Akhilesh Yadav poster war controversy: उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावी शंखनाद से पहले ही राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल शुरू हो चुका है। नेताओं की जुबानी जंग आगे बढ़कर अब यह लड़ाई पोस्टर वार तक पहुंच गई है। सूबे के 15 जिलों में रातों-रात समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के खिलाफ अज्ञात लोगों द्वारा लगाए गए तीखे और तंज भरे पोस्टरों ने राज्य की राजनीति में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आखिर इन पोस्टरों के पीछे कौन है और क्यों लिखा गया है कि ‘सपाइयों का क्या भरोसा’? आइए इस लेख के जरिए जानते हैं ।
किन-किन जिलों में लगे पोस्टर
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश के जिन 15 जिलों में यह विवादित पोस्टर वार छिड़ा है, उनमें राज्य के प्रमुख शहर और राजनीतिक केंद्र शामिल हैं। 23 अक्टूबर 2026 की सुबह जब लोग सोकर उठे, तो इन जिलों के मुख्य चौराहों, सरकारी दफ्तरों के बाहर और सार्वजनिक दीवारों पर समाजवादी पार्टी (सपा) के खिलाफ तीखे तंज कसते हुए सैकड़ों पोस्टर चिपके मिले। यह पोस्टरबाजी मुख्य रूप से लखनऊ के साथ-साथ पूर्वांचल और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन प्रमुख जिलों में देखी गई है:
1. लखनऊ (सूबे की राजधानी)
2. बलिया
3. मऊ
4. गाजीपुर
5. आजमगढ़
6. वाराणसी (प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र)
7. बस्ती
8. हरदोई
9. सीतापुर
10. मुजफ्फरनगर (दंगों के जिक्र वाले विशेष पोस्टर)
11. सहारनपुर
12. शामली
13. अलीगढ़
14. गोरखपुर
15. प्रयागराज
रातों-रात क्या और कैसे हुआ? ( Akhilesh Yadav poster war controversy)
यह पूरी घटना किसी बड़ी और सोची-समझी योजना (Well-coordinated Operation) की तरह अंजाम दी गई। 22 अक्टूबर की देर रात और 23 अक्टूबर की सुबह के अंधेरे का फायदा उठाकर अज्ञात टोलियों ने इन शहरों के वीआईपी इलाकों और व्यस्त चौराहों को निशाना बनाया।
सभी 15 जिलों में लगभग एक ही समय तड़के 2 से 4 बजे के बीच इन भारी-भरकम होर्डिंग्स और पोस्टरों को लगा दिया गया। सुबह जब पुलिस और स्थानीय प्रशासन को भनक लगी, तब तक ये हर तरफ नजर आने लगे थे।
पोस्टरों में क्या-क्या लगाए गए हैं आरोप?
इन विवादित पोस्टरों में समाजवादी पार्टी (सपा) के इतिहास, नीतियों और उनके पिछले शासनकाल को लेकर बेहद तीखे और तंज भरे नारे लिखे गए हैं। पोस्टरों में सपा प्रमुख अखिलेश यादव की सफेद टोपी वाली तस्वीर के साथ कई विवादित मुद्दों को जोड़ा गया है। इन पोस्टरों में मुख्य रूप से निम्नलिखित आरोप लगाए गए हैं:
• माफियाओं से साठगांठ का आरोप: पोस्टरों पर अखिलेश यादव की तस्वीर के साथ पूर्वांचल के दिवंगत माफिया अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी और वरिष्ठ सपा नेता आजम खान की तस्वीरें लगाई गई हैं। इस पर नारा लिखा है— “सपाइयों का क्या भरोसा — चाय, समोसा, रस मलाई, सारे माफिया अपने भाई”।
• तुष्टीकरण और दंगों पर निशाना: समाजवादी पार्टी के शासनकाल के दौरान हुए मुजफ्फरनगर दंगों और पूर्व सरकार की नीतियों पर निशाना साधते हुए लिखा गया है— “दंगा, इफ्तार और बिरयानी, सपा राज की असल कहानी”। इसके अलावा कब्रिस्तान की बाउंड्री निर्माण के बजट पर तंज कसते हुए लिखा गया— “खैनी और बनारसी पान — बजट गया कब्रिस्तान”।
• जातिवाद और भर्ती परीक्षा में धांधली का आरोप: वर्ष 2013 की UPPCS भर्ती परीक्षा का जिक्र करते हुए आरोप लगाया गया है कि तब 86 में से 56 पदों पर एक विशेष जाति के लोगों की भर्ती हुई थी। इसके लिए नारा दिया गया— “रसगुल्ला और रस मलाई — सत्ता एक जाति की मलाई”।
• परिवारवाद पर तीखा हमला: अखिलेश यादव और डिंपल यादव की तस्वीरों वाले पोस्टरों के जरिए पार्टी के नेतृत्व और परिवारवाद पर निशाना साधते हुए लिखा गया है— “दाल, चावल और अचार — पार्टी मतलब एक परिवार”।
• अखिलेश यादव की तुलना गिरगिट से: एक अन्य विवादित पोस्टर में अखिलेश यादव पर राजनीतिक रंग बदलने का आरोप लगाते हुए लिखा गया है— “एक कचौड़ी, दो समोसा — गिरगिटेश का क्या भरोसा”।
पोस्टर वार पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं
इस विवादित पोस्टर वार के सामने आते ही उत्तर प्रदेश का सियासी तापमान चरम पर पहुंच गया है। राज्य के तीनों मुख्य राजनीतिक दलों—सपा, भाजपा और कांग्रेस—के बीच तीखे बयानों का दौर शुरू हो चुका है।
जहां समाजवादी पार्टी (सपा) ने इसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) और उसके सूचना विभाग की एक “कायरतापूर्ण और सुनियोजित साजिश” करार दिया है। सपा प्रवक्ताओं का कहना है कि सूबे की जनता मौजूदा सरकार की नाकामियों, बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई से त्रस्त है। इन बुनियादी मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए रात के अंधेरे में इस तरह की घटिया पोस्टरबाजी का सहारा लिया जा रहा है। सपा नेताओं ने मांग की है कि पुलिस तुरंत सीसीटीवी फुटेज खंगालकर साजिशकर्ताओं को बेनकाब करे।
वहीं, सत्ताधारी भाजपा ने इन पोस्टरों में अपनी किसी भी भूमिका से साफ इनकार किया है। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस पोस्टरबाजी से पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि यह सपा के पिछले शासनकाल के दौरान भ्रष्टाचार और गुंडाराज से त्रस्त रही “आम जनता का आक्रोश” है जो इन पोस्टरों के जरिए बाहर आ रहा है।
दूसरी तरफ, विपक्ष में खड़ी कांग्रेस पार्टी ने भी इस मामले में भाजपा सरकार को आड़े हाथों लिया है। कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि आगामी चुनावों को देखते हुए राज्य के सांप्रदायिक माहौल को बिगाड़ने और अन्य जरूरी सामाजिक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए जानबूझकर यह खेल रचा जा रहा है। कांग्रेस ने इस तरह की राजनीति को लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।
बहरहाल, इन पोस्टरों के पीछे की असली हकीकत क्या है, यह तो वक्त ही बताएगा। चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों के बीच कितनी भी खींचतान और पोस्टर वार क्यों न देखने को मिले, लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के सियासी तख्त पर कौन बैठेगा और किसके सिर सजेगा जीत का ताज, यह तो मतदान और जनता के फैसले के बाद ही साफ हो पाएगा।














































