Last Princesses of Punjab: ये बात 1845 की है, महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो चुकी थी उनकी सत्ता के उत्तराधिकारी दो बड़े बेटो को आंतरिक कलह के कारण मौत के घाट उतार दिया गया, ऐसे में महाराजा के अंतिम उत्तराधिकारी के रूप में बचे थे उनके पांच साल के बेटे राजकुमार दुलीप सिंह। महाराजा दुलीप सिंह की मां और महाराजा की तीसरी पत्नी महारानी जींद कौर एक कड़े अनुशासन औऱ राजनीति की अच्छी समझ रखने वाली महिला थी.. उनमें ताकत थी कि वो फिर से सिख सम्राज्य को खड़ा कर सकती थी, लेकिन अंग्रेज ऐसा नहीं होने दे सकते थे, और 1849 में जब सिख सम्राजय का पतन हो गया।
तो जानबूझ कर राजकुमार दुलीप सिंह को उनकी मां से दूर कर इंग्लैंड भेज दिया गया, और एक अंग्रेजी दंपत्ति को गोद दे दिया.. लगा था महाराजा की विरासत खत्म हो गई, मगर उनकी विरासत को आगे बढ़ाया उनकी पोती राजकुमारी सोफिया अलेक्जेंड्रोवना दुलीप सिंह ने… जो न केवल इस घराने की राजकुमारी थी, बल्कि उन्होंने ब्रिटेन में महिलाओं के लिए मताधिकार के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी थी… महारानी विक्टोरिया के बचपन के घर केंसिंग्टन पैलेस से जुड़ी 6 प्रभावशाली महिलाओं मे से एक सोफिया का जन्म 8 अगस्त 1876 को बेलग्रेविया में हुआ था और महाराजा दुलीप सिंह की और उनकी पहली पत्नी बंबा मुलर की तीसरी बेटी थीं।
वो बचपन से ही काफी प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली थी, जिसके कारण वो महारानी विक्टोरिया की फेवरेट हुआ करती थी। महारानी विक्टोरिया उनकी धर्ममाता कहलाती थी जिनके कारण ही महारानी के नाम अलेक्जेंड्रीना विक्टोरिया के सम्मान में अपने नाम के साथ अलेक्जेंड्रीना इस्तेमाल करने की हकदार बनी थी। हालांकि ब्रिटेन में सारी सुविधायें होने के बाद भी वो सही मायने में आजाद नहीं थे, उनके परिवार पर हमेशा नजरें रखी जाती थी कि कहीं वो राजनैतिक गतिविधियों में शामिल न हो, ताकि वो प्रभाव में आ सकें। यानि की ये ब्रिटेन की जिंदगी उनके लिए सोने का पिंजरा जैसी थी।
ऐशो आराम तो था लेकिन कैद के साथ। मगर राजकुमारी सोफिया इस न दिखने वाली गुलामी के खिलाफ थी, वो जानती थी कि उन्हें क्या करना है। इतनी मजबूत शख्सिय़त रखने वाली सोफिया बेहद शर्मिली और शांत रहा करती थी, जबकि महारानी विक्टोरिया चाहती थी कि सोफिया समाज सेवा से जुड़े, मगर पिता की मृत्यु के बाद वो अलग रूप में नजर आई। ब्रिटिश हुकुमत को लगा कि शायद पिता की मौत के बाद सोफिया और उनके भाई बहन कमजोर पड़ जायेंगे, लेकिन ऐसा नहीं था।
1903 में वो दिल्ली दरबार में भाग लेने के लिए आखिरकार चोरी छिपे भारत आई, मगर भारत में भारतीय की स्थिति औऱ ब्रिटिशों के साथ उनका व्यवहार देखकर एक बड़े फैसले के साथ वो वापिस इंग्लैड लौट गई। जिसके बाद वो 1907 में फिर से भारत लौटी लेकिन इस बार ब्रिटिश हुकुमत की निगरानी में, मगर यहां उन्हें जो करना था वो उन्होंने किया.. उन्होंने लाहौर में एक प्रर्दा पार्टी की.. उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले और लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता सैनानियों से मुलाकात की और जाना कि कैसे अंग्रेजों के कारण भारत गरीबी, लाचारी और भूखमरी की तरफ चला गया।
अंग्रेजो की वजह से उनके अपने परिवार की विरासत को कितना नुकसान हुआ लेकिन जब उन्हें अपने पिता और दादी के ऊपर राजद्रोह करने के आरोपो और उन्हें कैद करने के बारे में पता चला तो उनके अंदर पहली बार अंग्रेजो के खिलाफ नफरत भर गई। 1909 में वो वापिस लंदन लौट गई.. वो ब्रटिश हुकुमत की कड़ी निगरानी के कारण सक्रिय रूप से राजनीति का हिस्सा नहीं बन सकती थी लेकिन उन्होंने तय कर लिया था कि वो समाज में बड़ा बदलाव ला कर रहेगी। जिसके लिए उन्होंने महिला सामाजिक और राजनीतिक संघ (WSPU) को जॉइन किया। एम्मेलिन पैंखर्स्ट ने 1889 में महिला मताधिकार लीग की सह-स्थापना की थी, जो कि उनकी दोस्त भी थी। महिलाओं के मताधिकार के आंदोलन को सोफिया ने खुद वित्त सहायता दी, ताकि ये आंदोलन व्यापक हो सकें। वो ब्रटिश हुकूमत के इतने खिलाफ हो गई थी कि उनेहोंने टैक्स देने बंद कर दिया था और वो आंदोलन के लिए पैसे देने लगी थी।
कहते है कि राजा जॉर्ज पंचम उनसे इतना डर गए थे कि उन्होंने अपने अधिकारियो से पूछा था कि क्या सोफिया को काबू में करने का कोई तरीका नहीं है। 1911 में सोफिया की बड़ती लोकप्रियता ऐसी थी कि उन्होंने सरकार की तरफ से होने वाली जनगणना में महिलाओ के शामिल होने से इंकार कर दिया.. उन्होंने साफ कहा कि अगर महिलायें मत नहीं दे सकती तो वो जनगणना में भी शामिल नहीं होगी। उन्होंने आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए अपनी संपत्ति दान कर दी, और धनराशि महिला कर प्रतिरोध लीग को दान की गई.. जिसके बाद तो सोफिया पर कड़ी नजर रखी गई और उन्हें कई मुकदमो में फंसा कर उन पर जुर्माना लगाया गया, उनकी अंगुठी लेकर उन्हें अपमानित किया गया, मगर वो हार मानने वाली नहीं थी। ब्रिटिश हुकुमत ने पहले विश्वयुद्ध के दौरान स्वयंसेवी महिला बल पर प्रतिबंध पर लगा दिया था लेकिन सोफिया ने इसके विरोध में होने वाले मार्च में हिस्सा लिया और उन्होंने ब्रिटिश रेड क्रॉस स्वयंसेवी सहायता टुकड़ी में नर्स के रूप में स्वेच्छा से भारतीय सैनिकों की सेवा की थी।
उनकी लड़ाई रंग लाई और 1918 में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम लागू हुआ और 30 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को वोट डालने का अधिकार मिला। जिसे 1928 में 21 साल कर दिया गया था। एक इंटरव्यू में सोफिया ने अपने जीवन का केवल एकमात्र लक्ष्य “महिलाओं की उन्नति करने को बताया था. 22 अगस्त 1948 को उनकी बकिंघमशायर के पेन में राथेनरे में सोते वक्त हो गई थी। मरने से पहले वो चाहती थी कि उनका अंतिम संस्कार सिख रिति रिवाज से हो और उनकी उनकी राख को पंजाब ले जाया जाये। उनकी इच्छा का सम्मान किया गया। उनके सम्मान में 26 मार्च से 8 नवंबर 2026 तक केंसिंग्टन पैलेस में द लास्ट प्रिंसेस ऑफ पंजाब‘ नामक एक प्रदर्शनी चल रही है, जिसमें उनके जीवन और उनसे जुड़े अपने लोगो के बारे में प्रदर्शनी दिखाई जा रही है। वो एक प्रभावशाली महिला थी, जो शायद भारत में रहती तो अपनी दादी की ही तरह सिख सम्राज्य के लिए एक मील का पत्थर साबित होती.. आपको क्या लगता है।




























