China treatment of Sikhs: जब बात नियत की होती है तो सबसे काले नियत में इंडिया की नेबर कंट्री चाइना को भला कैसे इग्नोर कर सकते है.. दूसरे देशों पर अपना हक जमाने, इनकी जमीनों को हथियाने और उनपर राज करने की नियत से पूरी दुनिया वाकिफ है.. इसमें आप ताइवान, तिब्बत, भारत का अरूणाचल प्रदेश को ही ले लीजिये.. ये सभी ऐसे क्षेत्र है जिसे चीन अपना कहने में जरा भी संकोच नही करता है.. खासकर 1 अक्टूबर 1949 से जब चीन में माओवाद शुरु हुआ.. तब तो विस्तारवाद की नीति ने और जोर पकड़ा.. माओत्से तुंग जिन्हें Mao Zedong के नाम से भी जाना जाता है, उनके नेतृत्व में यानआन काल का अंत करके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) ने करीब 14 सालो से चल रहे गृहयुद्ध को जीता और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ (PRC) की स्थापना की… जिसके बाद चीन के लोगो की न केवल लोकतांत्रिक शक्ति खत्म हुई बल्कि वहां रहने वाले अनगिनत सिखों को उस पीड़ा और भेदभाव से गुजरना पड़ा, जिसके बारे में हम कल्पना भी नहीं कर सकते है। अपने इस लेख में चीन की उस दमनकारी नीति को जानेंगे, जिसके कारण भारतीय सिखों को वहां से भागना पड़ा था। जानेंगे चीन ने सिखों के साथ जो बर्ताव किया वो क्यों आपकी और हमारी सोच से भी ज्यादा भयावाह है।
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1830 के दशक में अंग्रेजो ने अपनी धूर्त चाल चली
1840 के दशक का समय था.. पंजाब पर अंग्रेजी हुकुमत ने कब्जा करना शुरु कर दिया था..हालांकि अंग्रेजो ने सिखों को दबाने के बजाये उनकी ताकत को अपनी ताकत बनाने का फैसला किया और ईस्ट इंडिया कंपनी में सैनिक औऱ सरकारी अधिकारियों के तौर पर नियुक्त करना शुरु कर दिया। बेहतर जीवन औऱ सम्मान के कारण सिखों ने भी अंग्रेजो से निष्ठा रखी..चीन की ही तरह ब्रिटिश ईस्च इंडिया कंपनी की भी विस्तारवाद की नीति थी.. भारत पर सालों से कब्जा था तो सोचा क्यों न चीन की तरफ रूख किया जाये.. औऱ सेना लेकर पहुंच गए चीन के चिंग राजवंश के खिलाफ युद्ध लड़ने.. इस युद्ध को अफीम युद्ध के नाम से जाना जाता है। ये पहली बार था जब कंपनी ने अपने ब्रिटिश फौज की टुकड़ियों में सिख और पंजाबी सैनिकों को भी लड़ने भेजा था। 1830 के दशक में अंग्रेजो ने अपनी धूर्त चाल शुरु की, उन लोगो ने चीन में अवैध रूप से अफीम की तस्करी शुरु की.. जिसका नतीजा ये हुआ कि चीन के बड़ी संख्या में सैनिक और सरकारी अधिकारी अफीम के आदि हो गए थे।
यातायात को संभालने के लिए सिखों को नियुक्त किया
लेकिन 1839 में चिंग वंश के राजा ने न केवल अफीम पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया बल्कि एक बड़ी मात्रा में अफीम को जब्त कर बर्बाद कर दिया। जिससे तिलमिलाये ब्रिटिश सेना ने चीन पर हमला कर दिया.. और चीनी सेना ब्रिटिश सेना के आगे टिक नहीं सकी औऱ हार गई.. इस युद्ध में जीत के लिए सिखों की बड़ी भूमिका रही थी। वहीं चीन को कई ऐसी शर्मनाक संधि पर हस्ताक्षर करना पड़ा, जो अंग्रेजो के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुई..चीन को नानजिंग की संधि करनी पड़ी.. जिसके तहत हांगकांग को ब्रिटेन को देना पड़ा, चीन के शंघाई के बड़े बंदरगाहो को ब्रिटिश के व्यापार को खोलना पड़ा.. और अफीम को चीन में फिर से लीगल करना पड़ा। एक तरफ हांगकांग अंग्रेजो को मिला तो वहां पंजाब के सिख सैनिकों को भी जाने का वहां रहने का मौका मिला.. वहीं शंघाई में व्यापार बढ़ा तो सिखो सैनिकों, अधिकारियों औऱ व्यापारियों ने भी वहां अपनी पैठ जमाना शुरु कर दिया.. खासकर 1884 में शंघाई म्यूनिसिपल पुलिस ने क्षेत्र में लचर हो चुकी कानून व्यवस्था को सुधारने और वहां के यातायात को संभालने के लिए रौबदार और ताकतवर लंबे चौड़े सिखों को शंघाई में नियुक्त करना शुरु कर दिया था।
पहली बार में 16 सिखों को शंघाई भेजा
ये इतने ताकतवर होते थे कि उन्हें किसी को संभालने के लिए हथियारों की ज्यादा जरूरत ही नही पड़ती थी.. वो अपने बाहुबल पर बेहद भरोसा करते थे.. उनके द्वारा पहनी जाने वाली लाल पगड़ी उनके पदो को दर्शाती थी.. साथ ही ये भी कि उनसे कोई पंगा नहीं ले सकता था। पहली बार में 16 सिखों को शंघाई भेजा गया जिसमें एक इंस्पेक्टर औऱ 15 कांस्टेबल थे जिन्हें गोर्डन रोड पुलिस स्टेशन में तैनात किया गया था। धीरे धीरे चीन में सिखों की आबादी हजारों में चली गई.. लेकिन 1949 के बाद सब बदल गया… सिख धार्मिक प्रवृत्ति के होते है। उनके लिए उनके गुरुद्वारे, धार्मिक स्थल, उनका पवित्र श्री गुरु ग्रंथ साहिब, परंपराएं सभी बेहद मायने रखते है। लेकिन माओ इसके उल्टा सोचता था। वो कहता था धर्म किसी भी देश के विकास में सबसे बड़ा रोड़ा है। इसलिए देश में नास्तिक युग शुरु हुआ।
सिख धीरे धीरे चीन प्रशासन के हाथों की कठपुतली बन गए
धार्मिक स्थलो को या तो तोड़ा गया या फिर उनकी जगह पर चीनी सरकार ने अपनी प्रशासनिक दफ्तरों को बना दिया., ताकि धर्म से जुड़ी कोई सोच ही पैदा न हो। 1966 से लेकर 197 तक चीन की सभी धार्मिक स्थलो को खत्म करने का खेल खेला गया.. वहीं सिखो के बड़े पदो पर होना औऱ चीन के लोगो पर उनका शासन हो, ये माओ को पसंद नहीं था.. उसने न केवल उनकी धार्मिक स्वतंत्रता छीनी बल्कि उनके स्वतंत्र रूप से काम करने के अधिकारों को भी छीन लिया। सिख धीरे धीरे चीन प्रशासन के हाथों की कठपुतली बन गए। उनपर हमले बढ़ने शुरु हो गए.. सांस्कृतिक क्रांति के बाद सिखों के लिए अपने धर्म के साथ जीता मुश्किल हो गया था।
वो सामाजिक, धार्मिक औऱ आर्थिक रूप से भी प्रताड़ित होने लगे थे। सिखों को सार्वजनिक रूप से प्रार्थना करने और धार्मिक अनुष्ठान करने पर बैन लगा दिया गया। उन्हें केश और दाढ़ी कटवाने के लिए कहा जाता था। वहीं 1962 के इंडो चाइना वॉर के बाद तो सिखो को दुश्मन देश के नागरिको की तरह देखा जाने लगा। उनकी संपत्ति पर जबरन कब्जा किया गया.. सिखों को धीरे धीरे समझ आ गया था कि धार्मिक स्वतंत्रता के साथ अब चीन में रहना आसान नहीं है, तो उन्होंने मजबूरन चीन को छोड़ने का फैसला किया। खासकर शंघाई से। हम इस मामले में कह सकते है कि सिखों ने अपनी इच्छा से नहीं बल्कि माओ की नीतियो के कारण चीन छोड़ा था। लेकिन सिखों ने जो कुछ भी सहा, उसे भुलाया नहीं जा सकता है।














































