CM Yogi defamation case: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात अभी से बिछने लगी है। इसी बीच ‘मछली भोज’ विवाद ने सूबे की राजनीति में नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। अयोध्या में निषाद समाज के एक कार्यक्रम को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान पर यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने कड़ा एतराज जताया है। बुधवार को प्रयागराज पहुंचे अजय राय ने एमपी-एमएलए कोर्ट में मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि का केस दाखिल कर दिया। अजय राय ने दो टूक कहा कि सीएम ने उनकी छवि खराब करने के लिए झूठा बयान दिया है। वह जनता के सामने आकर माफी मांगें या फिर अपने दावे का सबूत दें। इस घटनाक्रम ने सिर्फ सियासी पारे को ही नहीं चढ़ाया है, बल्कि कई अहम कानूनी सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
क्या है ‘मछली भोज’ का पूरा विवाद? CM Yogi defamation case
दरअसल, 23 अगस्त को अजय राय अयोध्या में निषाद समाज के एक सम्मेलन में शामिल होने पहुंचे थे। इस कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तंज कसते हुए कहा था कि अजय राय हनुमानगढ़ी में दर्शन करने के बाद मछली खाते हैं। इस पर पलटवार करते हुए अजय राय ने कहा, “मैं पूरी तरह शाकाहारी हूं और मैंने जिंदगी में कभी मछली नहीं खाई। मैं निषाद समाज के कार्यक्रम में जरूर गया था, लेकिन मछली खाने की बात पूरी तरह मनगढ़ंत है। मुख्यमंत्री ने गलत बयानी की है। मैंने कोर्ट में कोई हर्जाना नहीं मांगा है, मेरी मांग सिर्फ इतनी है कि सीएम सार्वजनिक रूप से माफी मांगें या अपने बयान का प्रमाण दें।”
नए कानूनों के तहत कौन सी धाराएं बन सकती हैं आधार?
अगर इस तरह के मामलों में कानूनी पहलुओं को देखें, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत कुछ धाराएं चर्चा में आती हैं:
- धारा 196 (पुरानी IPC की 153A): धर्म, जाति या समुदाय के आधार पर वैमनस्य या नफरत फैलाने के आरोप में।
- धारा 353 (पुरानी IPC की 505): सार्वजनिक शांति भंग करने या अफवाह फैलाने वाला बयान देना।
- धारा 356 (मानहानि): किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के मामले में।
एफआईआर और परिवाद में क्या फर्क है?
कानून में शिकायत दर्ज कराने के दो रास्ते होते हैं। पहला रास्ता थाने में लिखित तहरीर देकर एफआईआर (FIR) दर्ज कराने का होता है, जो संज्ञेय अपराध होने पर पुलिस करती है। दूसरा रास्ता परिवाद (Private Complaint) का है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223 (पुरानी CrPC 200) के तहत यदि पुलिस केस दर्ज नहीं करती, तो पीड़ित व्यक्ति सीधे मजिस्ट्रेट की अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। कोर्ट परिवादी का बयान दर्ज कर प्राथमिक सबूत मिलने पर जांच का आदेश दे सकती है या आरोपी को समन भेज सकती है। अजय राय ने भी सीधे कोर्ट में परिवाद दाखिल करने का रास्ता चुना है।
सीएम के खिलाफ केस में क्या हैं कानूनी अड़चनें?
किसी पदस्थ मुख्यमंत्री के खिलाफ थाने की तहरीर पर सीधे एफआईआर होना व्यावहारिक और कानूनी रूप से बेहद पेचीदा है:
- पूर्व मंजूरी की अनिवार्यता: BNSS की धारा 218 के तहत किसी लोक सेवक (Public Servant) के पद पर रहते हुए दिए गए बयानों को लेकर मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी (Prior Sanction) जरूरी होती है।
- भाषण की आजादी: संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की आजादी देता है। अदालतों का रुख रहा है कि सियासी बयानबाजी में जब तक सीधे हिंसा भड़काने की मंशा साबित न हो, तब तक आपराधिक मामला दर्ज करना आसान नहीं होता।
- प्राथमिक जांच का नियम: नए कानून के तहत 3 से 7 साल तक की सजा वाले मामलों में एफआईआर से पहले 14 दिन की प्राथमिक जांच का प्रावधान है।
अगर कोर्ट 175(3) BNSS के तहत आगे बढ़ती है, तो अदालत समन या जवाब मांग सकती है। कानूनी जानकारों का मानना है कि थाने से सीधे एफआईआर की गुंजाइश न के बराबर होने के चलते ही अजय राय ने अदालत का रुख किया है, जिससे 2027 चुनाव से पहले इसे एक बड़ा सियासी मुद्दा बनाया जा सके।













































