Russia Ukraine conflict: रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध का असर अब भारत के उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल तक महसूस किया जा रहा है। मऊ और आजमगढ़ के कई परिवार ऐसे हैं, जिन्होंने बेहतर रोजगार की उम्मीद में अपने बेटों को विदेश भेजा था, लेकिन वे कभी वापस नहीं लौट सके। अब तक उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस युद्ध में रूस की ओर से लड़ते हुए मऊ के 4 और आजमगढ़ के 7 युवकों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। वहीं एक अन्य युवक अब भी लापता बताया जा रहा है।
इन परिवारों का दर्द सिर्फ अपनों को खोने तक सीमित नहीं है। कई मामलों में परिजनों को अंतिम संस्कार के लिए शव भी नहीं मिल सके। हाल ही में कुछ परिवारों को रूस से उनके बेटों की वर्दी, टोपी, बैज और मृत्यु प्रमाण पत्र मिले, जिनका उन्होंने अंतिम निशानी मानकर अंतिम संस्कार किया। यह दृश्य पूरे इलाके के लोगों को भावुक कर गया।
नौकरी के नाम पर विदेश भेजे गए युवक| Russia Ukraine conflict
परिजनों के अनुसार, जनवरी 2024 में मऊ निवासी विनोद यादव ने आजमगढ़ और मऊ के कुल 13 युवकों को रूस में अच्छी नौकरी दिलाने का भरोसा दिलाया। दावा किया गया कि वहां प्लंबर और सुरक्षा गार्ड की नौकरी मिलेगी और हर महीने करीब दो लाख रुपये वेतन दिया जाएगा। बेहतर भविष्य और आर्थिक तंगी से निकलने की उम्मीद में युवकों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। परिवारों का कहना है कि इसके बाद सभी युवकों के पासपोर्ट बनवाए गए और उनकी मुलाकात दिल्ली के एक अन्य एजेंट सुमित से कराई गई। आरोप है कि युवकों से पैसे लेने के बाद उन्हें नौकरी का भरोसा देकर रूस भेज दिया गया।
रूस पहुंचने के बाद बदली पूरी कहानी
परिजनों के मुताबिक, रूस पहुंचने के बाद युवकों को मॉस्को में करीब 15 दिन की ट्रेनिंग दी गई। इसके बाद उन्हें अलग-अलग इलाकों में भेज दिया गया। परिवारों का आरोप है कि बाद में उन्हें रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़े क्षेत्रों में तैनात कर दिया गया। शुरुआत में कुछ समय तक युवकों की अपने घरवालों से बातचीत होती रही, लेकिन एक-दो महीने बाद संपर्क धीरे-धीरे टूटने लगा। इससे परिवारों की चिंता बढ़ती गई। बाद में अलग-अलग माध्यमों से कुछ युवकों की मौत की खबरें सामने आने लगीं।
कई परिवारों को नहीं मिले शव
जानकारी के अनुसार, मऊ के श्यामसुंदर और सुनील तथा आजमगढ़ के कन्हैया यादव, अजहरुद्दीन खान, रामचंद्र और अरविंद कुमार के शव या अवशेष भारत लाए गए। वहीं मऊ के बृजेश यादव और आजमगढ़ के राकेश कुमार घायल अवस्था में वापस लौटे, जिसके बाद अन्य परिवारों की चिंता और बढ़ गई। इसी बीच पंजाब के जालंधर निवासी जगदीप कुमार अपने भाई का शव लेने रूस पहुंचे। परिजनों के मुताबिक, वहां मॉस्को स्थित भारतीय दूतावास से उन्हें आजमगढ़ के जोगेंद्र यादव, धीरेंद्र कुमार और मऊ के विनोद यादव सहित अन्य युवकों की मौत की जानकारी मिली।
बताया गया कि जिन मामलों में शव उपलब्ध नहीं थे, वहां दूतावास की ओर से वर्दी, टोपी, बैज, रूसी ध्वज और मृत्यु प्रमाण पत्र परिजनों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। बाद में ये सामान संबंधित परिवारों को सौंपा गया।
वर्दी और टोपी का किया अंतिम संस्कार
जब परिजनों को अपने बेटों की अंतिम निशानी के रूप में केवल वर्दी, टोपी और बैज मिले, तो उन्होंने इन्हीं के साथ अंतिम संस्कार किया। यह दृश्य पूरे क्षेत्र के लिए बेहद भावुक करने वाला था। गांव और आसपास के लोगों की आंखें नम हो गईं। कई लोगों ने कहा कि ऐसी कमाई का कोई मतलब नहीं, जिसके लिए किसी परिवार को अपने बेटे को हमेशा के लिए खोना पड़े।
एजेंटों के खिलाफ कार्रवाई की उठी मांग
इस घटना के बाद स्थानीय लोगों और मृतकों के परिजनों ने सरकार से मांग की है कि विदेश में नौकरी दिलाने के नाम पर युवाओं को कथित तौर पर गुमराह करने वाले एजेंटों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि बेरोजगारी का फायदा उठाकर लोगों को झूठे वादों के जरिए विदेश भेजने वाले नेटवर्क पर कड़ी निगरानी होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई और परिवार ऐसी त्रासदी का शिकार न बने।
और पढ़ें: चीन के रडार की खुल गई पोल? ईरान से पाकिस्तान तक उठे बड़े सवाल| China radar system






























