Assault with 4pm Journalist: सवाल पूछना और गलत के खिलाफ आवाज उठाना, यही पत्रकारिता की आत्मा है। लेकिन क्या हो जब अपना काम करने पर ही उन्हें पीटा जाए? पत्रकारिता, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, आज वह भी महफूज नहीं है। अगर रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो सुरक्षा की उम्मीद किससे की जाए?
आखिर पत्रकार शाहीन खान और उनकी सहयोगी नफीसा खान की क्या गलती थी? उन्होंने ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया था कि उनके साथ ऐसी बर्बरता हुई? ‘4PM न्यूज़ नेटवर्क’ की डिजिटल मीडिया पत्रकार शाहीन खान और उनकी सहयोगी नफीसा खान के साथ दिल्ली पुलिस ने धर्म पुछकर उनके साथ दुर्वयव्हार किया।
पहचान पूछकर दिल्ली पुलिस ने महिला पत्रकार से की बर्बरता
क्या उनका मुस्लिम होना ही उनका अपराध था, इस देश को अनेकता में एकता का प्रतीक माना जाता है लेकिन जब दिल्ली पुलिस मुस्लिम महिला पत्रकारों के साथ ऐसा बर्बर दुर्व्यवहार (Assault with 4pm Journalist) कर सकती है तो आम जनता का क्या हाल होगा?
देश में आज सांप्रदायिक मतभेद और नफरत का जहर इस कदर घुल गया है कि इंसान अपनी इंसानियत तक खो बैठा है। अब तक तो आतंकी संगठनों द्वारा पहचान पूछकर बेगुनाहों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आती थीं, लेकिन जब कानून के रखवालों पर ही मजहबी पहचान पूछकर प्रताड़ित करने और मारपीट करने के आरोप लगने लगें, तो ऐसी वारदातें इंसानियत और पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को शर्मसार कर देती हैं।
4PM की पत्रकार शाहीन ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता से सवाल पूछा तो दिल्ली पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया और मारपीट की.
– शाहीन का कहना है- ‘जब पुलिसवालों को पता चला कि वो मुसलमान हैं तो उन्हें और बेरहमी से मारा गया। उनके शरीर पर जख्म हैं.. कैमरापर्सन भी बेसुध पड़ी है…’… pic.twitter.com/62GmWnZgTz— Nedrick News (@nedricknews) September 3, 2026
किताबों और उपन्यासों से उलट खाकी का ये खोफनाक चेहरा
एक तरफ जहां अमित लोढ़ा की ‘मेरी खाकी मेरी जिंदगी’ और ओ.पी. सिंह की ‘खाकी इन एक्शन’ जैसी चर्चित किताबें पुलिस के त्याग, न्याय और सुरक्षात्मक पहलू को दर्शाती हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली के साकेत थाने से आई यह खबर इस ‘खाकी’ के एक अलग और डरावने चेहरे को उजागर करती है। किताबों और उपन्यासों में जिस खाकी को रक्षक और इंसाफ का प्रतीक दिखाया जाता है, जब हकीकत में उसी खाकी पर महिला पत्रकारों से बर्बरता करने और धार्मिक पहचान पूछकर प्रताड़ित करने के गंभीर आरोप लगते हैं, तो यह व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है। क्या खाकी का यह रूप केवल कागजी उपन्यासों के आदर्शों तक ही सीमित रह गया है?
महिला सुरक्षा और बेटी बचाओ के दावों पर बड़ा सवाल (Assault with 4pm Journalist)
महिला सुरक्षा और बेटी बचाओ का दम भरने वाले तंत्र से आज एक बड़ा सवाल है क्या अब इस देश में महिला पत्रकार होना गुनाह बन गया है? जब वर्दी की आड़ में रक्षक ही सरेआम एक महिला पत्रकार को घसीटकर थाने ले जाएं और उसके साथ मारपीट करें, तो देश की आधी आबादी खुद को महफूज कैसे समझे? कानून के रखवाले ही जब कानून को अपने हाथ में ले लें, तो इंसाफ की गुहार किससे लगाई जाए?














































