Devraha Baba: क्या कोई इंसान सैकड़ों सालों तक जीवित रह सकता है? विज्ञान के लिए यह असंभव हो सकता है, लेकिन भारत के महान संत देवरहा बाबा के लिए यही सच था। नदी के किनारे 12 फीट ऊंचे मचान पर रहने वाले इस रहस्यमयी योगी के सामने देश के राष्ट्रपतियों से लेकर प्रधानमंत्रियों तक ने सिर झुकाया। आइए जानते हैं देवरहा बाबा के जीवन के वो अनसुने रहस्य, जो आज भी पूरी दुनिया को हैरान करते हैं।
और पढ़ें: कब से शुरु है Navratri? व्रत कम या ज्यादा तो नहीं! जानिए कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
श्री देवरहा बाबा भारत के सबसे रहस्यमयी और पूजनीय संतों में से एक माने जाते हैं। उनके जीवन और चमत्कारी शक्तियों से जुड़े कई ऐसे अनजाने तथ्य हैं, जो आज भी आम लोगों और वैज्ञानिकों को हैरान करते हैं।
Devraha Baba की उम्र का रहस्य
बाबा की वास्तविक उम्र हमेशा एक बड़ा रहस्य रही है। उनके अनुयायियों का मानना है कि वे 900 वर्षों तक जीवित रहे थे, जबकि कुछ विद्वान उनकी आयु 250 से 500 वर्ष के बीच मानते हैं। उनके जन्म की कोई निश्चित तिथि या स्थान का प्रमाण नहीं है। इस दावे को बल तब मिला जब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्वयं कहा कि उनके पिता उन्हें बचपन में बाबा के दर्शन कराने ले गए थे और तब भी बाबा उतने ही वृद्ध थे। स्वयं बाबा ने एक बार कहा था कि वे किसी मां के गर्भ से पैदा नहीं हुए, बल्कि जल से उनकी उत्पत्ति हुई है।
जल पर चलना और बिना सांस लिए रहना
बाबा को योग की उच्च सिद्धियां प्राप्त थीं, जिनमें ‘प्लविनी सिद्धि’ प्रमुख थी। इसके बल पर वे पानी की सतह पर सहजता से टहल सकते थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, योग की ‘कुंभक’ विधा के कारण वे बिना किसी उपकरण के नदी के पानी के अंदर 30 मिनट से अधिक समय तक बिना सांस लिए रह सकते थे। पानी के भीतर रहने के कारण उन्हें शुरुआत में ‘जलेश्वर बाबा’ भी कहा जाता था।
लकड़ी के ऊंचे मचान पर निवास
देवरहा बाबा ने अपना पूरा जीवन नदी के किनारों पर (विशेषकर देवरिया में सरयू और वृंदावन में यमुना नदी के तट पर) धरती से 12 फीट ऊंचे लकड़ी के मचान पर बिताया। इसी मचान से वे भक्तों को दर्शन देते थे और अपने पैरों से आशीर्वाद प्रदान करते थे। उनके इस मचान पर एक छोटी सी फूस की छत (या कुटिया) तो थी, लेकिन कोई पक्की दीवारें या आधुनिक बिस्तर नहीं था। वे मचान के पीछे बने एक छोटे से गुप्त हिस्से में अपनी साधना करते थे।
अद्भुत खान-पान और जीवनशैली
बाबा ने अपने पूरे जीवन में कभी अन्न ग्रहण नहीं किया। वे केवल दूध, शहद और गंगाजल या यमुनाजल पर जीवित रहते थे। कड़ाके की ठंड या तपती गर्मी में भी वे बिना सामान्य वस्त्रों के रहते थे, केवल अपनी कमर पर मृग की छाल लपेटते थे।
पशु-पक्षियों की भाषा समझना
बाबा केवल मनुष्यों के मन की बात ही नहीं भांप लेते थे, बल्कि वे पशु-पक्षियों की भाषा भी समझते थे। सरयू और यमुना के तट पर रहने वाले हिंसक जानवर भी बाबा के मचान के पास आकर शांत हो जाते थे। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब बाबा मचान से आवाज देते थे, तो आसमान में उड़ते पक्षी और जंगली जानवर उनके पास खिंचे चले आते थे। वे अपनी इच्छा मात्र से हिंसक पशुओं का क्रोध शांत कर देते थे।
दिग्गज हस्तियों का नतमस्तक होना
देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, महामना मदन मोहन मालवीय, पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसी महान हस्तियां बाबा का आशीर्वाद लेने उनके मचान पर आती थीं। माना जाता है कि आपातकाल के बाद जब इंदिरा गांधी उनसे मिलीं, तो बाबा ने मचान से अपना दाहिना हाथ (पंजा) उठाकर उन्हें आशीर्वाद दिया था, जिसके बाद कांग्रेस पार्टी ने अपना चुनाव चिह्न ‘हाथ का पंजा’ चुना और वे दोबारा सत्ता में लौटीं। इसके अलावा, साल 1911 में भारत आए ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम भी बाबा की ख्याति सुनकर उनके बारे में जानने के लिए उत्सुक हुए थे।
Devraha Baba ने ली महासमाधि
मंगलवार, 19 जून 1990 को योगिनी एकादशी के पावन दिन, इस महान और दिव्य संत ने वृंदावन में यमुना नदी के तट पर अपनी मर्जी से महासमाधि ले ली। बाबा भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षाएं और उनके जीवन के रहस्य आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बने हुए हैं।














































