हें अपना आदर्श मानते थे, उन्हें भुला दिया गया। जी हां हम बात कर रहे है करतार सिंह सराभा के बारे में, जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने मात्र 19 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिया था। अपने इस लेख के हम करतार सिंह सराभा के उस बलिदान के बारे में जानेंगे जिसने उनके नाम को हमेशा के लिए अमर कर दिया।
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पंजाब के वीर और क्रांतिकारी योद्धाओं
1849 में ब्रिटिश हुकुमन ने पूर्ण अधिकार कर लिया तब पंजाब के सिख दो धड़े में बट गये। एक वो जो ब्रिटिश सैना के लिए लड़ने को तैयार हुए तो वहीं दूसरा धड़ा अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ आजादी की लड़ाई में खड़ा था। अंग्रेजों ने सिखों को ही सिखों का दुश्मन बना दिया था,, एक तरफ वो उनके साथ मिलकर जुलकर रहने वाले सिखों को पूरा सपोर्ट करते थे तो वहीं जो उनके खिलाफ आवाज उठाता, उन्हें दबाने के लिए वो किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे। जिसके लिए बच्चों से लेकर बूढ़ों तक का नरसंहार ही क्यों न करना पड़ा। पंजाब के वीर और क्रांतिकारी योद्धाओं में शहीदे आजम भगत सिंह का नाम बड़े शान से लिया जाता है. लेकिन क्या आप जानते है कि भगत सिंह 19 साल की उम्र में हंसते हंसते देश के लिए फांसी पर चढ़ने वाले करतार सिंह सराभा को अपना आदर्श मानते थे।
सैन फ्रांसिस्को अमेरिका यूनिवर्सिटी ऑफ
करतार सिंह सराभा, जिनका जन्म 24 मई 1896 पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम सरदार मंगल सिंह ग्रेवाल और माता का नाम साहिब कौर था.. जब वो काफी छोटे थे तभी उनके पिता की मौत गई थी, जिस कारण उनके दादा जी ने ही उन्हें पाला था। उनका परिवार पंजाब के बजाय ओडिशा के कटक में रहता था जहां उन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी कर 1912 में हाई एजुकेशन के लिए सैन फ्रांसिस्को अमेरिका यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफ़ोर्निया, बर्कले में दाखिला लिया। एक संपन्न परिवार से होने के कारण उन्हें कभी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा था लेकिन जब वो अमेरिका पहुंचे तो उन्हें पहली बार भारत के गुलाम होने का अहसास हुआ। वहां भारतीय होने के कारण उन्हें और उनके साथ के तमाम भारतीय को बेज्जत किया गया। करतार सिंह सराभा उस वक्त 16 साल के थे, लेकिन इस भेदभाव और अपमान ने उनके दिल में एक चिंगारी जला दी थी। उन्होंने तय़ कर लिय़ा था कि वो भारत को इस अपमान की बेड़ियों से निकाल कर रहेंगे।
गदर नामक समाचार पत्र
इस दौरान उनकी मुलाकात अमेरिका में महान क्रांतिकारी लाला हरदयाल और बाबा सोहन सिंह भकना से हुई.. और उन्होंने 1913 में गदर पार्टी की स्थापना की।, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गदर आंदोलन शुरु किया। करतार सिंह सराभा पहले से ही भेदभाव से काफी कुपित थे, उन्होंने बेहद सक्रियता से गदर आंदोलन को आगे बढ़ाना का जिम्मा अपने कंधे पर ले लिया। उनका जोश देखकर सभी हैरान रह जाते थे। इतना ही नहीं उन्होंने गदर आंदोलन को वैश्विक तौर पर मजबूत बनाने और सभी देशों में सिखो तक अपना संदेश पहुंचाने के लिए गदर’ नामक समाचार पत्र के पंजाबी संस्करण के संपादन किया करते थे। उनकी रचनाओं ने उनकी क्रांति की आग क भटकाने में अहम भूमिका निभाई .. लोग उनसे जुड़ने लगे.. लेकिन जब 1914 में पहला विश्वयुद्ध शुरु हुआ तो ब्रिटिश हुकुमत की स्थिति को देखते हुए 1915 का सशस्त्र सैन्य विद्रोह करने के इरादे से वो भारत लौट आये। उनके साथ अनेको क्रांतिकारी भी भारत आये थे.. उन्होंने भारत के युवाओं को भी एकजुट करना शुरु कर दिया था।
ब्रिटिश हुकुमत को भारत से खदेड़ना
जो भारत को आजाद कराने का बेहतरीन अवसर था, इस कारण उन्होंने 21 फरवरी 1915 को एक साथ सभी ब्रिटिश छावनियों पर हमला करने की य़ोजना बनाई.. लेकिन कहते है न कि घर का भेदी लंका ढायें.. गदर पार्टी में कृपाल सिंह नाम का शख्स था, जो कि अंग्रेजो का मुखबिर बन गया, और गदर पार्टी की योजना की खबर पहले ही अंग्रेजो तक पहुंचा दी थी। अंग्रेज पहले ही विद्रोह के लिए तैयार थे जिस कारण हमला असफल हो गया, और अंत में उन्हें सरगोधा (अब पाकिस्तान में है) से गिरफ्तार कर लिया गया । उनपर लाहौर कोर्ट में मुकदमा चला, जहां उन्होंने सीधे तौर पर स्वीकार किया कि वो ब्रिटिश हुकुमत को भारत से खदेड़ना चाहते है। उनी निडरता ने जज को भी अचंभित कर दिया था। लेकिन वो सजा से नहीं बच सकें। 16 नवंबर 1915 को लाहौर सेंट्रल जेल में मात्र 19 साल की छोटी सी उम्र में उन्हें फांसी दे दी गई.. मरने से पहले उन्होंने अपने दादाजी से मुस्कुरा कर कहा था कि वो देश के लिए मरे है, इसिलए उन्हें हमेशा याद रखा जायेगा, वो इतिहास बन कर हमेशा जीवित रहेंगे। सराभा की बहादुरी और उनके बलिदान ने सरदार भगत सिंह को इतना प्रभावित किया था कि वो उनकी एक तस्वीर हमेशा अपनी जेब में रखते थे। भगत सिंह सराभा को अपनी हीरो और साथी मानते थे। एक 19 साल का युवा, जिसके आंखो में सुनहरे भविष्य के सपने होते है, लेकिन सराभा ने अपनी जिंदगी देश के नाम न्यौछावर कर दिया।












































