JK Temple: उत्तर प्रदेश के कानपुर में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जिसका निर्माण वैसे तो 1960 में ही पूरा हो चुका था, लेकिन वहां आज 66 साल बाद भी काम कभी बंद नहीं होता। जेके मंदिर (श्री राधाकृष्ण मंदिर) अपनी भव्यता के साथ-साथ एक बेहद अनोखी परंपरा के लिए भी जाना जाता है।
आम जनता के लिए खोले जाने के बाद से लेकर इस मंदिर परिसर में आज भी निर्माण और रखरखाव का काम निरंतर जारी रहता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यहाँ आज भी रोज़ाना कम से कम एक ईंट ज़रूर लगाई जाती है। सिंघानिया परिवार द्वारा निर्मित इस ऐतिहासिक मंदिर के शिलान्यास से लेकर ‘काम रुकना नहीं चाहिए’ के संकल्प के पीछे एक बेहद रोचक कहानी छिपी है।
और पढ़ें: जानिए कौन थीं नीम करोली बाबा की पत्नी राम बेटी देवी, बाबा के जीवन का वो सच | Neem Karoli Baba wife
JK Temple की अनोखी मान्यता
JK Temple (श्री राधाकृष्ण मंदिर) का मुख्य और बुनियादी निर्माण वर्ष 1960 में ही पूरी तरह संपन्न हो गया था। इसी वर्ष मंदिर के द्वार आम जनता और श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए पूरी तरह खोल दिए गए थे। 1960 में मुख्य काम पूरा होने के बावजूद, यह मंदिर आज भी अपनी “कभी न रुकने वाले निर्माण कार्य की अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है।
कानपुर के लोगों और जेके मंदिर के इतिहास में यह बात गहराई से जुड़ी है कि मंदिर का ढांचा पूरी तरह तैयार होने के बाद भी यहां काम कभी नहीं रुकना चाहिए। दशकों से प्रचलित है कि जेके मंदिर परिसर में अगर लगातार निर्माण या मरम्मत का काम चलता रहे, तो मंदिर बनवाने वाले सिंघानिया परिवार का कारोबार और शोहरत लगातार बढ़ती रहती है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी दिन मंदिर परिसर में कोई बड़ा निर्माण कार्य न हो रहा हो, तो भी कम से कम एक ईंट रखकर ही सही, लेकिन निर्माण या मरम्मत का यह सिलसिला टूटने नहीं दिया जाता है। यही वजह है कि आज भी परिसर के रख-रखाव, सौंदर्यीकरण या किसी न किसी सुधार का काम यहां साल के 365 दिन चलता रहता है।
मां की इच्छा और मंदिर की स्थापना
इस भव्य कृष्ण धाम के निर्माण की कहानी सिंघानिया परिवार के प्रसिद्ध उद्योगपति कमलापति सिंघानिया की धर्मपत्नी श्रीमती रामप्यारी देवी की इच्छा से शुरू हुई थी। वृंदावन के मंदिरों के दर्शन के दौरान उनके मन में कानपुर में भी ऐसा ही एक भव्य राधा-कृष्ण मंदिर (JK Temple) बनवाने का विचार आया था। मंदिर की नींव 25 जुलाई 1942 को सिंघानिया परिवार की सुपुत्री पद्मावती सिंघानिया द्वारा रखी गई थी।
वर्ष 1953 तक इसका बुनियादी कार्य पूरा हुआ और 1960 में इसे आम जनता के दर्शन के लिए खोल दिया गया। यह मंदिर प्राचीन और आधुनिक वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि इसका मुख्य द्वार पृथ्वी, फव्वारा जल, यज्ञ स्थान अग्नि, विशाल हॉल वायु और इसका भव्य गुंबद आकाश तत्व (पंचतत्वों) को प्रदर्शित करता है।













































