क्या किसी को अपने भजन से विकारमुक्त किया जा सकता है? प्रेमानंद जी महाराज से जानिए

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 02 जून 2024, 05:30 AM Updated: 02 जून 2024, 05:30 AM
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कहते हैं भगवान के नाम में इतनी शक्ति होती है कि उनके नाम मात्र से ही आपके जीवन के सारे पाप धुल जाते हैं। इतना ही नहीं अगर कोई सच्चे मन से भगवान को याद करता है तो भगवान खुद उसके जीवन के सारे कष्ट और दुख हर लेते हैं। यहां तक ​​कि अगर आप किसी कथा में जाकर सिर्फ भगवान की कथा सुनते हैं तो भी आपके कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए जितना हो सके भगवान का नाम लेना चाहिए। हालांकि कुछ लोगों का मानना ​​है कि अगर वो किसी को अपना भजन सुनाते हैं तो सामने वाले के पाप भी धुल जाते हैं, हालांकि ये पूरी तरह सच नहीं है। दरअसल अगर आप अपने भजन से किसी के पाप धोना चाहते हैं तो इसके पीछे भी एक शर्त होती है जिसके बारे में वृंदावन के श्रीहित प्रेमानंद महाराज जी ने अपने हालिया सत्संग में बताया है। आइए आपको बताते हैं प्रेमानंद महाराज जी ने क्या कहा।

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क्या कहा प्रेमानंद महाराज जी ने?

हाल ही में एक भक्त महाराज जी के दरबार में आया और उनसे पूछा कि क्या किसी को अपने भजन से विकारमुक्त किया जा सकता है? जिसके जवाब में महाराज जी ने कहा कि किसी और के पाप मिटाने से पहले हमें अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब तक व्यक्ति भीतर से सही नहीं होगा, वह दूसरों को कैसे सुधारेगा। अगर व्यक्ति खुद पापों से भरा है, तो वह दूसरों को कैसे सुधार सकता है। महाराज जी ने कहा कि सबसे पहले व्यक्ति को भगवान का इतना नाम जपना चाहिए कि वह खुद विकारों से मुक्त हो जाए, इसके बाद उसे अपने भीतर इतना भजन जमा करना चाहिए कि वह दूसरों को विकारों से मुक्त कर सके। महाराज जी ने कहा कि अगर हम गंदे कपड़े से दर्पण साफ करते हैं, तो दर्पण खुद गंदा हो जाता है, इसीलिए व्यक्ति को पहले भगवत कि प्राप्त करना चाहिए क्योंकि भगवान को भजन करने वाले व्यक्ति द्वारा ही विकारो को मुक्त किया जाता है। अगर व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार और पापों को खत्म नहीं करता है, तो वह दूसरों का भला कैसे कर सकता है। जब हम खुद विकारों से भरे होंगे, तो हम दूसरों को विकारों से कैसे मुक्त कर सकते हैं। महाराज जी कहते हैं कि यदि हम स्वयं विकारी हैं और दूसरों को निर्विकारी बनाने का प्रयास करेंगे तो हम असफल हो जाएंगे। इसलिए पहले हमें ईश्वर के मार्ग में स्वयं को शुद्ध बनाना होगा, तभी हमारा उपदेश दूसरों के लिए कारगर होगा। यदि हम अशुद्ध मन से किसी को उपदेश देंगे तो न तो सुनने वाले को और न ही सुनाने वाले को उसका लाभ होगा।

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