Gold मेडल जीतने वाला देश का हीरो, आख़िर गुमनामी में क्यों मरा? | Parduman Singh Brar

Shikha Mishra | Nedrick News Published: 28 अक्टूबर 2026, 10:52 PM Updated: 28 अक्टूबर 2026, 10:58 PM
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Parduman Singh Brar: पदक चाहे कोई भी.. जीतने वाले की मेहनत दिखती है। खिलाड़ी कोई भी हो, वो देश के मेडल जीतने का सपना देखते है.. और जब कोई अकेला खिलाड़ी एक साथ एक ही टूर्नामेंट में 2-2 गोल्ड मेडल जीते, कुछ 5 पदक जीते तो उस खिलाड़ी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाता है, ऐसे ही खिलाड़ी दूसरें खिलाड़ीयो के लिए प्रेरणा बनता है..जो उदाहरण बनते है कि हौसले और मेहनत से असंभव को भी संभव किया जा सकता है.. कुछ ऐसा ही असंभव काम कर दिखाया था शॉट पुट और डिस्कस थ्रो के महान खिलाड़ी परदुमन सिंह बराड़। लेकिन दुख की बात तो ये है कि एक महान खिलाड़ी के अंतिम समय में उन्हें गुमनामी से जीता पड़ा। अपने इस लेख में हम परदुमन सिंह बराड़ के बारे में जानेंगे। कैसे बने थे वो एक महान खिलाड़ी. और क्यों अंत में वो सबसे अकेले रहे थे।

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जानें कौन है परदुमन सिंह बराड़

15 अक्टूबर 1927 को पंजाब के बठिंडा जिले में भगता भाई का नाम के गाव में एक सिख परिवार में जन्में परदुमन सिंह बरार एक किसान पिता की संतान थे। हालांकि किसान परिवार से होने के बाद भी उनके घर का माहौल काफी अच्छा था। एक अच्छी खासी 6 फीट से ज्यादा की उनकी कद काठी थी, वहीं स्कूल के दिनो में उनके शारीरिक बनावट को देखकर उन्हें टीचर ने एथलीट बनने की सलाह दी थी।

जिसके लिए उनके घरवालो ने भी समर्थन किया। वो स्कूल के स्पार्धाओं में हिस्सा लेने लगे, और उनकी रूचि फील्ड इवेंट्स में होने लगी थी। अपने स्पोर्टेस स्पिरिट के कारण ही उन्हें जल्द ही भारतीय फौज में जवान बनने का मौका मिला, जहां इंडियन आर्मी में हॉडसन हॉर्स रेजिमेंट के ऑनरेरी कैप्टन के तौर पर सेवा करने का मौका मिला, वहीं उन्होंने अपने एथलीट बनने के सपने को छोड़ने के बजाय परदुमन बरार सर्विसेज़ स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड (SSCB) से जुड़ गए।

जहां उन्हें न केवल स्ट्रक्चर्ड ट्रेनिंग फैसिलिटी मिली बल्कि बेहतरीन कोच से कोचिंग और नेशनल लेवल को खेलने का भी एक्सपीरियंस मिला। वो इस दौरान दिल्ली और बैंगलोर जैसे महानगरो में लगने वाले आर्मी कैंप में वेट ट्रेनिंग और टेक्निक ड्रिल  का हिस्सा हुआ करते थे। वो बेहद ताकतवर थे, जिस कारण शॉट पुट और डिस्कस थ्रो में स्पेशलाइज़ेशन करने का मौका मिला। फील्ड एथलेटिक्स  में पारंगत होने के लिए उन्होंने ट्रेनिंग कोर स्टेबिलिटी और रोटेशनल पावर बनाने पर ध्यान दिया, और अपने नैचुरल थ्रोइंग मोशन  को खेल के हिसाब के स्टैंडर्ड टेक्नीक के बरबारी में ले कर आये।

1950 में पहली बार प्रतीभा दिखाने का मौका मिला

साल 1950 में उन्हें पहली बार अपनी प्रतीभा दिखाने का मौका मिला और नेशनल लेवल पर शॉट पुट और डिस्कस थ्रो इवेंट्स में उन्होंने कई मेडल जीत कर अपना दबदबा बनाये रखा था। 1954 में उन्हें कनाडा के वैंकूवर में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत को रिप्रेजेंट करने का मौका मिला था जहां वो दसवें स्थान पर थे। लेकिन उसी साल मनीला के एशियाई खेल में शॉट पुट और डिस्कस थ्रो में बरार ने कमाल कर दिया था। उन्होंने  14.14 मीटर  का शॉटपुट और डिस्कस थ्रो में 43.37 मीटर के साथ दोनो ही खेल में अपनी प्रतीभा का लोहा मनवाते हुए दोनो खेल में गोल्ड हासिल किया था। किसी एक टूर्नेंट में एक ही खिलाड़ी ने दो खेल में गोल्ड जीता हो, ऐसा पहली बार हुई था। परदुमन उस दौर के सबसे ताकतवर थ्रोअल कहलाने लगे थे।

जकार्ता में एशियन गेम्स में हिस्सा

1958 में टोक्यो में हुए एशियन गेम्स में भी बरार ने अपना जादू कायम रखा और 15.04 मीटर की दूरी तय करके गोल्ड मेडल जीता, हालांकि डिस्कस थ्रो में 45.67 मीटर के मार्क किया जिससे उन्हें कांस्य पदक मिला था। इसके बाद उन्होंने 1962 में जकार्ता में एशियन गेम्स में हिस्सा लिया था, यहां भी उन्होंने डिस्कस थ्रो में सिल्वर मेडल जीता था। एशियन गेम्स में उन्होंने अकेले ही 5 मेडल जीते थे। ये उनका अंतिम गेम था, वो एथलीट होने के साथ साथ फौजी की जिम्मेदारी भी बखूबी निभा रहे थे।

1962 के बाद करीब 35 साल की उम्र में उन्होंने एथलेटिक्स से सन्यास ले लिया और फौज की नौकरी संभालने लगे, लेकिन हैरानी की बात ये है कि उन दिन खिलाड़ियों के प्रति सरकार की उदासिनता के कारण 5-5 मेडल जीतने के बाद भी उनकी आर्थिक स्थिति कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी। 1980 की शुरुआत में वो एक दुर्घनता का शिकार हो गये थे, जिससे उन्हें पैरालाइज को होकर घर बैठना पड़ा.. लेकिन मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुई, परदुमन अपने पैतृक गांव में रहने लगे.. मगर एक महान खिलाड़ी की सुध लेने की फिक्र किसी को नहीं हुई।

वो किसी तरह से गुजारा कर रहे थे.. वहीं 1999 में जाकर सरकार को उनकी याद आई और उन्हें अर्जुन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन ये अवार्ड उनके किसी काम नहीं आया। उनकी आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी और पैसे की तंगी और लंबी बिमारी के बाद, 22 मार्च 2007 को 79 साल की उम्र में उनका देहांत हो गया था। ये बहुत दुख की बात है कि एक महान खिलाड़ी को पैसे की तंगी के कारण इतना बुरी समय देखना पड़ा.. जो उस समय में खिलाड़ियो के प्रति सरकार की उदासीनता का उदाहरण है। परदुमन सिह बरार को भले ही सरकार ने नजरअंदाज किया हो लेकिन खेल जगत के लिए उनके जैसा कोई दूसरा नहीं हुआ। उनके बराबरी में पहुंचना ही हर खिलाड़ी की सपना है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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