Supreme Court on Opposition and CJP: देश में विरोध प्रदर्शनों की सीमा और आम नागरिकों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहस ने आज उस समय नया मोड़ ले लिया, जब विपक्ष और सीजेपी (CJP) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई, मेट्रो स्टेशन बंद करने और व्यापारियों को हुए नुकसान से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्य कांत बेहद नाराज हो गए।
सुनवाई के दौरान वकीलों द्वारा लगातार की जा रही टोका-टाकी और हंगामे पर सख्त रुख अपनाते हुए CJI ने फटकार लगाई और कहा— “आप लोग एक-एक करके बहस क्यों नहीं कर सकते? आपने अदालत को मछली बाजार क्यों समझ रखा है? क्या आपको नहीं पता कि मैं आदेश लिखवा रहा हूँ?” चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। तो चलिए इस लेख के जरिए जानते हैं कोर्ट का रुख और उससे जुड़े सवाल
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Supreme Court ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि कोई भी संगठन किसी सार्वजनिक जगह या जंतर-मंतर जैसे निर्धारित प्रदर्शन स्थल पर भी अनिश्चित काल के लिए कब्जा नहीं कर सकता। एक तय समय सीमा और निश्चित अवधि के लिए ही प्रदर्शन की अनुमति होनी चाहिए।
CJI ने कहा, “अगर एक ही संगठन हर समय जगह घेरे रहेगा, तो बाकी लोग जैसे किसान आदि अपनी शिकायतें दर्ज कराने कहाँ जाएंगे? हर किसी को शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार है।” कोर्ट ने टिप्पणी की कि विरोध प्रदर्शनों और त्योहारों के सीजन में दुकानें बंद होने से व्यापारियों को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है। कोर्ट ने प्रदर्शन के अधिकार और व्यापार करने के अधिकार के बीच संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
मामले में आगे क्या हुआ?
अदालत ने व्यापारियों की संस्थाओं से कहा कि वे नुकसान से जुड़ी अपनी याचिका में प्रदर्शन आयोजित करने वाले सभी संगठनों को भी पक्षकार (पार्टी) बनाएं, ताकि मामले का सही निपटारा हो सके। वहीं, सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि सरकार ने इन प्रदर्शनों से जुड़े सभी मुद्दों पर अपने विस्तृत जवाब तैयार कर लिए हैं और उन्हें दाखिल किया जा रहा है।
अदालत का फैसला सही, लेकिन बुनियादी सवाल अब भी बरकरार
कोर्ट (Supreme Court) का यह कहना तकनीकी और व्यावहारिक रूप से बिल्कुल सही है, क्योंकि किसी भी बड़े आंदोलन या चक्का जाम में सबसे ज्यादा आम आदमी और छोटे व्यापारी ही पिसते हैं। त्योहारों के सीजन में दुकानें बंद होना या मेट्रो बंद होने से हर नागरिक की दिनचर्या प्रभावित होती है। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा और लाजिमी सवाल यह भी उठता है कि आखिर देश में प्रदर्शनों का यह सिलसिला थम क्यों नहीं रहा?
अगर जनता के पास अपनी बात मनवाने, प्रशासन तक आवाज पहुंचाने या न्याय पाने का कोई और प्रभावी रास्ता नहीं बचेगा, तो वह सड़कों पर उतरने को मजबूर होगी ही। कोई भी आम नागरिक बिना किसी ठोस वजह या मजबूरी के अपना काम-काज छोड़कर सड़कों पर नहीं बैठता।
अपने हक के लिए शांतिपूर्ण ढंग से आवाज उठाना लोकतंत्र का मूल अधिकार है। ऐसे में अंतिम समाधान सिर्फ पुलिस कार्रवाई करने, रास्तों को खाली कराने या प्रदर्शनों पर कानूनी पाबंदी लगाने में नहीं है।
असली समाधान सरकार और प्रशासन द्वारा उन बुनियादी मुद्दों, मांगों और जन-शिकायतों का समय पर निपटारा करने में है, जिनकी अनदेखी के कारण आम जनता को मजबूरन सड़कों पर उतरना पड़ता है। जब तक समस्याओं की इस जड़ पर काम नहीं होगा, तब तक अदालती पाबंदियों के बावजूद ऐसे टकराव देखने को मिलते रहेंगे।














































