जब ज़मीन के टुकड़े के बदले बिछानी पड़ीं सोने की मोहरें, इतिहास का वो सौदा जो अमर हो गया – Historic land deal

Shikha Mishra | Nedrick News Punjab Published: 08 अगस्त 2026, 08:59 PM Updated: 08 अगस्त 2026, 08:59 PM
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Historic land deal: जरा सोचिये 6 गज जमीन की कीमत कितनी होगी.. औऱ वो भी जब वो जमीन किसी के अंतिम संस्कार के लिए चाहिए होगी.. लेकिन पंजाब में एक ऐसा ही जमीन का टुकड़ा है, जिसे करीब 8 टन सोना देकर खरीदा गया था। 8 टन यानि की करीब 800 किलो सोना.. जिसकी कीमत आज के समय में 12 अरब, 1 करोड़ 84 लाख के आसपास है.. सिर्फ अंतिम संस्कार के लिए ही इतनी बड़ी कीमत दी गई.. अब सवाल ये है कि आखिर किसने चुकाई ये कीमत… और किसका किया जाना था अंतिम संस्कार.. तो जवाब है दसवे गुरु गोबिंद सिंह के दोनो छोटे साहिबजादों औऱ उनकी मां माता गुजरी के अंतिम संस्कार के लिए.. और ये कीमत चुकाई थी मुगलो के दीवान टोडरमल जी ने.. अपने इस वीडियो में हम जानेंगे कि कैसे और कहां बिकी थी इतनी महंगी जमीन.. औऱ क्यों चुकानी पड़ी दीवान टोडरमल को इतनी बड़ी कीमत..

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वजीर खान के हमले के कारण छोड़ा आनंदपुर साहिब

दिसम्बर 1705, ये महीना दसवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी के लिए दुःखो का पहाड़ लेकर आया था। चार चार बेटों के पिता ने एक महीने के अंदर ही अपने चारों बेटों को धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देते देखा। 21 से 23 दिसंबर तक चमकौर के युद्ध में अपने दोनों बड़े साहिबजादों , साहिबजादा अजीत सिंह जो केवल 18 साल के थे और साहिबजादा जुझार सिंह जो 14 साल के थे। शहीद होने के बाद भी गुरु साहिब ने धर्म के रक्षा के लिए शुरू की गई अपनी जंग को जारी रखा। लेकिन वियोग और पीड़ा का सिलसिला तो अभी शुरू हुआ था। वजीर खान के हमले के कारण आनंदपुर साहिब छोड़ने के दौरान जब गुरु साहिब अपने परिवार के साथ सिरसा नदी पर कर रहे थे तभी वो अपने अपनी मां माता गुजरी और दोनों छोटे साहिबजादों बाबा जोरावर सिंह जो कि मात्र 9 साल के थे और बाबा fateh सिंह जो 6 साल के थे, से बिछड़ हुए। इस दौरान माता गुजरी के साथ उनका रसोइया गंगू भी था। उसने माता से आग्रह किया कि वो उसके गांव चले, जहां वो सुरक्षित रहेंगे, इस दौरान वो गुरु साहिब को संदेश भिजवा देगा। माता गुजरी दोनों साहिबजादों के साथ गंगू के गांव खेड़ी जिसे अब शहेरी कहा जाता है वहां चली गई। लेकिन माता गुजरी के पास जो धन था उसे देख कर गंगू को लालच आ गया और उसने दगाबाजी करते हुए वजीर खान माता गुजरी और दोनों साहिबजादों का पता बता दिया।

वजीर खान गुरु साहिब को नीचा दिखाना चाहता था

वजीर खान गुरु साहिब से जुड़े हर सिख को केवल मारना नहीं चाहता था, बल्कि वो उनका धर्म परिवर्तन करा कर गुरु साहिब को नीचा दिखाना चाहता था, और उसके लिए खुद गुरु साहिब के बच्चों से बेहतर कौन होता, लेकिन तब उसे ये नहीं पता था कि जिससे उसका सामना हो रहा है उनकी उम्र भले ही कम है लेकिन निश्चय के मामले में पहाड़ से भी अडिग है। वजीरखान ने दोनो साहिबजादो के सामने प्रस्ताव रखा कि वो धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपना लें, तो उनकी जान बख्श दी जायेगी। लेकिन दोनो साहिबजादों ने वजीर खान की आंखो में आखे डाल कर निडरता से उत्तर दिया कि वो अपने दादा गुरु तेगबहादुर जी और पिता गुरु गोबिंद सिंह जी के बताये रास्ते पर चलेंगे.. वो मरना पसंद करेंगे लेकिन सिख धर्म नहीं छोड़ेगे। सिख धर्म और उसकी मर्यादा उन्हें अपने प्राणों से प्यारे है। वजीर खान ने उन्हें कई लालच दिये, लेकिन वो चट्टान की तरह अडिग थे.. जिसके बाद गुस्से में वजीर खान ने दोनो साहिबजादो औऱ माता गुजरी को ठंडे बुर्ज में कैद करवा दिया। अगले दिन 26 दिसंबर को फिर से वजीर खान ने साहिबजादों से धर्म बदलने की बात की.. लेकिन उन्होंने साफ कहा कि तुम हमें जान से मार दोगे तब भी हम अपने फैसले पर अडिग रहेंगे। जिसके बाद गुस्से में वजीर खान ने दोनो साहिबजादो को दीवार में चुनवाने का आदेश दिया। वहीं माजा गुजरी ने भी बुर्ज में अपने प्राण त्याग दिये।

अंतिम संस्कार के लिए जमीन

धर्म और बलिदान की मिसाल दोनो शाहिबजादों शहीद हो गए थे..उन्हें अंतिम विदाई भी शहीदों की तरह मिलनी चाहिए थी.. लेकिन वजीर खान ने न केवल उनके अंतिम संस्कार के लिए जमीन देने से इंकार कर दिया बल्कि उनके शवो को भी देने से इंकार कर दिया। उनके शवो का ऐसा अपमान वजीर खान के दरबार में ही काम करने वाले दरबारी दीवान टोडरमल को बिल्कुल नागावार गुजरा… उन्होंने तय किया कि चाहे कोई भी कीमत चुकानी पड़े वो दोनो साहिबजादों औऱ माता गुजरी को एक सम्मानीय अंतिम विदाई देंगे। टोडरमल ने वजीर खान ने अंतिम संस्कार करने औऱ उसके लिए जमीन देने की अपील की.. लालची वजीर खान ने कुछ सोचा और वो राजी हो गया लेकिन उसने शर्त रखी कि जितनी जमीन उसे चाहिए, उतनी जमीन को सोने के सिक्के से मापे और वो भी खड़े सिक्कों से.. दीवान डोटरमल मान गए.. उन्होंने अपनी सारी संपत्ति बेच दी.. और फतेहगढ़ के सिरहिंद में उन्होंने जमीन मापनी शुरु की.. और करीब 78 हजार सिक्कों से जमीन मापी गई। वजीर खान ने जमीन के टुकड़े के बदले 78 हजार सोने के सिक्के लिए थे.. जिसके बाद दीवान टोडरमल ने तीनो का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ किया। इस जमीन के टुकड़े को इतिहास में सबसे मंहगी जमीन माना जाता है। आज इस स्थान पर गुरुद्वारा ज्योति सरूप साहिब मौजूद है। पूरे भारत में ये जमीन सबसे महंगी जमीन होने का रिकॉर्ड रखती है।

Shikha Mishra

shikha@nedricknews.com

शिखा मिश्रा, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत फोटोग्राफी से की थी, अभी नेड्रिक न्यूज़ में कंटेंट राइटर और रिसर्चर हैं, जहाँ वह ब्रेकिंग न्यूज़ और वेब स्टोरीज़ कवर करती हैं। राजनीति, क्राइम और एंटरटेनमेंट की अच्छी समझ रखने वाली शिखा ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से जर्नलिज़्म और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की है, लेकिन डिजिटल मीडिया के प्रति अपने जुनून के कारण वह पिछले तीन सालों से पत्रकारिता में एक्टिव रूप से जुड़ी हुई हैं।

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