RSS-BJP Conflicts: राज्यसभा में हलचल, सरकार ने स्पष्ट किया – संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने का कोई इरादा नहीं

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 25 जुलाई 2025, 05:30 AM Updated: 25 जुलाई 2025, 05:30 AM
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RSS-BJP Conflicts: भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की चर्चाओं के बीच, कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में यह स्पष्ट किया है कि वर्तमान सरकार का इन शब्दों को हटाने का कोई इरादा नहीं है। यह बयान उनके द्वारा उस सवाल के जवाब में आया, जो समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन ने उठाया था। सुमन ने सरकार से पूछा था कि क्या संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने पर कोई विचार किया जा रहा है, या यह सिर्फ कुछ सामाजिक संगठनों द्वारा फैलाए गए माहौल का परिणाम है।

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कानून मंत्री का बयान- RSS-BJP Conflicts

मेघवाल ने इस मुद्दे पर स्पष्ट करते हुए कहा, “भारत सरकार ने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की कोई कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया औपचारिक रूप से शुरू नहीं की है। हालांकि, कुछ सार्वजनिक या राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे पर चर्चा हो सकती है, लेकिन सरकारी तौर पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया गया है।” इस बयान के जरिए उन्होंने इस बात को साफ किया कि सरकार की कोई ऐसी योजना नहीं है, जिससे इन शब्दों को हटाया जाए।

आरएसएस नेता दत्तात्रेय होसबले का बयान

यह बयान आरएसएस सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबले के एक महीने पहले के बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने संविधान की प्रस्तावना से ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों को हटाने की मांग की थी। होसबले ने कहा था कि इन शब्दों का संविधान में समावेश आपातकाल के दौरान किया गया था, और इन शब्दों की प्रासंगिकता पर चर्चा होनी चाहिए। उनका यह भी कहना था कि बाबा साहेब आंबेडकर ने जब संविधान तैयार किया था, तो इन शब्दों का उसमें कोई जिक्र नहीं था।

बीजेपी और आरएसएस का समर्थन

होसबले के बयान के बाद कई बीजेपी नेताओं और समर्थकों ने इसे खुलकर समर्थन दिया था। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने भी इस मुद्दे पर बयान दिया और कहा कि यह सुनहरा समय है जब इन शब्दों को हटाने पर विचार किया जाना चाहिए। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी इस विचार का समर्थन किया था, जिसके बाद यह मुद्दा राजनीतिक चर्चाओं में और भी गर्म हो गया था।

कांग्रेस और विपक्षी दलों का विरोध

वहीं, इस मुद्दे पर कांग्रेस और कुछ अन्य विपक्षी दलों ने विरोध जताया। कांग्रेस नेता प्रताप सिंह खाचरियावास ने इस बारे में तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा, “अगर सरकार ने इन शब्दों को हटाने पर विचार करना शुरू किया है, तो यह एक बहुत ही गलत कदम होगा। यह देश की नींव को कमजोर करने जैसा होगा।” उनका कहना था कि इन शब्दों को हटाने की बात करके सरकार अपने ही संविधान के खिलाफ जा रही है, जो सभी धर्मों के बीच समानता और समाज के हर वर्ग के कल्याण के लिए है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसले का हवाला

कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें 42वें संविधान संशोधन के तहत जोड़े गए इन शब्दों की प्रासंगिकता पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी सहमति दी थी। 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया था, जिसमें कहा गया था कि ‘समाजवाद’ एक कल्याणकारी राज्य का प्रतीक है और ‘धर्मनिरपेक्षता’ संविधान के मूल ढांचे का अभिन्न हिस्सा है।

समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का महत्व

बता दें, ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के आपातकाल के दौरान संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए थे। तब से इन शब्दों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और समूहों में मतभेद देखे गए हैं। ‘समाजवाद’ शब्द का अर्थ है समाज में समानता और हर व्यक्ति को बराबरी का अवसर, जबकि ‘धर्मनिरपेक्षता’ का मतलब है कि राज्य किसी भी धर्म के प्रति पक्षपाती नहीं होगा और सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा।

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