Nauru country history: दुनिया के सबसे अमीर देशों का जिक्र होता है तो सबसे पहले दिमाग में तेल, सोना या प्राकृतिक गैस से भरपूर देशों का नाम आता है। लेकिन दुनिया में एक ऐसा देश भी है, जिसकी समृद्धि की नींव किसी खनिज या तेल पर नहीं, बल्कि पक्षियों की बीट पर टिकी थी। सुनने में यह बात भले ही अजीब लगे, लेकिन यह पूरी तरह सच है। प्रशांत महासागर के बीचों-बीच स्थित छोटा-सा द्वीपीय देश नाउरू कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था। महज 21 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और बेहद कम आबादी वाले इस देश की आर्थिक तरक्की की कहानी जितनी हैरान करने वाली है, उसका पतन उतना ही बड़ा सबक भी देता है।
हजारों साल तक जमा हुई पक्षियों की बीट बनी दौलत का आधार| Nauru country history
नाउरू में सदियों तक बड़ी संख्या में समुद्री पक्षी आते रहे। हजारों वर्षों तक उनकी बीट जमीन पर जमा होती रही और समय के साथ वह प्राकृतिक प्रक्रिया से फॉस्फेट में बदल गई। फॉस्फेट खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली खाद का एक अहम घटक है और पिछले दौर में इसकी वैश्विक मांग बहुत अधिक थी।
1970 के दशक में आजादी मिलने के बाद नाउरू ने बड़े पैमाने पर फॉस्फेट का खनन और निर्यात शुरू किया। दुनिया भर में इसकी मांग इतनी ज्यादा थी कि कुछ ही वर्षों में देश की आमदनी कई गुना बढ़ गई। कम आबादी और भारी राजस्व की वजह से यहां के नागरिक दुनिया के सबसे संपन्न लोगों में गिने जाने लगे।
सरकार के पास आई बेशुमार दौलत
फॉस्फेट से हुई कमाई ने नाउरू की तस्वीर पूरी तरह बदल दी। सरकार ने विदेशों में महंगी प्रॉपर्टी खरीदी, बड़े निवेश किए और भविष्य के लिए फंड भी तैयार किए। उस समय ऐसा लगने लगा था कि यह छोटा-सा देश हमेशा आर्थिक रूप से सुरक्षित रहेगा। लोगों की जीवनशैली तेजी से बदली और देश की प्रति व्यक्ति आय दुनिया के कई विकसित देशों के बराबर पहुंच गई।
सीमित संसाधन और गलत फैसले बने सबसे बड़ी वजह
हालांकि यह समृद्धि ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी। फॉस्फेट के भंडार सीमित थे और लगातार खनन के कारण वे तेजी से खत्म होने लगे। इसके साथ ही पर्यावरण को भी भारी नुकसान पहुंचा। कभी हरियाली से भरा यह द्वीप धीरे-धीरे चूना-पत्थर की बंजर जमीन में बदल गया। हालात ऐसे हो गए कि बड़ी मात्रा में भूमि खेती और निर्माण के लिए भी अनुपयोगी हो गई।
आर्थिक संकट के बीच सरकार ने कई ऐसे निवेश किए, जो बाद में भारी नुकसान का कारण बने। इनमें लंदन में लियोनार्डो दा विंची पर आधारित एक असफल थिएटर शो में निवेश भी शामिल था। खराब आर्थिक फैसलों, कमजोर वित्तीय प्रबंधन और भ्रष्टाचार ने देश की स्थिति को और बिगाड़ दिया। कुछ ही वर्षों में नाउरू कर्ज के बोझ तले दब गया और उसकी आर्थिक चमक फीकी पड़ गई।
समुद्र बना नई उम्मीद का सहारा
जब जमीन से मिलने वाली आय लगभग खत्म हो गई, तब नाउरू ने समुद्री संसाधनों पर ध्यान देना शुरू किया। देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र में टूना मछलियों का बड़ा भंडार है। सरकार ने विदेशी कंपनियों को मछली पकड़ने के लाइसेंस जारी कर नए राजस्व का रास्ता बनाया, जिससे अर्थव्यवस्था को कुछ राहत मिली।














































