सिर्फ शादीशुदा ही नहीं, लिव-इन में रह रही महिलाओं को भी दिए गए हैं ये कानूनी हक़, क्या आप जानते हैं ?

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शादी में दरार पड़ने और तलाक होने के बाद हाल ही में महिला के अधिकारों को लेकर जनता जागरूक हुई है। लेकिन अभी भी भारत के आधे से ज्यादा हिस्सों में वैवाहिक संबंध से अलग हो जाने के बाद सही जानकारी न होने पर महिलाएं अपने हक़ की आवाज नहीं उठा पाती हैं। और अपने पार्टनर से अलग होने पर उन्हें फाइनेंशियल तरीके से काफी नुकसान उठाना पड़ता है।

ऐसे में आजकल ये सोच भी प्रकाश में आ रही है कि इस स्थिति में लिव इन रिलेशनशिप में रह रही महिलाओं के अलग होने पर उनकी परेशानियां डबल हो जाती होंगी। क्योंकि समाज में अधिकतर जगहों पर लिव इन को अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है। लेकिन क्या आपको पता है पिछले कुछ सालों में सरकार ने लिव इन में रह रही महिलाओ और बच्चों के लिए भी कुछ अधिकार सुनिश्चित किये हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने लिव इन को इस तरह किया परिभाषित 

सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव इन रिलेशनशिप को पांच कैटेगरी में परिभाषित किया है। पहला जवान और अविवाहित पुरुष महिला के घरेलु संबंध, दूसरा शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला जिसमें पुरुष के शादीशुदा होने की जानकारी महिला को होनी चाहिए, तीसरा अविवाहित पुरुष और शादीशुदा महिला जिसमें महिला के शादीशुदा होने की जानकारी पुरुष को हो, चौथा शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला जिसमें पुरुष के शादीशुदा होने की जानकारी महिला को नहीं हो और पांचवा समलैंगिक पार्टनर के लिव इन रिलेशन के संबंध।

महिलाओं के क्या हैं वैवाहिक अधिकार?

सबसे पहले बता दें कि महिलाओं को क्या वैवाहिक अधिकार दिए गए हैं जिनका सहारा लेकर वो स्वतंत्र तरीके से अपनी आजीविका जिंदगी भर चला सकती हैं। इन अधिकारों में पिता की प्रॉपर्टी से लेकर बच्चों के भरण पोषण तक के अधिकार शामिल हैं। महिलाओं को भरण पोषण का अधिकार देने वाला क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC) का सेक्शन 125 है।

हिन्दू मैरिज एक्ट,1955(2) और हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट, 1956 के अंतर्गत महिलाओं को तलाक के बाद भरण पोषण का अधिकार दिया गया है। जिसके लिए वो तलाक के बाद आवाज उठा सकती हैं। प्रोटेक्शन ऑफ़ वूमन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलंस एक्ट, महिलाओं की शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और आर्थिक शोषण के खिलाफ सुरक्षा के लिए बनाया गया है।

लिव इन में दिए गए ये अधिकार 

इसकी सिफारिश साल 2003 में मलिमथ समिति द्वारा की गई थी। जिसके बाद सेक्शन 125 को CrPC में शामिल किया गया था। इसके तहत पत्नी का अर्थ बदला गया और  उसमें लिव इन रिलेशनशिप की महिलाओं को जोड़ा गया। इसमें बताया गया कि अगर महिला पूरी तरीके से लिव इन के दौरान पुरुष पर भरण पोषण के लिए आश्रित है,  तो अलग होने के बाद भी उसके भरण पोषण की जिम्मेदारी पुरुष पर होगी।

रिश्तों में दरार आने के बावजूद भी मेल पार्टनर को अपनी फीमेल पार्टनर की वित्तीय जरूरतों का  ख्याल रखना होगा। डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट में भी शादीशुदा महिला के बराबर लिव इन में रह रही महिला का जिक्र है।

पेरेंट्स की वसीयत पर बेटियों का हक़ 

हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956 को 2005 में संशोधित किया गया। इस एक्ट में महिलाओं को पैरेंट प्रॉपर्टी पर अधिकार मिला था। इसके मुताबिक बेटियां शादीशुदा हो या अविवाहित, इन दोनों केस में ही उनको माता पिता की जमीनी जायदाद पर हक़ मिलेगा। इससे पहले ये हक़ सिर्फ बेटों को ही देने का प्रावधान था। पेरेंट्स द्वारा खरीदी गई प्रॉपर्टी पर भी उनकी वसीयत के मुताबिक हिस्सा मिलेगा।

अधर्मज संतान को भी मिलेगा प्रॉपर्टी का हिस्सा 

अधर्मज संतान का अर्थ है वो संतान जो कि बिना शादी या दूसरी शादी या किसी लड़की को धोखा दे कर पैदा की गई हो। साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर स्त्री पुरुष लंबे समय तक साथ रहते हैं तो उनके संबंधो से होने वाली संतान को वैध माना जाएगा। साथ ही CrPC के सेक्शन 125 में अपने अधर्मज बच्चों की भी भरण पोषण की जिम्मेदारी पुरुष उठाएगा। साथ ही हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 16 के तहत ये बच्चे भी पैरेंट्स की प्रॉपर्टी के उत्तराधिकारी होते हैं।

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