Ajmer Singh: ऐसे बेहद कम लोग होते है जो अपने करियर को ही पूरे जीवनभर जीना का जरिया बना लें.. जो जिये तो अपने देश के लिए और जीवन के अंत तक देश के लिए, अपने राज्य के लिए ही योगदान देते रहे.. एक ऐसे ही महान खिलाड़ी हुए गोल्ड मेडल विजेता भारतीय धावक अजमेर सिंह। गुलाम भारत में जन्म लेने के बाद भी उन्होंने पंजाब की पारंपरिक सभ्यताओं को बनाये रखा.. और भारत को एथलीट के क्षेत्र में एक नए आयाम पर पहुंचाया। इतना ही नहीं उन्होंने केवल भारतीय खिलाड़ियो के करियर को बढ़ावा देने के लिए ही काम नही किया बल्कि उन्होंने डेडीकेशन से नीजिरिया की खिलाड़ी दघबा मिन्हा को ट्रेनिंग देकर नेशनल चैम्पियन भी बनाया था। इस लेख में जानेंगे अजमेर सिंह के बारे में।
जानें कौन है Ajmer Singh?
1 फ़रवरी 1940 पंजाब के संगरूर जिले के ‘कुप कलां’ गाँव में जन्में अजमेर सिंह उन खिलाड़ियों में से एक रहे जिन्होंने भारत में ही नहीं बल्कि बाहरी देश में भी सेवा दी थी। उनके पिता सरदार करतार सिंह औलख एक जाट किसान थे और उनकी मां बच्चन कौर औलख एक गृहणी थी, किसान परिवार होने के बाद भी घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी, नतीजा इलाज के अभाव में अजमेर सिंह की मां का कम उम्र में ही निधन हो गया। अजमेर के घर की स्थिति इतनी खराब थी कि वो बचपन में कुपोषण का शिकार हो गये थे और उन्हें नॉक नीड की परेशानी हो गई थी, जिसमें घुटने आपस में टकराते है। स्वास्थ्य के साथ साथ शिक्षा हासिल करने के लिए भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा। वो रोजाना 4 किलोमीटर पैदल चल कर पास के गांव में रोहिड़ा में पढ़ने जाते थे। कहा जाता है कि उनके पास वर्दी और जूतो के भी पर्याप्त पैसे नहीं होते थे, जिस कारण उन्हें हर मौसम में फटे पुराने कपड़े पहनने पड़ते थे। वो स्कूल के बाद पिता का हाथ बटांते और फिर रात में दीया जला कर पढ़ते, लेकिन तमाम अभावो और समस्थायों ने उन्हें कमजोर करने के बजाय चट्टान बना दिया।
अजमेर सिंह का करियर
वो पढ़ते रहे और स्कूलिंग में पहले स्थान पर रहे, फिर मलेरकोटला के गवर्नमेंट कॉलेज में उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा किया.. कॉलेज के दौरान ही उन्होंने रनिंग की ट्रेनिंग लेना शुरु कर दिया था। यहां उन्होंने नॉक नीज की बाधा को दूर करने के लिए ट्रेनिंग देना शुरु किया और नतीजा ये रहा कि जल्द ही उन्हें ग्वालियर के लक्ष्मीबाई नेशनल कॉलेज ऑफ फिजिकल एजुकेशन में दाखिला मिला.. जिसमें उन्होंने फिजिकल एजुकेशन की ट्रेनिंग ली थी.. औऱ यहीं पर कोच और फेमस एथलीट डॉ. करन सिंह ने उनकी मुलाकात हुई थी। जिनकी छत्रछाया में अजमेर सिंह का करियर चमकने लगा। अपने ग्रेजुएशन के बाद वो पंजाब लौट आये और उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से एम.ए. और फिजिकल एजुकेशन में पी.एच.डी. भी पूरा किया था।
1970 के दशक में लिया सन्यास
1959 से लेकर 1961 तक अजमेर सिंह ने रनिंग टाइमिंग पर काफी काम किया और वो स्टेट लेवल पर कई प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने लगे। 1964 में टोक्यो ओलंपिक्स से पहले नेशनल ट्रायल्स और नेशनल गेम्स में 400 मीटर दौड़ और रिले रेस में बेहतरीन प्रदर्शन किया जिससे उनका रास्ता टोक्यो ओलंपिक के लिए खुल गया। उन्होंने टीम के सदस्य के तौर पर हिस्सा लिया था, लेकिन 1966 में बैंकॉक में हुए एशियाई खेल में उन्हें अपनी प्रतीभा दिखाने का मौका मिला और 400 मीटर की दौड़ में उन्होंने गोल्ड जीत कर इतिहास रचा। वहीं 200 मीटर की दौड़ में उन्होंने सिल्वर जीता था। पहली बार अंतराष्ट्रीय तौर पर मैदान में उतरे औऱ गोल्ड जीत कर उन्होंने खेल जगत में सेंशेसन ला दिया, जिस कारण 1966 में ही उन्हें अर्जुन पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। 1970 के दशक की शुरुआत में उन्होंने सन्यास ले लिया था। और उन्होंने तय किया कि वो खेल और प्रशासन के क्षेत्र में करियर बनायेंगे।
1976 में वो नाइजीरिया में स्पेशल एजुकेशन ऑफिसर के तौर पर नियुक्त हुए , जहां उन्होंने शॉट पुट और डिस्कस थ्रो में नाइजीरिया की नेशनल चैंपियन दघबा मिन्हा को ट्रेनिंग भी दी थी। 1979 में वो वापिस भारत आ गए और उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में शारीरिक शिक्षा विभाग के प्रोफेसर और चेयरमैन के तौर पर नियुक्त किया गया, वो खेल निदेशक (Director of Sports) और ‘मौलाना अबुल कलाम आजाद चेयर’ के तौर पर काफी समय तक कार्यरत रहे थे। उनकी उपलब्धि में चार चांद तब लगा जब जिस कॉलेज से उन्होंने कभी पढ़ाई की थी उसी लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन में उन्हें Vice Chancellor नियुक्त किया गया। उनके योगदान के लिए LNIPE ने उन्हें 1995 में सबसे गौरवशाली पूर्व छात्र के रूप में सम्मानित किया, इसके बाद 1999 में पंजाब में सिख समाज के बच्चो को खेलो के लिए जागरूक करने के लिए उन्हें खालसा ट्राई सेंटेनरी अवार्ड दिया गया।
इसके बाद 2000 में कीमत कराश राष्ट्रीय एकता पुरुस्कार दिया गया, जो कि खेल और राष्ट्र के लिए दिये गए योगदान के लिए दिया गया। 26 जनवरी 2010 को उनका निधन हो गया था लेकिन मरने से पहले भी उन्होंने अपने शरीर को मेडिकल रिसर्च के लिए PGIMER अस्पताल को दाम कर दिया ताकि स्टूडेंट को शोध के लिए मदद करें। ये थी उनकी उपकार करने की पराकाष्ठा.,जीते जी राष्ट्र के लिए हमेशा जिये और मरने के बाद भी राष्ट्र के काम आये।













































