Pakistan internal crisis: पाकिस्तान इस समय अपने सबसे बड़े आंतरिक और भौगोलिक संकट का सामना कर रहा है। बलूचिस्तान से लेकर खैबर पख्तूनख्वा, गिलगित-बाल्टिस्तान, सिंध और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) तक, देश के लगभग हर हिस्से में असंतोष और विद्रोह की आवाजें तेज हो गई हैं। विश्लेषकों और जानकारों का मानना है कि सत्ता, सेना और संसाधनों का नियंत्रण केवल एक प्रांत पंजाब और रावलपिंडी स्थित सैन्य मुख्यालय (GHQ) तक सीमित रहने की वजह से देश 6 हिस्सों में बंटने की राह पर बढ़ता दिखाई दे रहा है।
रावलपिंडी और पंजाब का एकछत्र राज बना असंतोष की वजह| Pakistan internal crisis
पाकिस्तान की राजनीति, सेना और प्रशासनिक तंत्र में दशकों से पंजाब का वर्चस्व रहा है। देश की 50 फीसदी से ज्यादा आबादी पंजाब प्रांत में है, लेकिन आरोप है कि 80 फीसदी से अधिक सैन्य अफसर, शीर्ष नौकरशाह और फैसले लेने वाले मुख्य केंद्र इसी एक प्रांत से ताल्लुक रखते हैं। रावलपिंडी में स्थित सैन्य मुख्यालय (GHQ) को ही देश की असल सरकार माना जाता है, जबकि प्रधानमंत्री और संसद केवल औपचारिक चेहरे बनकर रह गए हैं। इस सिस्टम ने दूसरे प्रांतों में यह भावना पैदा कर दी है कि उनके रिसोर्स का इस्तेमाल किया गया है और उन्हें नज़रअंदाज़ किया गया है।
वे 6 क्षेत्र जहां तेज हो रही हैं बगावत की आवाजें:
- बलूचिस्तान: यहां विद्रोह की स्थिति सबसे गंभीर है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनकी प्राकृतिक गैस, सोना और रणनीतिक ग्वादर पोर्ट का फायदा पंजाब को दिया जा रहा है, जबकि स्थानीय जनता बुनियादी सुविधाओं और गरीबी से जूझ रही है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के हमले नियमित रूप से सामने आ रहे हैं और यह स्थिति सीधे स्वतंत्रता आंदोलन का रूप ले चुकी है।
- खैबर पख्तूनख्वा: अफगानिस्तान सीमा से सटे इस प्रांत में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) की सक्रियता और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ भारी नाराजगी है। पख्तून समुदाय का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ अभियानों के नाम पर उनके इलाके को लंबे समय से जंग के मैदान में तब्दील कर दिया गया है।
- सिंध: यहां ‘सिंधुदेश’ की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। सिंध के लोगों का आरोप है कि कराची से होने वाली भारी कमाई और सिंधु नदी का पानी पंजाब की ओर मोड़ा जाता है, जिसके चलते कराची समेत पूरे प्रांत में पानी और बिजली का गंभीर संकट बना हुआ है।
- गिलगित-बाल्टिस्तान: इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने अब तक पूर्ण संवैधानिक दर्जा नहीं दिया है। स्थानीय लोगों की शिकायत है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के नाम पर उनकी जमीनें दी जा रही हैं, जबकि स्थानीय युवाओं के पास रोजगार के अवसर नहीं हैं।
- पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (PoK): मुजफ्फराबाद से लेकर मीरपुर तक आटे, बिजली की कीमतों और बुनियादी अधिकारों को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां के प्रदर्शनकारी खुले तौर पर इस्लामाबाद की नीतियों के खिलाफ सड़कों पर हैं।
- पंजाब के भीतर विभाजन (सरायकी मांग): असंतोष की आंच अब खुद पंजाब के भीतर भी पहुंच चुकी है। दक्षिणी पंजाब के लोग अलग ‘सरायकी प्रांत’ की मांग उठा रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि विकास योजनाएं और बजट केवल लाहौर और उत्तरी पंजाब तक ही सीमित रखे जाते हैं।
1971 के इतिहास की आहट
यह स्थिति 1971 के उस घटनाक्रम की याद दिलाती है जब तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के लोगों के अधिकारों और संसाधनों की अनदेखी के चलते देश दो टुकड़ों में बंट गया था। मौजूदा हालात यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या एक ही प्रांत और सैन्य केंद्र पर टिकी व्यवस्था इस बड़े असंतोष को संभाल पाएगी या पाकिस्तान एक नए विभाजन की ओर बढ़ रहा है।










































