लाहौर का वो गूंजता हुआ इन्कलाब, जब भगत सिंह और राजगुरु ने लिया लालाजी की मौत का बदला! Lahore Conspiracy Case

Shikha Mishra | Nedrick News Ghaziabad Published: 26 Jun 2026, 04:53 PM | Updated: 26 Jun 2026, 04:53 PM

Lahore Conspiracy Case: अगर कोई ये कहता है कि देश को अंग्रेजो की गुलामी से आजादी केवल गांधी जी की सत्य और अहिंसा के रास्ते मे दिलाया है. तो सरासर गलत होगा.. क्योंकि गांधी जी भले ही अहिंसा का रास्ता अपना कर जीतना चाहते थे, लेकिन क्या अंग्रजी हुकुमत अहिंसा से चलती थी.. नहीं कभी नहीं.. अंग्रेजो ने हमेशा भारतीय पर सन करने के लिए हिंसा और दमन का ही सहारा लिया.. इसलिए कहते है कि न ईट का जवाब जब तक पत्थर से न दिया जायें, तब कर सामने वाले को समझाना आसान नहीं होता.. कुछ ऐसा ही किया था शहीदे आजम सरदार भगत सिह ने.. जिन्होंने महात्मा गांधी के साथ असहयोग आंदोलन में भाग लेकर अहिंसा का रास्ता भी अपनाया था।

लेकिन समय के साथ वो समझ गए कि केवल अहिंसा से आजादी नहीं मिलेगी। खून का बदला खून से लेना जरूरी है.. भले ही खून किसी बेगुनाह का नहीं बहना चाहिये.. और जिसने किसी बेगुनाह का खून बहाया हो उसे वहीं सजा मिलनी चाहिए, जो उसने दूसरो को दी.. और इस सोच के कारण ही उन्होंने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी सांडर्स को मौत के घाट उतार कर सजा दी थी.. अपने इस लेख में शहीद भगत सिंह और सांडर्स की हत्या का किस्सा जानेंगे।

शहीद भगत सिंह और सांडर्स की हत्या का किस्सा

पश्चिमी पंजाब यानि की आज के पाकिस्तान के लायलपुर जिले के बंगा गांव में  27 सितंबर 1907 ई को एक सिख किसान पिता के घर जन्मे थे भगत सिंह। पिता सरदार किशन सिंह किसानी करते थे, और माता विद्यावती कौर गृहणी थी। लेकिन उनके  दूसरे चाचा सरदार अजीत सिंह सुप्रसिद्ध राष्ट्रभक्त एवं क्रांतिकारी थे, जिन्होंने न केवल अंग्रेजी हुकुमत की गुलामी को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था बल्कि  भारत के औपनिवेशिक शासन की खुलकर आलोचना की थी, जिसके कारण उनका ज्यादातर समय जेल में बीता था। यहां तक कि 1906 में भगत सिंह के जन्म से पहले उन्हें लाला लाजपत राय के साथ देश निकाला का दंड दे दिया गया था।

भगत सिंह ने कसम खाईअंग्रेजी हुकुमत की नींव हिलाने की

भगत सिंह ने बचपन से अपने चाचा की कहानियां सुनी थी और वो उनसे काफी प्रभावित थे, उनके भी मन में देश के लिए कुछ दिखाने की चिंगारी जाग उठी.. लेकिन ये चिंगारी आग तब बन गई जब 12 साल की उम्र में उन्होंने अमृतसर में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद बाग की स्थिति को खुद अपने आंखो से देखा था, वहां का दृश्य देखकर उनके मन में अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ नफरत भर गई, उन्होंने जलियांवाला बाग की खून से सनी मिट्टी को इकट्ठा करके कसम खाई की वो अंग्रेजी हुकुमत की नींव हिला देंगे।

सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र रास्ता

भगत सिंह शुरूआत में महात्मा गांधी के अहिंसा के रास्ते को पसंद करते थे और 1921 में उनके चलाये असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया.. उस वक्त वो 14 साल के थे, लेकिन जब सफल होते आंदोलन को 1922 में चौरा चौरी में हुई हत्या कांड के बाद अचानक बंद करने का फैसला किया तो भगत सिंह काफी निराश हो गए। उनका भरोसा अहिंसा के रास्ते से हट गया और उन्होंने समझा कि सशस्त्र क्रांति ही स्वतंत्रता दिलाने का एक मात्र रास्ता है। वो बचपन से ही ऐसे आंदोलन का हिस्सा रहे जो आजादी के लिए काम कर रहे थे। जिसमें 1914 में गदर आंदोलन भी शामिल था।

कारावास की सजा ने भगत सिंह में बौखलाहट भर दी

भगत सिंह ने स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद पहले तो उनके घरवालों ने उनका दाखिला सिखदयानंद एंग्लो-वैदिक स्कूल में कराया था, लेकिन कुछ समय के बाद ही उन्होंने 1923 में लाहौर के नेशनल कॉलेज में दाखिला ले लिया, जिसे लाला लाजपत राय ने शुरु किया था जो कि महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के जवाब में था, जिसमें लाला लाजपत राय ने ऐशे स्कूलो को बहिष्कार करने के लिए कहा था जिसे अंग्रेजी हुकुमत सब्सिडी देते थे। लेकिन इसी बीच 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड में क्रांतिकारी राम प्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित 4 क्रान्तिकारियों को फाँसी व 16 अन्य को कारावास की सजा ने भगत सिंह में बौखलाहट भर दी।

पढ़ाई के दौरान नौजवान भारत सभा का गठन किया

उन्होंने चंद्र शेखर आजाद के गदर दल का हिस्सा बन गए और पढ़ाई के दौरान ही एक संगठन नौजवान भारत सभा का गठन किया.. लेकिन काकोरी कांड के बाद जो हुआ उससे गुस्सा होकर भगत सिंह ने कॉलेज बीच में ही छोड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन से जुड़ गए, और अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का इसमें विलय कर दिया और इसे नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। इस गुट में उनके साथ सुखदेव और राजगुरू भी शामिल थे।

ये लड़ाई जारी ही थी कि अंग्रेजी हुकुमत 3 फरवरी 1928 को भारत में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार की जांच के लिए साइमन कमीशन ले आई.. साइमन कमीशन में 7 अधिकारी ब्रिटिश थे, और उनकी नीतियो भारतीयों की आजादी के खिलाफ थी, जो भारतीयो को अपमान समझा गया और देशभर में साइमन गो बैक के नाम से आंदोलन होने लगे।

लाहौर में विरोध औऱ सांडर्स की हत्या की कहानी

लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध शुरू हुआ जिसका नेतृत्व कर रहे थे लाला लाजपत राय..इस प्रदर्शन में नौजवान भारत सभा के सदस्यों ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था, जिसमें भगत सिंह भी थे, लेकिन जब उनका काफिला कमीशन के सदस्यों के काफिले से टकराया तो पुलिस अधीक्षक स्कॉट ने तुरंत लाठीचार्ज करने का आदेश दे दिया.. और इस आदेश को मानते हुए उप अधीक्षक सांडर्स ने लाठीचार्ज शुरु कर दिया। भगत सिंह कुछ करते उससे पहले लाला जी ने इशारे से शांत रहने को कहा.. मगर  स्कॉट  ने खुद लाठिया बरसानी शुरु कर दी, और उसने खुद लालाजी को पीटा, जिसमें वो बुरी तरह से घायल हो गए.. लालाजी ने उस दौरान कहा था …. मेरे शरीर पर जो लाठियां बरसाई गई हैं, वे भारत में ब्रिटिश शासन के कफन की अंतिम कील साबित होंगी। 18 दिन बाद 17 नवम्बर 1928 लालाजी की मृत्यु हो गई.. लेकिन इस मृत्यु ने भगत सिंह के अंदर बदले की भावना को भर दिया। भगत सिंह ने तय कर लिया था कि वो पुलिस सुपरिण्टेण्डेण्ट स्काट को खुद मारेंगे।

जिसके लिए भगत सिंह और राजगुरु लाहौर कोतवाली के सामने कई बार रेकी की और स्काट की गतिविधियो को देखा.. 17 दिसंबर 1928 को बदले का दिन तय हुआ.. और वो लोग कोतवाली के सामने पहुंच कर इंतजार करने लगे। इस दौरान उनके एक साथ जयगोपाल भी वहीं अपनी साइकिल लेकर बैठे थे, जैसे वो साइकिल ठीक कर रहे है। करीब सवा चार बजे कोतवाली से एक अधिकारी निकला, जो स्काट नहीं था बल्कि जे.पी. सांडर्स था, मगर वर्दी एक जैसी होने के कारण पहचानने में गलती हुई और राजगुरु जो कि एक शार्पशूटर थे, उन्होंने सांडर्स के सिर में गोली मार दी, जिसके बाद भगत सिंह ने भी 3-4 गोलियां चलाई.. जिससे उसकी वहीं मौत हो गई, और इस तरह से भगत सिंह और राजगुरु ने लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया था।

बाद में दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और दो साल वो जेल मे रहे थे, जहां उन पर सांडर्स की हत्या का मुकदमा चला था। 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई। इस तरह भगत सिंह भारत माता के वो लाल बन गए जिसमें भारत की आजादी के लिए हंसते हंसते मात्र 23 साल की उम्र में हंसते हंसते अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। उनको हमारा सलाम।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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