सिर्फ मायावती ही नहीं, ये हैं वो गुमनाम महिलाएं जिनका कांशीराम के बहुजन संघर्ष में योगदान रहा

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 06 अक्टूबर 2024, 05:30 AM Updated: 06 अक्टूबर 2024, 05:30 AM
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कांशीराम के बहुजन संघर्ष और उनके द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के इतिहास को अक्सर मायावती के नेतृत्व से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस आंदोलन के पीछे कई महिलाएं भी थीं जिन्होंने अहम भूमिका निभाई। इन महिलाओं ने कांशीराम की सामाजिक और राजनीतिक विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई, लेकिन उनकी भूमिका को वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थीं। यहां हम उन गुमनाम महिलाओं की चर्चा कर रहे हैं जिन्होंने कांशीराम के बहुजन आंदोलन को मजबूत करने में अपना अमूल्य योगदान दिया:

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सावित्रीबाई फुले 

सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। सवित्री बाई ने भी बहुजन आंदोलन के साथ अपना नाम जोड़ा और दलित समुदायों में शिक्षा और जागरूकता फैलाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने महिलाओं की शिक्षा के लिए विशेष प्रयास किए और कांशीराम के विचारों के प्रचार-प्रसार में अहम योगदान दिया। सावित्रीबाई फुले ने समाज के उन वर्गों के लिए आवाज़ उठाई जो शिक्षा और समानता से वंचित थे। उन्होंने न केवल लड़कियों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया बल्कि जातिगत भेदभाव और अन्याय के खिलाफ़ भी लड़ाई लड़ी। उनके प्रयासों से बहुजन समाज में जागरूकता और शिक्षा का प्रसार हुआ, जिसने दलित समुदाय को सामाजिक और राजनीतिक रूप से सशक्त बनाया।

सवित्री बाई
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झलकारी बाई

झलकारी बाई ने बहुजन समाज में विशेष रूप से अपने साहस और बलिदान से महत्वपूर्ण योगदान दिया है। झलकारी बाई रानी लक्ष्मीबाई की सेना में एक प्रमुख महिला योद्धा थीं, जिन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। वह दलित समुदाय से थीं और उनका संघर्ष बहुजन समाज के लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा। वह स्वतंत्रता संग्राम की नायिका बनकर उभरीं।

Jhalkari Bai
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झलकारी बाई न केवल एक योद्धा थीं, बल्कि उन्होंने अपने समुदाय को संगठित करने और जागरूकता फैलाने का भी काम किया। उनका संघर्ष समाज के वंचित वर्गों के लिए प्रेरणा बन गया, जिन्हें समाज में समान अधिकारों और अवसरों के लिए संघर्ष करना पड़ा। उनके बलिदान और बहादुरी की कहानियाँ बहुजन समाज के गौरव और संघर्ष का प्रतीक हैं।

ऊदा देवी

1857 की लड़ाई के दौरान, दलित स्वतंत्रता योद्धा ऊदा देवी और उनकी साहसी महिलाओं ने ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ाई लड़ी थी। महिलाओं की सेना स्थापित करने के लिए, ऊदा देवी ने बेगम हजरत महल से उन्हें एक योद्धा के रूप में स्वीकार करने के लिए कहा था। अवध (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के एक छोटे से गाँव में ऊदा देवी का जन्म हुआ था। वह पासी जाति की सदस्य थीं। पासी समुदाय हर साल 16 नवंबर को मुक्ति की लड़ाई में ऊदा देवी की लड़ाई और भूमिका को याद करता है। उन्हें एक साहसी दलित महिला के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता का विरोध किया और उस पर विजय प्राप्त की।

Uda Devi
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उदा देवी जैसी बहादुर महिलाओं का योगदान न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण था, बल्कि उन्होंने बहुजन समाज में महिलाओं की स्थिति को सुधारने और उन्हें सशक्त बनाने में भी बहुत बड़ा योगदान दिया।

बता दें, दलित समुदाय की एकता के लिए कांशीराम ने ज्योतिबा फुले, सावित्री बाई, झलकारी बाई और उदा देवी जैसे महापुरुषों को दलित चेतना का प्रतीक बनाया। इसी वजह से इन महिलाओं ने न केवल बहुजन समाज पार्टी के गठन में अहम भूमिका निभाई, बल्कि कांशीराम के विचारों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाने का भी काम किया। हालाँकि उनके योगदान को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।

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