पंजाब के सिख सरदारों ने कैसे बनाया उत्तर भारत की राजनीति में अपना प्रभुत्व? Punjab Political History

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 17 Jun 2026, 05:26 PM | Updated: 17 Jun 2026, 05:26 PM

Punjab Political History: एक कहावत सुनी है आपने घर का भेदी लंका ढाये.. ये कहानत केवल लंका ढाने के लिए ही नहीं बनी है.. सच तो ये है कि सिख सम्राज्य के पतन के पीछे भी ये कहानत सबसे सटीक उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। वजह.. वजह हम आपको बताते है..सिख जो अपने अदम्य साहस, वीरता और युद्ध कौशल के लिए जाने जाते रहे है… सिख सम्राज्य को अजेय किला बनाने में पहले महाराजा रणजीत सिंह ने पूरा जीवन लगा दिया।

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लोगो की गद्दारी की वजह से अजय किले को भेदा

उनके युद्ध कौशल औऱ सूझबूझ के साथ साथ सेना की ताकत के आगे क्या अफगान और क्या अंग्रेज, सभी थर थर कांपते थे, एक ऐसा सम्राज्य जिस पर अधिकार करने का सपना हर कोई सजाता था लेकिन कुछ लोगो की गद्दारी ने न केवल इस अजेय किले को भेद दिया बल्कि उसके सिख सम्राज्य कभी खड़ा नहीं हो सका.. लेकिन सिखों की ताकत असल में उससे करीब 50 साल पहले ही मजबूत हो जाती, मगर आपसी तालमेल न होने के कारण सिख का शासन ज्यादा समय तक मजबूत नहीं रह सका था।

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सिख सम्राज्य को मजबूत बनाने का मौका

मशहूर लेखक सरबप्रीत सिंह द्वारा लिखित पुस्तक “काल्ड्रॉन, स्वॉर्ड एंड विक्ट्री: द राइज़ ऑफ़ द सिख्स” में पहली बार उस स्थिति को दर्शाया गया जब सिखों ने दिल्ली पर कब्जा करने का पूरा मौका था, सिख सम्राज्य को मजबूत बनाने का मौका था लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकें। दरअसल ये बात साल 1771 की है, तब अंग्रेजी हुकुमत अपने पाव पसार चुकी थी और मुगल सम्राट शाह आलम करीब 6 सालो से अंग्रेजी हुकुमत की निगरानी में इलाहाबाद में कैद हो कर रह गए थे। दिल्ली में उस वक्त शाह आलम के नाम पर नजीब खान रोहिल्ला शासन कर रहा था।

नजीब खान रोहिल्ला बीमार और कमजोर शासक

शाह आलम फिर से दिल्ली की सत्ता चाहते थे, लेकिन अंग्रेजो ने धूर्तता करते हुए शाह आलम के एक दरबारी, मुनीर-उद-दौला को अपने पाले में मिला लिया, एक निश्चित पेंशन देकर शाह को इलाहाबाद में कैद में रख दिया.. दुनिया को दिखाने के लिए था कि शाह आलम ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे है लेकिन असल में वो कठपुतली बन कर रह गए थे। वहीं नजीब खान रोहिल्ला बीमार और कमजोर शासक थे, वहीं ये वो दौर था जब सिख एक मजबूत समुदाय बन गया था औऱ पूरे पंजाब के साथ साथ सरहिंद के जिलों के साथ-साथ आज के हरियाणा और यमुना और गंगा नदियों के बीच स्थित ऊपरी दोआब के क्षेत्रों के मालिक सिख बन चुके थे। सिख मजबूत हो रहे थे, इसलिए वो चाहते थे कि शाह आलम दिल्ली लौटे.. उन्होंने कई चिटठी लिखी, उन्ही में से एक चिट्ठी 1768 में सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया ने भी लिखी थी।

शाह को सिखों पर पर भरोसा नही

जस्सा सिंह ने शाह से कहा कि अगर वो दिल्ली लौट आते है तो सिख उन्हें पूरा सम्राज्य दें देंगे। मगर यहां शाह ने सिखों पर विश्वास नहीं किया.. उसे डर था कि सिख सरदार एकजुट होकर उसके खिलाफ कोई ष़ड्यंत्र कर सकते है, और अपने हाथों की कठपुतली किसी मुगल को दिल्ली की सत्ता पर बिठा देंगे.. सत्ता पर काबिज होगा कोई और और शासन होगा सिखों का। लेकिन यहां सिखों ने विवेक से काम लिया और इंतजार किया शाह के जवाब का.. मगर शाह को सिखों पर पर भरोसा नही था…इसलिए शाह आलम  ने मराठा सरदारों के पास एक दूत भेजकर औपचारिक रूप से उनका समर्थन मांगा। वहीं माधाजी सिंधिया का पहले से उन्बें समर्थन था।

9 फरवरी 1771 को मराठों ने दिल्ली पर अपना कब्जा कर लिया, जिसेक बाद एक समझौता हुआ जिसके तहत मराठों को 25 लाख रुपये दिए गए औऱ उन्हें मेरठ और उसके आसपास के जिले दिए जाने की बात हुई, बदले में शाह आलम को दिल्ली की सत् मिलेगी। वहीं दिल्ली का मुद्दा भूल कर सिखों ने पंजाब के सिख मिसल सरदारो ने कृषि भूमि और उत्तरी व्यापार मार्ग पर कंट्रोल कर लिया.. मध्य एशिया और भारत का मुख्य केंद्र होने के कारण सिखों को अच्छा खासा कर मिलता था जिससे वो आर्थिक रूप से ताकतवर होते चले गए।

लेकिन मिसलो में बंटे होने के कारण उनकी ताकत भी बंटी हुई थी, सही मायने में अगर महाराजा रणजीत सिंह जैसा नेतृत्व 1770 के दशक में होता तो दिल्ली तक सिखों का शासन होता, जो सिखों को एकजुट करके पूरे उत्तर भारत में सिखों के वर्चस्व को बहुत मजबूत बना देते। लेकिन उनकी दूरदर्शिता की कमी के कारण पंजाब में सिखो का शासन केवल पंजाब तक सिमट गया था। सिख मिसलों की आपसी एकजुटता की कमी ने सिख सम्राज्य को कहीं न कहीं कई दशक पीछे पहुंचा दिया था।

ये बहद अफसोस की बात है कि सिखों का मजबूत सम्राज्य महाराजा रणजीत सिंह के शासन काल में ही बना.. लेकिन उनकी मृत्यु के बाद सिख सम्राज्य फिर पतन की तरफ चला गया था, लेकिन इस बार आपसी तालमेल की कमी से नहीं बल्कि धोखे के कारण। अगर खालसा सेना के कुछ लोगो ने अंग्रजो से हाथ न मिलाया होता तो सिख सम्राज्य की स्थिति शायद कुछ और होती। आपको क्या लगता है क्या सिख दूरदर्शी सोच को दिखाते तो दिल्ली पर कब का सत्ता स्थापित कर सकते थे। हमें कमेंट करके जरूर बतायें।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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