Story of the Patiala Peg: अंग्रेजी में कई तरह की शराब के मिक्चर को कहते है कॉकटेल.. लेकिन जब बात हिंदुस्तानी भाषा की आती है तो आपको पता है कि कौन सा पेग सबसे ज्यादा फेमस है.. ऑफ्कोर्स पेग का नाम सुनकर सबसे पहले आपके भी जेहन में पंजाब का मशहूर पटियाला पेग ही आया होगा.. अब ये है ही इतना अनोखा.. नॉर्मल क्वांटिटी के कई ज्यादा और टेस्ट भी जरा हटके.. वैसे तो आपने शराब पीने के शौकिन लोगो के मुंह से शराब के तरह तरह के यूनिक नाम सुने होंगे..लेकिन पटियाला पेग सबसे ज्यादा इंडिया में फेमस हो गया.. जरा सोचा है आपके कि आखिर क्यों.. ऐसा क्या है खास पटियाला पेग में.. औऱ कैसे शुरु हुई पटियाला पेग बनाने की कहानी.. अपने इस वीडियो में हम पंजाब के सबसे मशहूर पटियावा पेग की कहानी जानेंगे.. साथ ही कैसे आज ये पंजाब की मिट्टी से निकल कर दुनिया भर में सबसे प्रचलित हिंदुस्तानी ड्रिंक्स में से एक बन गया।
पटियाला पेग की कहानी
पंजाब राज्य का एक जिला है पटियाला.. साल 1763 में फुलकियां वंश के सिद्धू जाट चौधरी बाबा आला सिंह ने पंजाब के दक्षिण पूर्वी हिस्से में, जिसे मालवा क्षेत्र कहा जाता है, वहां एक जमीन के टुकड़े पर पर किला मुबारक की नींव रखी थी। किला मुबारक के आसपास की सारी जमीन को बाबा आला ने पटी यानि की पट्टे पर ले लिया था.. और उस जमीन को आला की जमीन कहा जाता था.. जिस कारण किला मुबारक के आसपास के क्षेत्र का नाम पटियाला पड़ा। पटियाला एक समय में इस लिए भी बेहद संपन्न रियासत बन गई क्योंकि उन्होंने विदेशी अक्रमणकारियों से दुश्मनी मोल कर उनके खिलाफ लड़ने के बजाय उनसे हाथ मिलाया। चाहे वो अहमद शाह अबदाली हो या ईस्ट इंडिया कंपनी। उनके मैत्रीपूर्ण रिश्तों के कारण मुगल हो, अफगानी हो, या अंग्रेज, सभी के राज में पटियाला रिय़ासत बना रहा,.. इसी रियासत के एक राजा हुए राजा भूपिंदर सिंह।
महाराजा भुपिंदर सिंह को पटियाला का राजा घोषित किया
जब उनके पिता महाराजा सर राजिंदर सिंह जी की अकास्कमिक मृत्यु हो गई तो मात्र 9 साल की उम्र में साल 1900 में ही महाराजा भुपिंदर सिंह को पटियाला का राजा घोषित कर दिया गया। चुंकि वो 9 साल के ही थे इसलिए पटियाला की रिजेंसी काउंसिल जिसके प्रमुख सरदार बहादुर गुरमुक सिंह थे, उनके हाथों में पटियाला की जिम्मेदारी दी गई। जिन्होंने महाराजा के सही उम्र तक आने तक पटियाला को संभाला था। लेकिन चुंकि राजा तो वो ही थे.. इसलिए उनके शौक भी बड़े थे, वो क्रिकेट और पोलो खेलने के शौकिन थे, और 1911 में जब पहली ईग्लैंड की टीम द वायसरॉयस प्राइड भारत दौरे पर आई थी तब महाराजा भूपिंदर सिंह की भारतीय टीम अजय पोलो और टेंट पेगिंग का मुकाबला होना था। जिसके कप्तान खुद महाराजा थे।
ये मैच पटियाला पैग का निर्णायक परिणाम था.. हालांकि महाराजा जानते थे कि ईंग्लैंड की टीम के आगे भारतीय टीम काफी कमजोर है, और उनसे जीतना आसान नहीं है.. तो उन्होंने वो रास्ता अपनाने का फैसला किया जिसके लिये वो फेमस थे। अपनी शाही मेहमान नवाजी का.. महाराजा के दरबार में जो भी विदेशी मेहमान आता, महाराजा उसकी बड़ी राजसी तरीके से खातिरदारी करते थे। नाचने गाने, शाही व्य़ंजन से लेकर अलग अलग तरह की मंहगी शराब.. सबकुछ उनके मेहमानों को परोसा जाता था। कुछ ऐसा ही तरीका उन्होंने ईग्लैंड के खिलाड़ियों को लुभाने के लिए अपनाया था। उन्होंने मैच से ठीक एक रात पहले अपने महल में खिलाड़ियों के लिए एक भव्य समारोह रखा.. वैसे तो वो खिलाड़ियों को सम्मान के लिए रखा गया था लेकिन असली मकसद खिलाड़ियो को कमजोर और सुस्त करना था।
महाराजा ने खिलाड़ियों को परोसी शराब
इस दौरान एक बहुत बड़े बर्तन में शराब मंगवाई गई.. आम शराब की मात्रा 30 मिली लीटर होती है लेकिन महाराजा ने खिलाड़ियों को करीब 120 मिली लीटर शराब एक बार में परोसने का फैसला किया..खिलाड़ियों ने शराब का इतना बड़ा पेग पहली बार देखा था.. लेकिन महाराजा के यहां की शराब उतनी बेहतरीन होती थी कि वो इंकार ही नहीं कर सकें.. वो पीते गए.. अगले दिन मैच हुआ और जैसा कि उम्मीद थी वायसराय की टीम हैंगऑवर औऱ थकान के कारण इस मैच में हार गई। महाराजा की चाल विदेशियों को समझ तो आ गई थी लेकिन थोड़ी देर से.. औऱ उन्होंने महाराजा से इस बारे में पूछा भी, तो महाराजा ने हंसकर जवाब दिया कि आपके यहां छोटे गिलास में पीते होंगे हमारे पटियाला में तो ऐसे भी भर कर पीते हैं.. और उस 120 मिलीलीटर का पैग धीरे धीरे पूरे पटियाला में फेमस होने लगा, जिसे पटियाला का होने के कारण पटियाला पैग कहा जाता जाने लगा। आज भी पटियाला पैग सभी पैगों में सबसे ज्यादा फेमस है।














































