Tales of Sufi Saints: पंजाब की धरती केवल सिख गुरुओ की ही धरती नहीं है बल्कि इस धरता से जन्मे है ऐसे महान सूफी संत.. जिन्होंने सूफी संगीत को भक्ति के साथ मिला कर आध्यात्मिका की नई कहानी लिखी थी। जिन्होंने प्रेम और समर्पण के माध्यम से ईश्वर की भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया था.. लेकिन ईश्वर भक्ति और मानवता को एक रहस्यवादी दृष्टिकोण से देखा जिसे किसी ने नही देखा था। सूफी संतो का स्थान हमेशा से बेहद खास और अलग रहा है.. जिन्होंने भक्ति के लिए संगीत का माध्यम तो चुना ही साथ ही सूफी संगीत को ईश्वर का मार्ग बता कर इसे महान भी बना दिया.. पंजाब में सूफी संगीत और भक्ति के नए आयाम कायम करने वालों में महान संत बुल्ले शाह और बाबा फरीद भी शामिल है। अपने इस लेख में हम इन महान सूफी संतो की कहानी को जानेंगे। कैसे ये पंजाब के महान संत कहलायें।
कौन थे बाबा बुल्ले शाह? Baba Bulleh Shah
बाबा बुल्ले शाह- 1680 में पश्चिमी पंजाब के मुल्तान के उच में शाह मुहम्मद दरवेश और फातिमा बीबी के घर जन्मे बाबा बुल्ले शाह तब जन्मे थे जब सिख धर्म स्थापित हो चुका था और गुरु साहिब जातिपात के बंधनों से मुक्त होकर समता का संदेश दे रहे थे, लेकिन वो एक इस्लामिक परिवार से थे..लेकिन पंजाब की ही धरती पर जन्में सैय्यद अहब्दुल्ला शाह कादरी…पंजाबी भाषा के महान कवियों में से एक बाबा बुल्ले शाह पंजाबी प्रबोधन के जनक कहलाते है।
Baba Bulleh Shah समाज सुधारक और कवि
जनता का कवि कहलाने वाले बुल्ले शाह समाज सुधारक और कवि थे, जिन्होंने समाज में फैले भेदभाव को दूर करने के लिए क्रांतिकारी रचनायें की। उनकी रचनायें पंजाबी आम बोलचाल की भाषा में हुआ करती थी। जिसके कारण वो लोगो के बीच जल्दी लोकप्रिय हो गई। आज भी उनकी कवितायें और रचनायें पंजाब में कहावतों, किस्सों और लोक परंपराओं में इस्तेमाल की जाती है। यहां कर की बुल्ले शाह का प्रभाव ऐसा है कि यूनेस्को द्वारा आयोजित कार्यक्रम काफियों में उनके रचनाओं का पाठ किया गया था। जब वो छोटे तो उनका परिवार कसूर आ गया था, जहां वो काफी समय कर चरवाहें के तौर पर काम करते रहे।
पंजाब के सर्वोतम कवि Baba Bulleh Shah
इस दौरान उन्होंने लाहौर के एक सूफी मुर्शिद शाह इनायत कादरी के साथ अध्ययन किय,, उन्होने अरबी औऱ फारसी भाषा में पारंगत हासिल की थी। बुल्ले शाह को उनके ही कौम के कुछ धर्मगुरुओ ने काफिर कहकर बहिष्कृत कर दिया, वहीं उनके गुरू इनायत कादरी के निम्न जाति के होने कारण भी बुल्ले शाह को बहिष्कार झेलना पड़ा था। 1757 में 77 साल की आयु में उनका निधन हुआ, लेकिन दुख की बात है कि इतने महान सूफी संत को उनके ही कौम के कट्टरपंथी लोगो ने अंतिम विदाई में प्रार्थना करने पर रोक लगा दी, जिसके बाद उन्हें कसूर के बाहर दफनाया गया था, जहां सैयद जाहिद हमदानी ने उनकी अंतिम संस्कार की प्रार्थना की थी, जो बेहद धार्मिक थे। आज बुल्ले शाह को पंजाब के सर्वोतम कवि कहलाते है।
जानें कौन थे बाबा फरीद? who was Baba Farid?
बाबा फरीद- पंजाबी भाषा के जनक कहलाने वाले बाबा फरीद का पूरा नाम फ़रीदुद्दीन मसूद गंजशकर था, जिनका जन्म लगभग 4 अप्रैल 1188 में मुल्तान से 10 किमी दूर कोठेवाल में जमाल-उद-दीन सुलेमान और करसुम बीबी के घर हुआ था। हिंदू, मुसलमान और सिखों के बीच समान रूप से पूजे जाने बाबा फरीद ने गुरु ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी से इस्लामी सिद्धांत सीखे थे और ख्वाजा बख्तियार काकी का 1235 में निधन के बाद बाबा फरीद उनके आध्यात्मिक उत्तराधिकारी बन गए और वापिस पंजाब के अजोधन में बस गए, जो कि आज पाकिस्तान पंजाब के पाकपट्टन में है। बाबा फरीद चिश्ती सूफी संप्रदाय के संस्थापकों में से एक थे।
बाबा फरीद के नाम पर फरीदकोट शहर
उनकी रचनायें, श्लोक औऱ दोहे इतने पवित्र और सार्वभौमिर माने गए कि पवित्र श्री गुरु ग्रंथ में भी उनके 123 श्लोक को शामिल किये गये है, जिसके खुद पांचवे गुरु गुरु अर्जन देव जी ने शामिल किया था। सिख धर्म के 15 भगतो में से एक बाबा फरीद भी है। 1266 में करीब 78 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया था। पाकपट्टन में बाबा फरीद का खूबसूरत मकबरा स्थित है। बाबा फरीद के सबसे प्रसिद्ध शिष्य दिल्ली के निजामुद्दीन चिश्ती हैं, जिनकी मजार दिल्ली के निजामुद्दीन इलाके में स्थित है औऱ ये काफी प्रचलित है। फरीदकोट शहर का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।
क्यों कहा जाता बाबा फरीद को शकरजंग?
बाबा फरीद को शकरजंग कहा जाता है, जिसके पीछे कहानी है कि उनकी मां बाबाफरीद को नमाज पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती थी और बदले में छिपा कर बिस्तर के नीचे चीनी रख देती थी, लेकिन एक बार वो रखना भूल गई थी, लेकिन जब उन्होंने चटाई उठाई तो फिर भी वहां चीनी मिली.. जिसे खाने के बाद उन्हें और अधिक आध्यात्मिक उत्साह का अहसास हुआ और कहा गया कि खुद अल्लाह ने उनपर नजरे करम की थी। तब से वो शकरगंज यानि की चीनी का खजाना कहलाने लगे थे। सिख धर्म की स्थापना से पहले ही लंगर की प्रथा की शुरुआत बाबा फरीद ने अपने समय में की थी।
वहीं मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल के प्रसिद्ध सूफी संत सलीम चिश्ती, जिनकी दुआओं के कारण अकबर के बेटे सलीम का जन्म हुआ था.. वो बाबा फरीद के प्रत्यक्ष वंशज थे। सलीम चिश्ती के नाम पर ही अकबर ने बेटे का नाम सलीम रखा था, जो बाद में जहांगीर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ये वो सूफी संत है जिन्होंने केवल पंजाबी संस्कृति को ही आगे नहीं बढ़ाया बल्कि अध्यात्मिकता तक पहुंचाने का एक रहस्यवादी मार्ग भी बताया था। इन सूफी संतो की रचनाओं के कारण ही आज भी पंजाब की सूफी संस्कृति पूरी दुनिया में काफी सम्मानिय है।
































