Surat textile labor strike: हीरा और कपड़ा उद्योग की चमक-दमक के लिए दुनिया भर में मशहूर गुजरात के सूरत शहर से इन दिनों एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। उत्तर प्रदेश और बिहार के लाखों प्रवासी मजदूर अचानक काम-धंधा छोड़कर अपने-अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं। सूरत रेलवे स्टेशन पर हालात ऐसे हैं कि पैर रखने तक की जगह नहीं बची है। टिकट काउंटरों से लेकर प्लेटफॉर्म तक मजदूरों की मीलों लंबी कतारें लगी हैं। इस बड़े पैमाने पर वापसी को मजदूर ‘गांव चलो आंदोलन’ का नाम दे रहे हैं। आखिर देश के सबसे बड़े इंडस्ट्रियल हब को छोड़कर ये कारीगर अपने घरों को क्यों लौट रहे हैं?
12-12 घंटे की हाड़तोड़ मेहनत, न छुट्टी और न पूरा वेतन| Surat textile labor strike
सूरत रेलवे स्टेशन पर घर वापसी की आस में बैठे मजदूरों के चेहरे पर थकान से ज्यादा अपमान और गुस्से का भाव साफ नजर आ रहा है। कारखानों में काम करने वाले इन कारीगरों का आरोप है कि टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी फैक्ट्रियों में उनका जबरदस्त मानसिक और आर्थिक शोषण किया जा रहा है।
मजदूरों का कहना है कि 12-12 घंटे की कड़ी शिफ्ट के बाद भी न तो उन्हें वक्त पर पूरा मेहनताना मिलता है और न ही हफ्ते में एक दिन का वीकली ऑफ। महीने के पूरे 30 दिन लगातार काम करने का दबाव बनाया जाता है। अगर कोई मजदूर ज्यादा थकान या बीमारी के चलते एक दिन की छुट्टी मांग ले, तो सीधे उसकी दिन की कमाई काट ली जाती है या फिर उसे सीधे नौकरी से निकाल दिया जाता है।
‘हफ्ते में एक दिन की छुट्टी मांगी तो नौकरी से निकाल दिया’
रेलवे प्लेटफॉर्म पर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे कामगारों ने अपना दर्द बयां किया। अयोध्या के रहने वाले प्रेमचंद्र और उनके साथियों ने बताया कि जब उन्होंने हफ्ते में सिर्फ एक रविवार की छुट्टी की मांग की, तो फैक्ट्री मालिक पहले तो टालमटोल करते रहे और बाद में मुकर गए। छुट्टी पर अड़े कई वर्करों को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया और उनकी मेहनत की बकाया सैलरी तक रोक ली गई।
प्रयागराज के बृजेश निषाद का दर्द छलक पड़ा। उन्होंने कहा, “हम चार-पांच महीने से यहां खून-पसीना बहा रहे हैं। लेकिन छुट्टी मांगते ही पैसे काट लिए जाते हैं। सूरत में बंधुआ मजदूर या गुलाम बनने से तो कहीं बेहतर है कि हम अपने गांव लौट जाएं, वहां खेती कर लें या नदी किनारे रेत में खीरा-ककड़ी उगाकर रुखा-सूखा खा लें। पर अब यह बेइज्जती और जुल्म नहीं सहेंगे।”
वहीं, एक अन्य मजदूर शिववंदन कुमार ने साफ लफ्जों में कहा कि फैक्ट्रियों में 30 दिन काम कराने का दबाव रहता है। उन्होंने कहा, “हमने साफ कह दिया था कि हम 26 दिन ड्यूटी करेंगे, 30 दिन नहीं। इस पर मालिक ने सीधे गेट से बाहर कर दिया। अब जब तक हफ्ते में एक छुट्टी और सम्मान का पक्का नियम नहीं बनेगा, हम वापस नहीं आएंगे।”
लेबर यूनियन का समर्थन, संकट में फंस सकती है इंडस्ट्री
मजदूरों के इस बड़े पलायन के बीच लेबर यूनियन भी उनके समर्थन में उतर आई है। यूनियन प्रतिनिधि अजय डी. दुबे ने बताया कि ‘गांव चलो आंदोलन’ के तहत लाखों मजदूर अपने हक की खातिर घर लौट रहे हैं। यूनियन की टीमें रेलवे स्टेशन पर फंसे बेहाल मजदूरों के लिए पानी, बिस्किट और अन्य जरूरी इंतजाम कर रही हैं।
यूनियन का साफ कहना है कि सूरत की पूरी टेक्सटाइल और एम्ब्रॉयडरी इंडस्ट्री इन्हीं मेहनतकश मजदूरों के दम पर टिकी है। अगर फैक्ट्री मालिकों ने हफ्ते में एक दिन की वाजिब छुट्टी और सम्मानजनक व्यवहार की मांग को जल्द स्वीकार नहीं किया, तो आने वाले दिनों में कारीगरों की भारी किल्लत के चलते सूरत का यह चमकता हुआ उद्योग गहरे संकट में फंस जाएगा।











































