Bengal syllabus: भाषा, इतिहास और राजनीति एक बार फिर पश्चिम बंगाल के क्लासरूम में आमने-सामने हैं। राज्य की नवनिर्वाचित सरकार द्वारा गठित पाठ्यक्रम समीक्षा समिति ने कक्षा 1 से 10 तक की पाठ्यपुस्तकों में एक व्यापक बदलाव का प्रस्ताव रखा है। किताबों में आम बोलचाल के शब्दों जैसे ‘पानी’, ‘अब्बा’ और ‘अम्मी’ को हटाकर पारंपरिक बंगाली शब्द ‘जल’, ‘बाबा’ और ‘मां’ शामिल करने की यह सिफारिश राज्य की सांस्कृतिक पहचान और धरोहर को लेकर एक नई बहस को जन्म दे रही है। सवाल है कि क्या इस बदलाव के बाद राज्य में सियासत का पारा चढ़ेगा? तो चलिए इस लेख के ज़रिए जानते हैं कि क्या है यह पूरा मामला।
क्या है पूरा मामला
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पूरे मामले की जड़ें पश्चिम बंगाल की नवनिर्वाचित शुभेंदु अधिकारी सरकार (भाजपा) द्वारा राज्य की शिक्षा व्यवस्था में किए जा रहे व्यापक बदलावों से जुड़ी हैं। सरकार ने स्कूलों के पुराने पाठ्यक्रम (Syllabus) और किताबों की समीक्षा करने के लिए कल्याणी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर देबाशीष चटर्जी की अध्यक्षता में एक ‘पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक समीक्षा समिति’ का गठन किया था।
समिति का तर्क है कि सरकारी स्कूलों की बांग्ला पाठ्यपुस्तकों में कई ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जो मूल बांग्ला संस्कृति या आम बोलचाल का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि फारसी और अरबी मूल के हैं। इसलिए, किताबों की भाषा को ‘शुद्ध और पारंपरिक बंगाली’ रूप देने के लिए इन बदलावों का प्रस्ताव है:
• ‘पानी’ की जगह ‘जल’।
• ‘अब्बा’ और ‘अम्मी’ की जगह ‘बाबा’ और ‘मां’।
• ‘आसमान’ की जगह ‘आकाश’, ‘किताब’ की जगह ‘पुस्तक’, और ‘दोस्त’ की जगह ‘मित्र’।
इतिहास और राजनीति के अध्यायों में फेरबदल
पाठ्यक्रम और पाठ्यपुस्तक समीक्षा समिति का मानना है कि वर्तमान पाठ्यक्रम एक विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित रहा है, जिसे संतुलित करना ज़रूरी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसके तहत निम्नलिखित बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा गया है।
• इतिहास के अध्यायों में कटौती: पाठ्यक्रम में मुगल साम्राज्य के इतिहास, ब्रिटिश औपनिवेशिक काल और मार्क्सवादी (वामपंथी) विचारधारा से जुड़े अध्यायों के हिस्सों को काफी कम (Reduce) किया जा रहा है।
• राष्ट्रवादी नायकों और ऐतिहासिक कृतियों को जगह: भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, देशभक्ति और राष्ट्र-निर्माण में उनके योगदान को सभी कक्षाओं की किताबों में प्रमुखता से जोड़ा जाएगा।
इसके अलावा, छत्रपति शिवाजी महाराज की स्मृति में रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘शिवाजी उत्सव’ और द्विजेंद्रलाल रॉय के नाटक ‘मेवाड़ पतन’ (जो मुगलों के खिलाफ मेवाड़ के संघर्ष पर आधारित है) को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है।
• पिछली सरकार की योजनाओं व अध्यायों को हटाना: तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के कार्यकाल के दौरान जोड़े गए सिंगूर भूमि आंदोलन (कक्षा 8) और ‘कन्याश्री योजना’ (कक्षा 6) से जुड़े पाठों को अब हटाया जा रहा है।
इसके साथ ही, रवींद्रनाथ टैगोर की कविता ‘अफ्रीका’ और सिराजुद्दौला पर आधारित नाटक को भी पाठ्यक्रम से बाहर करने का प्रस्ताव है।
विपक्ष का आरोप
तृणमूल कांग्रेस (TMC) और वामपंथी दलों (Left Front) के नेताओं का आरोप है कि इतिहास के पन्नों से मुगल शासन और मार्क्सवादी विचारधारा को कम करना और ‘पानी’ या ‘अब्बा’ जैसे शब्दों को हटाना एक खास राजनीतिक विचारधारा को थोपने का प्रयास है। विपक्ष इसे “सांस्कृतिक शुद्धिकरण” की कोशिश करार दे रहा है।
सरकार और बीजेपी का रुख
सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के समर्थकों का तर्क है कि यह कोई राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक सुधार है। उनका कहना है कि स्कूली बच्चों को वह बंगाली भाषा सिखानी चाहिए जो पश्चिम बंगाल की आम बोलचाल और संस्कृति का हिस्सा है। साथ ही, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बंगाल के महान सपूत और राखीगढ़ी जैसी भारतीय खोजों को पाठ्यक्रम में शामिल करना छात्रों को अपनी वास्तविक जड़ों से जोड़ेगा।













































