Israel election results 2026: हमास के 7 अक्टूबर 2023 के भीषण हमलों और उसके बाद ग़ज़ा, लेबनान व ईरान के साथ चले लंबे युद्धों के बाद इसराइल में हुए पहले आम चुनाव के अंतिम नतीजों ने देश की सियासत को बड़े धर्मसंकट में डाल दिया है। 120 सदस्यों वाली इसराइली संसद (नेसेट) में किसी भी बड़े धड़े को सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों का जादुई आंकड़ा हासिल नहीं हो सका है। कार्यवाहक प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन 53 सीटों पर सिमट गया है, जबकि उनके मुख्य प्रतिद्वंद्वी गादी आइज़नकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन ‘चेंज ब्लॉक’ को 48 सीटें मिली हैं। इस त्रिशंकु जनादेश के बीच दो अरब दलों के गठबंधनों ‘द जॉइंट लिस्ट’ और ‘यूनाइटेड अरब लिस्ट (राम)’ ने सारे समीकरणों को ध्वस्त करते हुए रिकॉर्ड 19 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इसके साथ ही इसराइल में अगली सरकार बनाने की चाबी अब इन अरब दलों के हाथ में आ गई है।
दो दशकों का रिकॉर्ड मतदान, राष्ट्रपति बोले- ‘खुले दिमाग से आएं’| Israel election results 2026
यरुशलम स्थित अपने आधिकारिक आवास पर राजनीतिक स्थिति की समीक्षा करते हुए इसराइल के राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने चुनाव में 77.7 प्रतिशत के भारी मतदान की सराहना की। यह पिछले दो दशकों से अधिक समय में देश का सबसे बड़ा मतदान प्रतिशत है। राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने कहा, “यह इसराइली समाज के लिए बेहद गर्व का विषय है और यह दिखाता है कि देश में लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं।”
राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि उन्हें अगले हफ्ते औपचारिक नतीजे मिल जाएंगे, जिसके बाद वे सभी राजनीतिक दलों के साथ विचार-विमर्श शुरू करेंगे। सरकार गठन की इस पेचीदा प्रक्रिया में कई हफ्ते लग सकते हैं। राष्ट्रपति ने नेताओं को चेताते हुए कहा, “हमें किसी भी सूरत में चुनाव के एक और दौर से बचने की पूरी कोशिश करनी होगी। इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि बातचीत के लिए आने वाले सभी नेता खुले दिमाग से मेज पर बैठेंगे।” यदि बातचीत बेनतीजा रही, तो देश को फिर से नए चुनावों की ओर धकेल दिया जाएगा।
नेतन्याहू और आइज़नकोट के अपने-अपने दावे
चुनाव नतीजे सामने आते ही दोनों प्रमुख खेमों ने सरकार बनाने का दावा ठोक दिया है। शुरुआती एग्जिट पोल्स में जब विपक्षी गठबंधन को 52 से 53 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया था, तब तेल अवीव में याशर पार्टी मुख्यालय से कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए गादी आइज़नकोट ने कहा था कि जनता ने बदलाव के हक में मुहर लगा दी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा विफल सरकार जनविश्वास खो चुकी है और वे अपने साथियों के साथ मिलकर एक मजबूत ज़ायोनिस्ट सरकार बनाएंगे।
हालांकि, जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ी, रुझान बदलते गए। मतगणना पूरी होते-होते नेतन्याहू के गुट ने 53 सीटें हासिल कर लीं। यह आंकड़ा एग्जिट पोल के अनुमानों से तो बेहतर रहा, लेकिन पिछली संसद के मुकाबले उनकी 15 सीटें कम हो गईं। इसके बावजूद लिकुड मुख्यालय पहुंचे नेतन्याहू ने दावा किया कि दक्षिणपंथी गुट ने बड़ा जनसमर्थन पाया है। उन्होंने साफ लहजे में कहा, “हमें एक मजबूत दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सरकार बनानी होगी। ज़ायोनी-विरोधी अरब दलों पर निर्भर कोई भी सरकार बनाकर इसराइल की सुरक्षा को दांव पर लगाना किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
इधर, हार की आशंका और गतिरोध के बीच लिकुड पार्टी ने चुनाव प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए। पार्टी ने बिना किसी ठोस सबूत के आरोप लगाया कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए रिश्वतखोरी, धमकियां, धोखाधड़ी और प्रतिबंधित सॉफ्टवेयर का सहारा लिया गया है। केंद्रीय चुनाव समिति ने इन आरोपों पर संज्ञान लेते हुए कहा है कि वह चुनावी समीक्षा के तहत इन दावों की निष्पक्ष जांच करेगी।
अरब नागरिकों का रिकॉर्ड मतदान बना ‘गेम चेंजर’
इस चुनाव का सबसे चौंकाने वाला पहलू अरब मतदाताओं की भारी भागीदारी रही। इसराइल की कुल आबादी का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा अरब मूल के नागरिकों का है, जो खुद को इसराइल के फिलिस्तीनी नागरिक बताते हैं। हाइफ़ा के पास रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता महदी काबाहा ने इन नतीजों को ऐतिहासिक करार देते हुए कहा कि अरब नागरिक अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और व्यवस्था में वास्तविक हिस्सेदारी के लिए घरों से बाहर निकले।
जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबारीन ने बताया कि अरब मतदाताओं में इस बार भारी गुस्सा था। लोग अति-दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर की नीतियों, वेस्ट बैंक के विलय की धमकियों और समुदाय के खिलाफ लगातार दिए जाने वाले बयानों से बेहद नाराज थे और उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाना चाहते थे।
सरकार गठन का पेचीदा गणित और शर्ते
मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, अगर विपक्षी ‘चेंज ब्लॉक’ (48 सीटें) और अरब दल (19 सीटें) साथ आते हैं, तो वे मिलकर 67 सीटों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल कर सकते हैं। यूनाइटेड अरब लिस्ट के प्रमुख मंसूर अब्बास ने कहा कि वे चेंज ब्लॉक के साथ मिलकर 61 से ज्यादा सीटों की स्थिर सरकार बनाने को तैयार हैं। वामपंथी डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने भी जोर दिया कि नस्लवाद को दरकिनार कर अरब दलों की साझेदारी से एक प्रगतिशील सरकार बनाई जानी चाहिए।
हालांकि, यह राह आसान नहीं दिखती। विपक्षी नेता आइज़नकोट पहले ही कह चुके हैं कि किसी भी समझौते से पहले अरब दलों को इसराइल को एक यहूदी-लोकतांत्रिक मुल्क मानना होगा और हमास को आतंकी संगठन स्वीकार करना होगा। दूसरी तरफ, आइज़नकोट के गठबंधन में शामिल अन्य दक्षिणपंथी दल अरब पार्टियों से हाथ मिलाने को तैयार नहीं हैं। इस पर पलटवार करते हुए यूसुफ जबारीन ने दो टूक कहा, “विपक्षी दल हम पर कोई शर्त नहीं थोप सकते। अगर वे वाकई एक खतरनाक और अति-दक्षिणपंथी निजाम को हटाना चाहते हैं, तो उन्हें बराबरी से मेज पर बात करनी होगी।”
जनता में निराशा और सुरक्षा की चिंताएं
इस चुनाव को इसराइल के इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ माना जा रहा था, जहां 7 अक्टूबर की सुरक्षा चूक, बंधकों की वापसी, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों की सेना में अनिवार्य भर्ती और न्यायिक सुधारों जैसे मुद्दों पर जनता को फैसला लेना था।
कफर साबा की रहने वाली अविगैल लेविन, जिनके परिवार के सदस्य किबुत्ज़ बे’एरी में मारे गए थे, ने नतीजों पर गहरी मायूसी जताई। उन्होंने कहा, “हमें नए नेतृत्व की सख्त जरूरत थी। जो लोग 7 अक्टूबर के नरसंहार के वक्त सत्ता में थे और जिन्होंने जिम्मेदारी नहीं ली, उन्हें सत्ता में रहने का कोई हक नहीं।” वहीं, रमात गान के निवासी गैल का मानना था कि अरब दलों का संसद में ताकतवर होना सुरक्षा के नजरिए से चिंता पैदा करता है, इसलिए उन्होंने नेतन्याहू के पक्ष में वोट दिया। अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति हर्ज़ोग की बैठकों पर टिकी हैं कि क्या इसराइल को कोई नई दिशा मिलेगी या देश एक बार फिर चुनावी भंवर में फंस जाएगा।












































