Gurudwara Shri Kuhni Sahib: पंजाब सिख धर्म का गढ़ है, यहां से पहली बार सिख धर्म की शुरुआत हुई,.. पहले गुरु गुरु नानक देव जी का जन्म स्थान यहीं पंजाब है.. सिख धर्म की शुरुआत से लेकर यहां अनगिनत ऐसी निशानियां है, जो न केवल संतो और गुरुओ को समर्पित है बल्कि सिखों धर्म से जुड़े वीर सिख लडाकों के सम्मान में भी काफी धरोहरे मौजूद है। जिसमें सिख गुरुद्वारो को हम सबसे पहली निशानी के तौर पर देखते है। गुरु साहिब के महानता को दर्शाता हुआ ऐसा ही एक गुरुद्वारा है गुरुद्वारा श्री कोहनी साहिब.. जो दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी के इस तप की याद दिलाया है जब वो 51 घंटो तक बिना रूके कोहनी के बल पर बैठ कर तप करते रहे थे। अपने इस लेख में हम गुरुद्वारा श्री कोहनी साहिब के बारे में जानेंगे।
जानें Gurudwara Kuhni Sahib का इतिहास?
पंजाब और हरियाणा की राजधानी चंडीगढ़ और पंचकूला के बॉर्डर पर एक शहब है मनीमाजरा… इसी शहर में मौजूद है भैंसा टिब्बा नाम का गांव.. ये नाम शायद थोड़ा अटपटा है.. लेकिन ये स्थान हर एक सिख के लिए बेहद पवित्र है। क्योंकि यइस स्थान पर दसवे पातशाह के चरण कमल पड़े थे। सिक्खी इतिहास के मुताबिक 1688 में जब गुरुसाहिब भंगानी का युद्ध लड़ने गए हुए थे, वहीं दूसरी तरफ भैंसा टिब्बा गांव में एक ब्राह्मण कन्या अन्नपूर्णा, गुरु साहिब की परम भक्त थी वो गुरु साहिब के दर्शन के लिए उनकी अरदास लगा रही थी। 1789 में गुरु साहिब ने भंगानी की युद्ध जीता और अपने सैनिकों के साथ वो शिवालिक की पहाड़ियों से होते हुए भैंसा टिब्बा गांव पहुंचे। अन्नपूर्णा और गांव वालो ने गुरु साहिब और उनके सभी सैनिकों का भव्य स्वागत किया… गुरु साहिब इस दौरान 7 दिनों तक भैंसा टिब्बा गांव में रहे थे।
क्यों कहा गया गुरुद्वारा श्री कोहनी साहिब
जहां उन्होंने आध्यत्म की शक्ति को दिखाते हुए 51 घंटो तक कोहनी के सहारे ध्यान किया था। इस समय अन्नपूर्णा उनकी पूरे दिल से सेवा में लगी रही.. जिससे गुरु साहिब ने प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया कि वहां गुरुद्वारा से पहले अन्नपूर्णा का मंदिर बनेगा.. जिसका महत्व हमेशा से गुरुद्वारे के बराबर ही होगा। तब से इस स्थान को बगीचा साहिब के नाम से जाना जाने लगा, लेकिन साल 1936 में संत बाबा जीवाला सिंह जी हरखोवाल इस बगीचे में आये थे। जहां उन्हें गुरु साहिब उस स्थान पर होने के महत्व का पता चला। और उन्होंने वहां एक गुरुद्वारा बनावाना शुरु कर दिया.. जिसे गुरुद्वारा श्री कोहनी साहिब कहा गया। इसे आम भाषा में गुरुद्वारा कूहनी साहिब भी कहा जाता है। इस गुरुद्वारे की देखभाल संत गढ़ हरखोलाव संप्रदाय ही करता है।
2016 में हुआ गुरूद्वारे का जीर्णोधार
हालांकि समय के साथ जब ये जर्जर होने लगा तब साल 2016 में इसका फिर से जीर्णोधार किया गया। और उसे सफेद संगमरमर की भव्य इमारत बनाई गई, जो पहले से ज्यादा बड़ा बनवाया गया था। यहां हर साल 26 जनवरी को ऐतिहासिक जोर मेले का आयोजन किया जाता है, तो वहीं संत बाबा मेहर सिंह जी की पुण्यतीथि पर भी यहां धार्मिक मेला लगता है.. ये गुरुद्वारा भक्तो के लिए 24 घंटे सातों दिनों तक खुला रहता है, हालांकि सुबह 4 बजे से रात 10 बजे तक आने का समय बेहतर माना जाता है। वहीं भक्तो के लिए लंगर की व्यवस्था मौजूद है। ये गुरूद्वारा हिंदू और सिख धर्म के बीच अनमोल प्रेम और भक्ति का प्रतीक है.. जहां एक हिंदू भक्त की पुकार पर सिख गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी अपने भक्त से न केवल मिलने पहुंचे, बल्कि उसकी भक्ति से खुश होकर उसे हमेशा पूजे जाने का.. सम्मानित किये जाने का वरदान भी दिया। ये स्थान गुरु साहिब के तप, त्याग, भक्ति और सम्मान के प्रतीक के रूप में पहचाना जाता है।













































