Hazur Sahib act 1956: 22 जून 2026 को महाराष्ट्र विधानसभा में फड़नवीस मंत्रिमंडल का एक फैसला सामने आया, जिसने सिख समाज में बेहद खलबली मचा दी.. एक 70 साल पुराने कानून को पूरी तरह से बदलने का प्रस्ताव लाया गया, जिस पर महाराष्ट्र मंत्रिमंडल की मंजूरी भी मिल गई..सरकार ने नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब अधिनियम, 1956 को निरस्त करने और उसके स्थान पर तख्त सचखंड श्री हजूर अबचलनगर साहिब गुरुद्वारा (Takht Sachkhand Sri Hazur Abchalnagar Sahib Gurudwara) अधिनियम लाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी..जिसके लागू होने के बाद नंदेड़ में स्थित तख्त सचखंड श्री हजूर साहिब, के प्रबंधन में बहुत बड़ा होने की उम्मीद की गई।
70 साल पुराने कानून को बदल कर नए अधिनियम लाने के बाद हुजुर साहिब तख्त को नियंत्रण करने की सारी नीतियों में बदलाव होगा, जिससे कानून में एक प्रणालीगत पुनर्स्थापन होने के चांसेस बढ़ गए। प्रस्ताव को मंजूरी मिलने के बाद विधि एवं न्याय विभाग के पास अंतिम परामर्श के लिए भेजा गया। लेकिन सरकार के इस फैसले पर तख्त जत्थेदार ज्ञानी कुलवंत सिंह समेत अन्य सिख धार्मिक हस्तियों औऱ जत्थेदारों ने विरोध किया है। वहीं निरसन सिंख संगठनों ने सरकार के फैसले का खुल कर विरोध किया है। अब सवाल ये है कि आखिर सरकार इस कानून में बदलाव क्यों करना चाहती है औऱ सिख समुदाय के विरोध का कारण क्या है साथ ही क्या है हुजूर साहिब एक्ट 1956..
क्या है हुजूर साहिब एक्ट 1956 – Hazur Sahib act 1956
महाराष्ट्र के नांदेड़ में स्थिति गुरुद्वार हुजुर साहिब हर एक सिख अनुयायी के लिए बेहद अहम है, यहीं दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी सचखंड गए थे, और उनके सम्मान में स्थापित गुरुद्वारा नांदेड़ साहिब पांच अकाल तख्तों में से एक अकाल तख्त है। इस गुरुद्वारे के संचालन और देखरेख को लेकर ही नांदेड़ सिख गुरुद्वारा सचखंड श्री हजूर अपचलनगर साहिब अधिनियम, 1956 लागू किया गया था, इस कानून को पूर्व हैदराबाद राज्य ने अधिनियमित किया था। इस अधिनियम के तहत हुजुर साहिब तख्त और उने जुड़े ऐतिहासिक गुरुद्वारा का प्रबंधन 17 सदस्य वाली गुरुद्वारा बोर्ड और 5 सदस्य वाली प्रबंध समिति के अधीन ही किया जायेगा।
गुरुद्वारों के संचालन हमेशा सिख जत्थेदारों का
ये 17 सदस्य मुख्य रूप से शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी), मुख्य खालसा दीवान, सचखंड हजूरी खालसा दीवान, सिख निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधि, औक समिति द्वारा सरकार की तरफ से नामित व्यक्ति होते है। इनका मुख्य उद्देश्य होता है कि वो गुरुद्वारे से जुड़े सभी धार्मिक अनुष्ठानों और पवित्र स्थालों का खुद संचालन करेंगे। इस कानून को बनाने का पीछे का एक ही कारण था कि गुरुद्वारों के संचालन हमेशा सिख जत्थेदारों और सिख प्रबंधन के पास ही हो, और सरकार का इसमें कोई हस्तक्षेप न हो, ताकि सिख परंपरा, प्रथायें और व्यवस्थायें सूचारू तरीके से चलती रहें।
कानून में बदलाव लाने की पूरी तैयारी
70 सालो से गुरुद्वारे का प्रबंधन इसी कानून के अनुसार चल रहा था, लेकिन महाराष्ट्र सरकार 2015 से ही इस कानून में बदलाव लाने की कोशिश कर रही है.. लेकिन तब बात नहीं बनी थी, जिसके बाद 2024 में भी कोशिश की गई मगर विरोध के कारण ठंडे बस्ते में चला गया लेकिन 2026 में फिर से इस प्रस्ताव को लाया गया और कानून में बदलाव लाने की पूरी तैयारी भी कर ली गई है, लेकिन सिख संगठन ने इसका पुरजोर विरोध किया और तख्त श्री हुजुर साहिब के प्रबंधको ने एक गुरुमाता यानि की सामूहिक धार्मिक आदेश जारी कर महाराष्ट्र सरकार के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। उनकी सीधी मांग है कि भले ही कानून में बदलाव किया जाये लेकिन मूल 1956 के कानून को बनाये रखना आवश्यक है।
तख्त के कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार अधिनियम में बदलाव लाकर गुरुद्वारा प्रबंधन पर अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है। जो कि तख्त की तऱफ से स्थापित परंपराओं को कमजोर करने की गहरी साजिश है। उनका कहना है कि मौजूदा प्रशासनिक ढांचा असल में दसवे पातशाह और सिख विद्वानों के सिद्धातों पर तय किया गया था, लेकिन राज्य सरकार जो बदलाव जबरन थोपना चाहती है वो असल में सामाजिक नहीं बल्कि नीजि हितो के लिए उठाया गया कदम प्रतीत हो रहा है..ये पूरी तरह से तख्त के प्रबंधन में दखलअंदाजी करने वाला है। नए कानून से साफ है कि नए प्रशासनिक ढांचें तैयार होंगे, और चुनाव प्रबंधन और बाकि के उप नियनों के लिए संशोधित नियमों को शामिल करने में आसानी होगी। हालांकि पहले ये प्रस्ताव पास नहीं किया गया था, ऐसे में जिस तरह का विरोध अब किया जा रहा है उसके बाद भी इस कानून में बदलाव करना आसान नहीं होगा।





























