Guru Nanak Jahaz history: 1 मई 2025 को पंजाब फिल्म बॉक्स ऑफिस पर एक पंजाबी फिल्म रीलिज हुई.. इस एक फिल्म ने सिखों के उस इतिहास को या कहें कि उस जख्म को फिर से हरा कर दिया, जब कनाडा की धरती पर उन्हें उतरने तक नहीं दिया गया था। आज भारत के बाद कनाडा दूसरा देश है जहां सबसे ज्यादा सिखों की आबादी है लेकिन 1914 में जब एक हांगकाग का जहाज कोमागाटामारू 375 यात्रियों के साथ कनाडा पहुंचा था तब नस्लवाद के कारण उन्हें कनाडा की जमीन पर उतरने तक नहीं दिया गया। इस जहाज पर मौजूद सिखों ने इसे गुरु नानक जहाज नाम दिया था.. कनाडा के अधिकारियों के इस हरकत के कारण जब जहाज बंगाल लौटा तो वहां खूनी रक्तपात मच गया और हमारे कई सिख भाईयों को जान गंवाई पड़ी।
1 मई 2025 को रीलिज हुई फिल्म गुरु नानक जहाज भा इसी नाम से रीलिज की गई.. इस फिल्म को शरण कला ने निर्देशित किया है तो वहीं शरण कला और हरनाव बीर सिंह ने लिखा है.. साथ ही फिल्म के मुख्य किरदार है तरसेम जस्सर, गुरप्रीत घुग्गी औऱ हर्शरन सिंह। फिल्म की कहानी गुरु नानक जहाज में सवारी कर रहे सिख यात्री मेवा सिंह लोपोके, भाई भाग सिंह भिखीविंड और बाबा गुरदित सिंह के आसपास घूमती है, जिन्होंने कनाडा में फैले नस्लवाद के पोल खोल दी थी। कोमागाटा मारू को ही सिख लोग गुरुनानक जहाज की ऐतिहासिक घटना के नाम से बुलाते है। इस फिल्म के माध्यम से बताया गया कि कैसे एक किराये पर लिया गया जहाज कोमागाटा मारू 375 यात्रियों को लेकर कनाडा के वैंकूवर पहुंचा था, जहां बरार्ड इनलेट के किनारे जहाज को खड़ा तो कर दिया गया लेकिन कनाडा ने उनके पहुंचने से पहले ही 3 काले कानून प्रवासियों के लिए लागू कर दिये थे।
ये जहां 4 अप्रैल 1914 को हांगकांग से वैंकुवर के लिए रवाना हुआ था.. ये जहां हांगकांग के एक सिख व्यापारी और गदर पार्टी के समर्थक बाबा गुरदित्त सिंह ने ही लीज पर लिया था। 376 यात्रियों में से 340 सिख थे, 24 मुस्लिम और 12 हिंदू लोग थे। 23 मई को लंबी यात्रा कर जब जहाज वैंकूवर के बर्रार्ड इनलेट किनारे खड़ा हुआ तब कनाडा के कंटीन्यूयस जर्नी रेगुलेशन का हवाला देकर रंगभेदी इमिग्रेशन कानून के तहत केवल 24 यात्रियों को ही उतरने दिया गया, बाकि 352 यात्रियों को जहाज पर छोड़ दिया गया। 1908 में लागू कंटीन्यूयस जर्नी रेगुलेशन को असल में एशियाई लोगों को कनाडा में प्रवेश करने से रोकने के लिए ही लागू किया गया था क्योंकि 1907 में कनाडा में एंटी एशियन दंगे हुए थे।
जिससे कनाडा के लोगो को लगा कि एशियन के यहां रहने से कनाडा को नुकसान हो रहा है, और फिर कंटीन्यूयस जर्नी रेगुलेशन लागू कर दिया था। वैसे तो उस वक्त भारत और कनाडा दोनो पर ही ब्रिटिश का शासन था तो भारतीय आसानी से कनाडा में प्रवेश कर सकते थे लेकिन इस कानून के आने के बाद ये नियम बनाया गया कि जो भी व्यक्ति अपने मूल देश से सीधा कनाडा आया है वो कनाडा में एंट्री ले सकता है लेकिन विडंबना ये थी भारत से सीधा कनाडा नहीं आया जा सकता था। उसके लिए बीच में हांगकांग या फिर जापान में पड़ाव डालना ही पड़ता था जिसका फायदा कनाडा की सरकार ने उठाया था।
जिन यात्रियों को कनाडा में नहीं उतरने दिया गया वो भी भारत से पहले हांगकांग गए थे और उसके बाद कनाडा। जिसमें ज्यादतर व्यापारी, रिटायर अधिकारी और मजदूर थे.. यात्रियों को लगा कि कुछ दिनों में सरकार मान जायेगी लेकिन इंताजर में पूरे दो महीने बीत गए। 352 यात्रियों को भूखे प्यासे बिना किसी चिकित्सा के सहायता के किनारे पर जहाज में मरने के लिए छोड़ दिया गया। लेकिन हद तो तब हो गई जब 19 जुलाई 1914 को 100 ज्यादा पुलिस वाले जहाज पर कब्जा करने के इरादे से चढ़ गए, तब जहाज को बचाने के लिए सिखों ने जहाज में मौजूद लोहे की छड़े औऱ जलने वाले कोयले से कनाडाई पुलिस का सामना किया था।
कहा जाता है कि इस झड़प की खबर कनाडा में रहने वाले दक्षिण एशियाई समुदाय को लगी तो उन्होंने चंदा इकट्ठा करके जहाज पर रहने वाले भारतीयों के कनाडा में एंट्री के लिए मुकदमा भी लड़ने की कोशिश की थी, लेकिन वो सफल नहीं हुए.. जिसके कारण आखिरकार थक हार कर सभी 352 यात्रियों को वापिस भारत भेज दिया गया था। इसी बीच पहला विश्व युद्ध भी शुरु हो गया, जिसके कारण जहाज को न तो हांगकांग औऱ न ही सिंगापुर में पड़ाव डालने दिया गया, और कई हफ्तों की यात्रा करके जहाज कोलकाता के बजबज बंदरगाह पहुंचा तो ब्रिटिश सरकार ने सिखों को जबरन कोलकाता से पंजाब जाने के लिए कहा, जिसका सिखों ने विरोध किया था।
नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजो ने उन पर गोली चला दी जिसमें 20 सिख मारे गए थे। बाबा गुरदित्त सिंह जो उस वक्त फरार हो गए थे उन्होंने अपनी किताब में उस घटना की सच्चाई बताई, कि कैसे निहत्थे सिख जो केवल श्री गुरु ग्रंथ साहिब के आसपास खड़े होकर अरदास कर रहे थे, उन पर अंग्रेजी अधिकारियों ने लाठी चलाई थी, जब सिख ने उनका विरोध किया तो उन लोगो ने गोली चला दी। रिपोर्ट के मुताबित इस घटना में 62 लोग ट्रेन से जबरन पंजाब भेज दिया गया था, हंगामा करने के आरोप में 211 यात्री गिरफ्तार कर लिया गया, 20 की मौत हो गई और 23 लोग भागने में सफल हो गये थे।
फिल्म गुरू नानक जहाज की कहानी केवल बाबा गुरदित्त सिंह के ही आसपास नहीं घूमती बल्कि गदर पार्टी में घुसपैठ करके गदर आंदोलन की खुफिया जानकारी को ब्रिटिश सेना तक पहुंचाने वाले अधिकारी विलियम हॉपकिंसन की हत्या करने वाले मेवा सिंह लोपोके के बारें में भी बताया है। फिल्म की कहानी हमारे उस इतिहास को उजागर करती है कि भले ही आज सिख कनाडा की शान है लेकिन कनाडा ने भी सिखों को जख्म देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्या आपने ये फिल्म देखी है तो हमें कमेंट करके जरूर बतायें। ये फिल्म सच के कितने पास है।































