क्या था रामपुर तिराहा कांड, जिसमें 3 दशक बाद ‘दरिंदे’ पुलिसकर्मियों को सुनाई गई सजा ?

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 20 मार्च 2024, 05:30 AM Updated: 20 मार्च 2024, 05:30 AM
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रामपुर तिराहा घटना पर तीन दशक बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है। अपर जिला एवं सत्र न्यायालय संख्या के पीठासीन जज शक्ति सिंह ने सामूहिक दुष्कर्म, लूट, छेड़छाड़ और रामपुर तिराहा कांड में साजिश रचने के मामले में फैसला सुनाते हुए दोनों दोषी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। हालांकि, 15 मार्च को दोनों अपराधियों को दोषी घोषित कर दिया गया था। वहीं, डीजीसी क्रिमिनल राजीव शर्मा ने बताया कि कोर्ट ने दोनों दोषियों पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माने की पूरी रकम पीड़िता को मुआवजे के तौर पर मिलेगी।

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इन धाराओं के तहत हुई सुनवाई

इस मामले में सीबीआई की ओर से कुल 15 गवाह पेश किये गये। दोषी मिलाप सिंह और वीरेंद्र प्रताप को धारा 376जी, 323, 354, 392, 509 और 120बी के तहत दोषी ठहराया गया। जिसके बाद दोनों आरोपियों को धारा 376 (2) (जी) के तहत आजीवन कारावास और 25,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई।

कोर्ट ने दोषियों को जमकर फटकार लगाई

बहुचर्चित रामपुर तिराहा कांड में फैसला सुनाते हुए अपर जिला जल शक्ति सिंह ने लिखा कि महिला आंदोलनकारी के साथ बर्बरतापूर्ण और अमानवीय व्यवहार किया गया। नियमों के अधीन शांतिपूर्ण आंदोलन में भाग लेना किसी भी व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन करते हुए किसी भी व्यक्ति को किसी भी महिला के साथ सामूहिक बलात्कार जैसा क्रूर कृत्य करने का अधिकार नहीं है और यदि ऐसा व्यक्ति पुलिस बल से संबंधित है, तो यह अपराध पूरी मानवता के लिए शर्मनाक है। साथ ही, सजा के प्रश्न पर सुनवाई करते हुए अदालत ने इस कांड को जलियावाला बाग जैसी घटना के तुलना की।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने की टिप्पणी

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा, ‘2 अक्टूबर 1994 को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर आंदोलन के दौरान हमारे युवाओं, माताओं और बहनों के साथ क्रूर व्यवहार किया गया, जिसमें कई आंदोलनकारियों का बलिदान हुआ। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। आंदोलनकारियों की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करना सरकार की प्राथमिकता और कर्तव्य है।’

जानिए पूरा मामला

आपको बता दें कि 1 अक्टूबर 1994 की रात को अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलनकारी देहरादून से बसों में सवार होकर दिल्ली के लिए रवाना हुए। इनमें महिला आंदोलनकारी भी शामिल थीं। रात करीब एक बजे बस रामपुर तिराहा पर रुकी। इस बस में दो पुलिसकर्मी चढ़े और महिला आंदोलनकारी के साथ छेड़छाड़ और दुष्कर्म किया।

इसके बाद पीड़िता से सोने की चेन और एक हजार रुपये भी लूट लिये गये। आंदोलनकारियों पर केस दर्ज किये गये। उत्तराखंड संघर्ष समिति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसके बाद 25 जनवरी 1995 को सीबीआई ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ मामला दर्ज किया। जिसके बाद अब इस मामले में कोर्ट का फैसला आ गया है।

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