US-China Agreement: दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच व्यापारिक तनाव पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा है। पिछले साल हुए समझौते के बावजूद चीन से अमेरिका को होने वाला रेयर अर्थ मैग्नेट का निर्यात अब भी पहले के मुकाबले काफी कम बना हुआ है। इससे अमेरिकी प्रशासन की चिंता बढ़ गई है कि बीजिंग समझौते की शर्तों को पूरी तरह लागू नहीं कर रहा। वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरी स्थिति का सबसे बड़ा फायदा भारत को मिल सकता है।
समझौते के बाद भी नहीं बढ़ी सप्लाई| US-China Agreement
रेयर अर्थ मैग्नेट की निर्बाध सप्लाई पिछले साल हुए उस व्यापार समझौते का अहम हिस्सा थी, जिसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ट्रेड वॉर को और आगे बढ़ने से रोकने पर सहमति जताई थी। हालांकि, ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में प्रकाशित कस्टम्स डेटा के मुताबिक, इस साल की पहली छमाही में अमेरिका को चीन से होने वाली रेयर अर्थ मैग्नेट की औसत मासिक शिपमेंट 479 टन रही। जबकि 2022 से 2024 के बीच यह औसत 586 टन प्रति माह था। यानी मौजूदा सप्लाई पहले के औसत से करीब 20 फीसदी कम बनी हुई है। इन आंकड़ों में उन मैग्नेट को शामिल नहीं किया गया है, जो तैयार उत्पादों के हिस्से के रूप में निर्यात किए जाते हैं।
क्यों अहम हैं रेयर अर्थ मैग्नेट?
रेयर अर्थ मैग्नेट आधुनिक उद्योगों की रीढ़ माने जाते हैं। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन (EV), फैक्ट्री ऑटोमेशन, इलेक्ट्रॉनिक्स, विंड टर्बाइन और रक्षा उपकरणों के निर्माण में बड़े पैमाने पर होता है। यही वजह है कि इनकी सप्लाई में किसी भी तरह की रुकावट अमेरिकी उद्योगों के लिए चिंता का विषय बन जाती है।
अमेरिका ने जताई नाराजगी
मामले से जुड़े लोगों के मुताबिक, व्हाइट हाउस और अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) के अधिकारियों का मानना है कि चीन ने समझौते की अमेरिकी व्याख्या के मुताबिक पूरी तरह पालन नहीं किया है। हालांकि, अब तक ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से ज्यादा तूल देने से बचता रहा है। अमेरिकी ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जेमिसन ग्रीर ने भी कहा कि रेयर अर्थ मैग्नेट को लेकर चीन का अनुपालन “पूरी तरह संतोषजनक नहीं” है।
दुनिया में चीन की मजबूत पकड़
रेयर अर्थ मैग्नेट के उत्पादन में चीन का दबदबा बेहद मजबूत है। दुनिया के 90 प्रतिशत से अधिक रेयर अर्थ मैग्नेट का उत्पादन चीन में होता है। ऐसे में अमेरिका सहित कई देशों की इंडस्ट्री अभी भी चीन पर काफी हद तक निर्भर है। हालांकि, अमेरिका और उसके सहयोगी देश वैकल्पिक सप्लाई चेन विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें अभी कई साल लग सकते हैं।
भारत के लिए क्यों है बड़ा अवसर?
अमेरिका और चीन के बीच जारी यह खींचतान भारत के लिए नई संभावनाएं लेकर आई है। ‘चाइना+1’ रणनीति के तहत कई वैश्विक कंपनियां चीन के अलावा दूसरे देशों में निवेश बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस मौके का फायदा उठाकर रेयर अर्थ एलिमेंट्स के खनन, प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण के क्षेत्र में विदेशी निवेश आकर्षित कर सकता है। इससे भारत वैश्विक तकनीकी सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
इसके अलावा, देश की ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा इंडस्ट्री को भी घरेलू स्तर पर मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। अगर भारत इस अवसर का सही इस्तेमाल करता है, तो वह आने वाले वर्षों में रेयर अर्थ सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण वैश्विक केंद्र बन सकता है।































