Mohan Bhagwat News: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और कर्नाटक सरकार के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खड़गे ने RSS प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर संगठन की कानूनी स्थिति, पंजीकरण, फंडिंग, संपत्तियों और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर कई सवाल पूछे हैं। इस कदम के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। वहीं, संघ की ओर से भी इस पर प्रतिक्रिया सामने आई है।
बताया जा रहा है कि प्रियंक खड़गे ने दो पन्नों के विस्तृत पत्र में RSS की गतिविधियों, संगठनात्मक ढांचे और उसके संचालन के तरीके को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। उनका कहना है कि कर्नाटक में संघ का नेटवर्क काफी बड़ा है और इतनी व्यापक गतिविधियां चलाने वाले किसी भी संगठन को सार्वजनिक जवाबदेही और कानूनी निगरानी से बाहर नहीं रखा जा सकता।
कर्नाटक में RSS की गतिविधियों का दिया हवाला| Mohan Bhagwat News
अपने पत्र में प्रियंक खड़गे ने RSS के ही उपलब्ध आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि संगठन कर्नाटक में 4,127 दैनिक शाखाएं संचालित करता है। इसके अलावा 1,389 साप्ताहिक बैठकें और 60 मासिक मंडलियां भी नियमित रूप से आयोजित की जाती हैं। इतना ही नहीं, राज्यभर में 2,194 सम्मेलन और 500 से अधिक पथ संचलन भी आयोजित किए गए हैं।
खड़गे का तर्क है कि इतनी बड़ी संख्या में सार्वजनिक कार्यक्रमों और गतिविधियों को किसी निजी या अनौपचारिक व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि जब कोई संगठन लगातार बड़े पैमाने पर जनसंपर्क अभियान, सामाजिक कार्यक्रम और गणवेशधारी पथ संचलन आयोजित करता है, तो उसकी कानूनी स्थिति और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
फंडिंग और आय के स्रोतों पर मांगा जवाब
गृह मंत्री ने अपने पत्र में RSS से उसकी संगठनात्मक संरचना, प्रमुख पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। इसके साथ ही उन्होंने संगठन से यह भी पूछा है कि उसे मिलने वाला धन कहां से आता है और उसके आय के प्रमुख स्रोत क्या हैं।
खड़गे ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी संस्था, चाहे वह कितनी भी पुरानी, बड़ी या प्रभावशाली क्यों न हो, कानून और सार्वजनिक जांच से ऊपर नहीं हो सकती। सभी संगठनों को पारदर्शिता और जवाबदेही के दायरे में रहकर काम करना चाहिए।
संपत्ति और टैक्स भुगतान पर भी उठाए सवाल
पत्र में RSS की संपत्तियों को लेकर भी सवाल पूछे गए हैं। प्रियंक खड़गे ने जानना चाहा है कि संगठन के पास कितनी संपत्तियां हैं, उनका संचालन कैसे होता है और क्या संगठन लागू कर कानूनों के तहत टैक्स का भुगतान करता है।
इसके अलावा उन्होंने यह भी पूछा कि RSS किस कानूनी आधार पर बिना औपचारिक पंजीकरण के इतने बड़े स्तर पर अपनी गतिविधियां चला रहा है। सार्वजनिक कार्यक्रमों और पथ संचलनों के लिए प्रशासनिक अनुमति लेने की प्रक्रिया और उसके रिकॉर्ड की जानकारी भी मांगी गई है।
RSS का जवाब- यह राजनीति से प्रेरित कदम
प्रियंक खड़गे के पत्र पर RSS प्रमुख मोहन भागवत की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। संघ की ओर से कहा गया है कि RSS को पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है और पिछले लगभग 100 वर्षों में किसी भी सरकार ने इस प्रकार की मांग नहीं की।
संघ का मानना है कि यह मुद्दा राजनीतिक कारणों से उठाया जा रहा है। RSS का कहना है कि वह लंबे समय से सामाजिक और राष्ट्र निर्माण से जुड़े कार्यों में सक्रिय है और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर पहले कभी इस तरह का सवाल नहीं उठाया गया।
पहले भी उठा चुके हैं यह मुद्दा
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब प्रियंक खड़गे ने RSS की कानूनी स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं। कुछ दिन पहले भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से पूछा था कि आखिर किस कानूनी प्रावधान के तहत संघ को पंजीकरण और सरकारी जवाबदेही से छूट मिली हुई है।
उन्होंने यहां तक कहा था कि यदि आवश्यकता पड़ी तो वह स्वयं संघ मुख्यालय जाकर इस विषय को समझने और जानकारी लेने के लिए तैयार हैं।
राजनीतिक बहस तेज होने के आसार
प्रियंक खड़गे के इस पत्र और RSS की प्रतिक्रिया के बाद आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से और गर्मा सकता है। एक तरफ कर्नाटक सरकार पारदर्शिता और जवाबदेही की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर RSS इसे राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा कदम बता रहा है।
अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि RSS इस पत्र के सवालों का औपचारिक जवाब देता है या नहीं, और इस विवाद का राजनीतिक असर आने वाले समय में कितना व्यापक होता है।
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