China radar system: दुनिया के कई देशों को हथियार और रक्षा उपकरण बेचने वाला चीन एक बार फिर अपने रडार सिस्टम की विश्वसनीयता को लेकर चर्चा में है। हालिया रिपोर्टों और रक्षा विशेषज्ञों के विश्लेषण में दावा किया गया है कि चीन के कुछ एंटी-स्टील्थ रडार सिस्टम अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए। इन दावों के बाद चीन की रक्षा तकनीक और उसके निर्यात किए जाने वाले सैन्य उपकरणों की गुणवत्ता पर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं।
रिपोर्टों में ईरान और पाकिस्तान का जिक्र| China radar system
कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चीन द्वारा ईरान को उपलब्ध कराए गए एंटी-स्टील्थ रडार आधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमानों की गतिविधियों का प्रभावी ढंग से पता लगाने में सफल नहीं रहे। इसी तरह, कुछ विश्लेषणों में पाकिस्तान के संदर्भ में भी चीन के रडार सिस्टम के प्रदर्शन पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और चीन की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
चीन लंबे समय से कर रहा है एंटी-स्टील्थ तकनीक पर निवेश
चीन पिछले कई वर्षों से अमेरिका की स्टील्थ तकनीक का मुकाबला करने के लिए आधुनिक एंटी-स्टील्थ रडार नेटवर्क विकसित कर रहा है। चीनी सेना समय-समय पर अपने रडार सिस्टम के प्रदर्शन से जुड़े वीडियो और जानकारी साझा करती रही है। इन प्रस्तुतियों में यह दिखाने की कोशिश की जाती है कि उसके रडार पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों, जैसे एफ-35, का पता लगाने में सक्षम हैं।
हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि केवल आधुनिक रडार होना पर्याप्त नहीं है। किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि उसे अन्य सेंसर, कमांड सिस्टम और मिसाइल नेटवर्क के साथ कितनी प्रभावी तरीके से जोड़ा गया है। युद्ध जैसी परिस्थितियों में लगातार संचालन और रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है।
विशेषज्ञों ने बताई असली चुनौती
एशिया टाइम्स की एक रिपोर्ट में चीन एयरोस्पेस स्टडीज इंस्टीट्यूट (CASI) के विश्लेषण का हवाला देते हुए कहा गया कि चीन अब भी अमेरिकी स्टील्थ विमानों की कार्यप्रणाली को पूरी तरह समझने की चुनौती का सामना कर रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने 1999 में सर्बिया में एफ-117 विमान के गिराए जाने के बाद लो-फ्रीक्वेंसी रडार, एकीकृत एयर डिफेंस सिस्टम और जे-20, जे-35 जैसे स्वदेशी स्टील्थ लड़ाकू विमानों के विकास में बड़े पैमाने पर निवेश किया।
विश्लेषकों का मानना है कि चीन अक्सर स्टील्थ तकनीक को केवल हार्डवेयर की चुनौती मानता है, जबकि अमेरिका मिशन प्लानिंग, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर, सॉफ्टवेयर, पायलट प्रशिक्षण और सामरिक रणनीति जैसे पहलुओं पर भी समान रूप से ध्यान देता है।
चेतावनी: केवल रडार पर भरोसा पर्याप्त नहीं
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ताइवान स्ट्रेट जैसे संवेदनशील इलाकों में चीनी रडार शुरुआती चेतावनी तो दे सकते हैं, लेकिन केवल इसी आधार पर आधुनिक स्टील्थ विमानों को निशाना बनाना आसान नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्टील्थ विमानों के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा के लिए रडार, मिसाइल सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और प्रशिक्षित ऑपरेटरों का मजबूत तालमेल जरूरी होता है।
नई पीढ़ी के एयर डिफेंस सिस्टम पर फोकस
अमेरिका की बढ़ती सैन्य क्षमता को देखते हुए चीन अब अपने तीसरी पीढ़ी के एयर डिफेंस सिस्टम को चौथी पीढ़ी के आधुनिक सिस्टम से बदलने की दिशा में काम कर रहा है। इसमें मोबाइल रडार, पैसिव सेंसर और ऐसे नेटवर्क शामिल किए जा रहे हैं जो बिना अपनी स्थिति उजागर किए लक्ष्य का पता लगाने में मदद कर सकें।
हालांकि, रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक सैन्य तकनीक की वास्तविक क्षमता का आकलन केवल दावों से नहीं, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में उसके प्रदर्शन से ही किया जा सकता है। ऐसे में चीन के रडार सिस्टम को लेकर सामने आई हालिया रिपोर्टों ने वैश्विक रक्षा जगत में नई बहस जरूर छेड़ दी है।






























