Gyanesh Kumar: जनता भरोसा करती है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष काम करेगा, लेकिन जब आयोग के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ऐसे गंभीर आरोप लगने लगें तो भरोसा डगमगाना लाजिमी है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार पर आरोप है कि उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए, जिनमें बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं ली गई।
यहां तक कि दोनों मेंबर्स की लिखित आपत्तियों को दरकिनार करते हुए, उन्होंने एकतरफा तरीके से मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और मुख्य फॉर्म में बदलाव कर दिए। तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं कि आखिर क्या है पूरा मामला और सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या कहना है।
Gyanesh Kumar के खिलाफ SC में PIL दायर
दरअसल, मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इसमें मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़े उनके मनमाने और एकतरफा फैसलों को रद्द करने तथा उन पर आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई है। वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि ये फैसले आयोग के अन्य दो सदस्यों की सहमति के बिना लिए गए थे।
याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?
वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दायर इस याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के कुछ अधिकारियों पर बेहद गंभीर और चौंकाने वाले आरोप लगाए गए हैं। जैसे:
बहुमत के नियम का उल्लंघन
याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023’ की धारा 18 का उल्लंघन किया है। इस नियम के मुताबिक आयोग के सभी फैसले बहुमत या सर्वसम्मति से होने चाहिए, लेकिन ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) ने अन्य दोनों चुनाव आयुक्तों (डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी) की असहमति और आपत्तियों को दरकिनार कर एकतरफा फैसले लिए।
13 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाना
याचिका का सबसे बड़ा आरोप यह है कि मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के दौरान देशभर के 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कथित तौर पर करीब 13 करोड़ पात्र मतदाताओं के नाम नियमों को ताक पर रखकर हटा दिए गए।
वोटर रजिस्ट्रेशन फॉर्म (Form 6) में अवैध बदलाव
आरोप है कि वैधानिक और कानूनी रूप से तय ‘फॉर्म 6’ (नया वोटर आईडी बनाने का फॉर्म) में बिना किसी तय कानूनी प्रक्रिया के, पोर्टल पर मनमाने बदलाव कर दिए गए। इसमें पूर्वजों (Ancestry) से जुड़ी अनिवार्य घोषणाएं जोड़ दी गईं, जिसका बाकी सदस्यों ने विरोध किया था।
पश्चिम बंगाल में 16.10 लाख फर्जी अपील
याचिका में यह गंभीर खुलासा किया गया है कि पश्चिम बंगाल में न्यायिक अधिकारियों द्वारा बहाल किए गए मतदाताओं के खिलाफ चुनाव आयोग (ECI) के नाम पर 16.10 लाख अपीलें ट्रिब्यूनल में दायर कर दी गईं। आरोप है कि इन अपीलों के बारे में न तो बाकी चुनाव आयुक्तों को पता था और न ही राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) को इसकी जानकारी थी। इसे मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित करने की एक साजिश बताया गया है।
डेटाबेस का एकतरफा केंद्रीयकरण
याचिका में कहा गया है कि ECINet और ERONet सॉफ्टवेयर में बदलाव करके मतदाता सूची के डेटाबेस का केंद्रीयकरण कर दिया गया, जिसके कारण योग्य मतदाताओं का नाम दोबारा जोड़ना मुश्किल हो गया।
संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन और जालसाजी
याचिका के अनुसार, आधिकारिक कर्तव्यों के नाम पर चुनावी रिकॉर्ड में हेरफेर करना या जालसाजी करना किसी भी तरह से ड्यूटी का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसलिए ज्ञानेश कुमार को किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा (Immunity) नहीं मिलनी चाहिए और उनके खिलाफ एक ‘आम आरोपी’ की तरह आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का इस पर क्या कहना है?
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) के खिलाफ यह जनहित याचिका 25 सितंबर 2026 को ही सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है। चूंकि यह याचिका बिल्कुल नई है, इसलिए अभी तक इस पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने औपचारिक सुनवाई शुरू नहीं हुई है और न ही अदालत ने इस पर कोई अंतिम फैसला या टिप्पणी दी है।
कानूनी विशेषज्ञों और इस मामले के घटनाक्रम के अनुसार, आने वाले दिनों में जब यह मामला सुनवाई के लिए सूचीबद्ध (Listed) होगा, तब कोर्ट का रुख स्पष्ट होगा।
याचिका (PIL) अभी सिर्फ फाइलिंग स्टेज पर है। सुप्रीम कोर्ट पहले यह तय करेगा कि क्या यह याचिका सुनवाई के योग्य (Admissible) है या नहीं। यदि कोर्ट इसे स्वीकार करता है, तो वह मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर उनका आधिकारिक जवाब मांग सकता है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) को उनके पद से केवल उसी प्रक्रिया (महाभियोग/Impeachment) से हटाया जा सकता है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। इसलिए, कोर्ट सीधे किसी आदेश के जरिए CEC को बर्खास्त नहीं कर सकता; इसके लिए संसद में प्रस्ताव पास होना जरूरी है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने उनके फैसलों को रद्द करने और आपराधिक जांच की मांग की है, जिस पर कोर्ट विचार कर सकता है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि पूर्व में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के पहले चरण को लेकर जब आपत्तियां उठी थीं, तब सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के संवैधानिक अधिकारों के दायरे को ध्यान में रखते हुए उन तर्कों को खारिज कर दिया था। लेकिन इस बार मामला ‘आंतरिक बहुमत के उल्लंघन’ और ’13 करोड़ मतदाताओं के नाम कटने के गंभीर आरोपों’ का है, इसलिए कोर्ट का अगला कदम बेहद महत्वपूर्ण होगा।












































