अपने ‘लेखनी’ को तलवार बनाकर मनुवादी मानसिकता को झकझोरने वाली लेखिका के संघर्ष की कहानी

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 09 सितम्बर 2023, 05:30 AM Updated: 09 सितम्बर 2023, 05:30 AM
Google News
Follow Us on Google News
Prefer Nedrick News
on Google

दलित स्त्रियों साहित्य में तो लिखी गई,

लेकिन साहित्य तक पहुच नहीं पाई…

Poonam Tushamad – आज के आधुनिक भारत में जहाँ हम चाँद पर कदम रख रहे है, वही दूसरी तरफ हमारे समाज को आज भी जातिव्यवस्था और पितृसत्ता जैसे कुरतियां जकड़े हुई है. हमारे समाज का कोई भी भाग इन कुरतियों से छुटा नहीं है. यहा तक कि साहित्य और कला भी नहीं…. भारतीय साहित्य और कला में हमेशा से उच्च जाति वालों का वर्चस्व रहा है. हमारे देश में दलित और पिछड़े वर्गो को कभी भी शिक्षा, और पड़ने लिखने के अवसर नहीं मिले जो एक इंसान का अधिकार होता है. इसीलिए जब हम भारत के साहित्य की बात करते है तो ऐसा कम ही होता है कि एक दलित लेखक, ख़ासकर दलित लेखिका हमें याद आए.

दलित लेखिकाओं को अपनी जीवन में ज्यादा तिरस्कार सहने पड़े है आज हम एक ऐसी ही दलित लेखिका के बारे में बात करेंगे, जिनसे बातचीत करने पर पता चला की जातिव्यवस्था ने उन्हें और उन्हें साहित्य को भी नहीं बक्सा है. उन्हें भी अपने चपेड में ले लिया है. उनका नाम दलित लेखिका पूनम तूषामड़ है जिन्होंने अपने जीवन में अपनी कलम से दलितों के हकों के लिए लड़ाई की थी.

और पढ़ें : अन्नै मीनमबल शिवराज: जातिवादी व्यवस्था का विरोध करने वाली पहली दलित महिला 

क्यों दलित लेखिकाओं को साहित्य में सम्मान नहीं मिला

पूनम तूषामड़ (Poonam Tushamad) का जन्म एक एक दलित परिवार में हुआ था. बचपने से ही उनके साथ जागिगत भेदभाव होते आए है. उन्होंने पढ़ने लिखने का शौक छोटी उम्र से ही था. दलित लेखिका पूनम तूषामड़ अपने स्कूल के समय से ही लेखिका बनाना चाहती थी. जैसे जैस वह बड़ी होती गयी, अपने साहित्य से दलित समाज के हकों के लिए आवाज उठती रही, लेकिन उनके साहित्य को वो दर्जा कभी नहीं मिला जो मिलना चाहिए था. इसके पीछे का कारण उनकी जाति थी.

पूनम तूषामड़ (Poonam Tushamad) अपने स्कूल में विभिन्न प्रतियोग, साहित्य लेखनी हर चीज़ में भाग लेती थी पर उनके दलित होने की वजह से कभी उन्हें पुरुस्कार मिला. इनके स्कूल में दोस्त तो थे लेकिन कभी उसके दोस्तों ने उसके साथ खाना नहीं खाया. यह बातें उसको मन ही मन बहुत चौंट पहुचती थी.

जिसने भी कहा है सही कहा है कि दलित महिलओं पर साहित्य में चर्चा तो हुई लेकिन उन्हें कभी साहित्य तक पहुचने नहीं दिया गया. भारतीय पितृसत्तात्मक ब्राह्मणवादी समाज में दलित महिलाओं को इंसान होने के अधिकार के लिए भी लड़ना पढ़ा है यह तो फिर भी साहित्य में जगह बनाने की बात है. ऐसा ही दलित लेखिका पूनम तूषामड़ के साथ हुआ. इन्होने अपने जीवन में बेहतरीन किताबें लिखी है पर कभी उन किताबों के लिए कोई पुरुस्कार नहीं मिला.

मीडिया के साथ बातचीत में डॉक्टर पूनम तुषामड़ ने बताया

मीडिया : वर्तमान में साहित्य में दलित स्त्री लेखिकाओं की कमी के क्या कारण है? उन्हें इस क्षेत्र में अपना स्थान बना पाने में किस प्रकार की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है?

डॉ. पूनम तुषामड़: दलित महिलाओं ने अभी नया-नया शिक्षा में कदम रखा है. साहित्य भी उनके लिए नई जगह है और उनके पास धन, अन्य संसाधन तथा तकनीकी जानकारी की कमी है. उन्हें अभी खुद को रिप्रेजेंट करने में भी दिक्कतें आती हैं. हालांकि ऐसी कितनी ही दलित लेखिकाएं हैं जिनके पास पद है, ज्ञान है पर उनको मुख्य धारा में शामिल ही नहीं किया जाता है. उन्हें सीमित कर दिया गया है, कैटेगरी बना दी गई है. उन्हें तभी ध्यान किया जायेगा जब दलित साहित्य से संबंधित कोई विशेष चर्चा हो. दलित स्त्री लेखिकाओं के साथ उनको मान्यता मिलने की भी दिक्कतें रही हैं. आप हिंदी स्त्री लेखिकाओं की सूची निकालेंगे तो उसमें दलित स्त्री लेखिका का नाम नहीं दिखेगा, क्योंकि उनको वो मान्यता कभी नहीं मिली जो एक सवर्ण रचनाकारों को मिलती हैं.

और पढ़ें : शान्तबाई कांबले: अपने जीवन की कहानियों को किताब के पन्नों पर उकेरने वाली पहली दलित महिला 

vickynedrick@gmail.com

vickynedrick@gmail.com https://nedricknews.com

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Recent News

Trending News

Editor's Picks

Latest News

©2026- All Right Reserved. Manage By Marketing Sheds