Gurudwara Moti Bagh: मुगलों और सिखों की दुश्मनी की कहानी तो खूब सुनी होगी.. मुगलो ने सिखों को प्रताड़ित करने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ा तो वहीं सिख भी जिद्दी ठहरे.. सिर कटे तो कटे लेकिन मुगलो के आगे झुकेंगे नही.. क्या बच्चा औऱ क्या बूढ़ा.. ऐसा लगता है कि जैसे वो इसी जिद के साथ पैदा होते है कि चाहे जो भी हो.. सिर झुकेगा तो केवल सच्चे पातशाह के सामने.. वरना कोई सिर झुका तक नहीं सकता.. बात जब धर्म की रक्षा की हो.. तो सिखों से बड़े भक्त कोई नहीं.. उनका एक एक कदम किसी ऐतिहासिक गाथा को जन्म दे देता है.. सिख धर्मकी महानता ऐसी है कि केवल गुरु साहिबानों को ही नहीं बल्कि उनके सच्चे सेवकों को भी गुरु साहिबानो की तरह सम्मान दिया गया। ये निष्ठा सबूत है सिख की समता की विचारधारा की..जहां जहां गुरु साहिबानों के कदम पड़े.. वो जगह खुद ही पवित्र और मूल्यवान हो गई। जहां सिख.. वहां सिक्खी की खूश्बू भी होगी..यानि की पवित्र गुरुद्वारे.. हर गुरुद्वारा साक्षी है सिखों के परोपकार की, मानवता की, सेवा भावना की, त्याग की और साहस की। सिखों की शान के रूप में बड़े ही गर्व से खड़ा गुरुद्वारा मोती बाग साहिब.. दसवे गुरु की मुगलों पर विजय की कहानी का प्रतीक है।
मोती बाग गुरुद्वारा का अद्भुत इतिहास
गुरुद्वारा मोती बाग साहिब.. दिल्ली का सिखों से गहरा नाता है। दिल्ली ने एक नहीं बल्कि दो दो गुरुओ को संसार से जाते देखा.. आठवे गुरु गुरु हरकिशन राय जी और नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर जी.. जहां आठवे गुरु मात्र 6 साल की उम्र में संगतो की सेवा करते हुए सचखंड चले गए तो वहीं गुरु तेग बहादुर औरंगजेब की अत्याचार का शिकार हुए.. लेकिन धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी शीश कटवाना स्वीकार किया था.. औऱ 11 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में नौवे गुरु का शीश कटवा दिया गया था, जिनकी याद में बना है गुरुद्वारा शीशगंज साहिब..लेकिन दसवें गुरु साहिब की करूणा की करूणा और मानवता की सभावना ऐसी थी कि जब दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी को मुगल राजकुमार ने मुअज्जम ने मदद के लिए बुलाया तो अपने पिता की शहादत को भूल कर शरणागत की रक्षा के लिए वो दिल्ली पहुंच गए.. जिस स्थान पर गुरु साहिब रूके .. उसकी स्थान पर मौजूद है गुरुद्वारा मोती बाग साहिब।
औंरंगजेब के बेटे आपस में सिंहासन के लिए लड़ने लगे
जिसे पहले मोची बाग कहा जाता था। दऱअसल कहा जाता है कि 1707 में जब औरंगजेब की मृत्यु हुई तो उसने अपने उत्तराधिकारी की घोषणा नहीं की थी। ऐसे में औंरंगजेब के बेटे आपस में ही सिंहासन के लिए लड़ने लगे थे। वहीं औरंगजेब का बड़ा बेटा राजकुमार मुअज्जम अहिंसावादी था. उसे पता था कि मुगलो की ताकत का सामना कोई कर सकता है तो वो केवल दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ही है। बस उसने संदेश भेजकर गुरु साहिब को दिल्ली आने का न्यौता दिया। गुरु साहिब मुगलो के कारण अपना सबकुछ खो चुके थे। लेकिन जब भी नंद लाल ने राजकुमार का संदेश दिया तो गुरु साहिब ने उसकी मदद के लिए सेना के साथ जाने का फैसला किया.. और पहुंच गए दिल्ली.. जहां वो अपनी सेवा के साथ मोची बाग नाम की जगह पर ठहरे.. कहते है कि वहां के गुरु साहिब अपनी तीर से लालकिले के सिंहासन को भेद सकते थे। उन्होंने अपने आने की सूचना मोचीबाग से तीर चला कर दे दी थी।
गुरु साहिब की मदद के कारण राजकुमार मुअज्जम सिंहासन पर बैठा
पहली बार राजकुमार को ये चमत्कार लगा लेकिन जब गुरु साहिब ने फिर से तीर चलाया तो उसे यकीन हो गया कि गुरु साहिब केवल तलवारबाजी में ही नहीं बल्कि तीरंदाजी में भी बेहद निपुण है। गुरु साहिब की मदद के कारण राजकुमार मुअज्जम सिंहासन पर बैठा और बहादुर शाह जफर प्रथम कहालाया। सिंहासन हासिल करने के बाद वो गुरु साहिब से मिलने गया था, जहां दोनो की मुलाकात हुई थी वो स्थान आज दमदमा साहिब कहलाता है। वहीं जहां गुरु साहिब ठहरे वो खुद में ही बेहद पवित्र हो गया था। जिसके बाद 1708 में गुरु साहिब भी सच खंड चले गए.. लेकिन उनके निवास और विश्राम गृहों को संजोने की जिम्मेदारी सिख समुदाय ने ली थी। साल 1783 में सिखो के सैन्य जनरल बाबा बघेल सिंह ने जब दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया था तब बाबा बघेल सिंह ने उन तमाम धरोहरो को संजोने का काम किया, जो आने वाली पीढ़ी के लिए मददगार साहिब हो। इसी कड़ी में मोचीबाद में गुरुद्वारा मोतीबाग को बनवाया गया। और इसका नाम बदल कर मोतीबाग कर दिया गया।
गुरुद्वारा मोती बाग साहिब सफेद संगमरमर से बना है, जो कि पारंपरिक सिख वास्तुकला का जीवंत उदाहरण है। ये कई मंजिला है और इसके अंदर एक बड़ा प्रार्थना भवन और लंगर हॉल मौजूद है। पारंपरिक गुरुद्वारों की तरह बड़ा औऱ राजसी गुंबद इस गुरुद्वारे की शान को दर्शाता है। इसी गुरुद्वारे के अंतर्गत एक छोटा गुरू है, जिसे तीर स्थान कहा जाता है, जहां से बैठकर गुरु साहिब ने बहादुर शाह जफर के सिंहासन में तीर मारा था। 24 घंटे गुरुद्वारा संगतो के लिए खुला रहता है साथ ही 24 घंटे यहां लंगर की सुविधा रहती है। सिख उत्सवों औऱ पांरपरिक कार्यक्रर्मों में यहां सैकड़ो की संख्या में भीड़ जमा होती है..आज के समय में दिल्ली सिख मैनेजमेंट कमेटी गुरुद्वारे का देखभाल और प्रबंधन का काम करती है। जो ये सुनिश्चित करता है कि गुरुद्वारे की चमक कभी भी फीकी न पड़े।












































