Nurmahal Sarai: मुगल काल की आपको कई ऐसी प्रेम कहानी पढ़ने औऱ सुनने को मिलेगी, जो आज भी अमर प्रेम कहलाती है.. जोधा अकबर, सलीम अनारकली, शाहजहां मुमताज की लव स्टोरी… लेकिन इसी मुगल प्रेम कहानी में एक प्रेम कहानी ऐसी भी है जो सत्ता की भूख से शुरु हुई सिंहासन के पहुंची.. जिसने त्याग नहीं युद्ध चुना था। जहां मुगल बादशाहो का बोलबाला था,, वहां एक महिला के प्रेम न जहांगीर जैसे शासक को न केवल झुकाया बल्कि उसे अपने साथ तख्त की ताकत भी दी.. जी हां, हम बात कर रहे है नूरजहां की.. जो जहांगीर के साथ सदैव कंधे से कंधा मिलकर चलती थी। लेकिन क्या आप जानते है कि नूरजहां कोई उसका नाम नहीं थी,.. वो एक पदवी थी.. जिसे जहांगीर ने उसे दिया था.. नूरजहां बनने से पहले का इतिहास कैसा था उसका.. और कैसे वो पंजाब की ऐतिहासिक धरती से जुड़ा है। क्या है नूरमहल सराय की कहानी.. जो आज भी पंजाब के दिल मे बसा है। इस लेख में जानेंगे नूरजहां के नूरमहल सराय की कहानी…
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नूरजहां बनने से पहले की कहानी
नूरजहां 1577 में कंधार आज के अफगानिस्तान में एक फारसी कुलीन परिवार में जन्मी थी, जिनका बचपन का नाम मेहर-उन-निस्सा रखा गया था, जिसका मतलब होता है महिलाओ में सूर्य। नूरजहां के परिवार काफी अमीर था, उनके पिता मिर्ज़ा ग़ियास बेग का शाही परिवार से काफी अच्छा रिश्ता था, लेकिन जब उनकी पत्नी असमत बेगम चौथी बार गर्भवति थी तब किसी कारण से उनके पूरे परिवार को कांधार छोड़ना पड़ा.. बचा खुचा धन लेकर उन्होंने तब मुगल शासन में आने का सोचा.. उस वक्त अकबर का समय था और भारत एक बड़ा व्यापारिक केंद्र बन रहा था। लेकिन रास्ते में फिर से उनके साथ लूटपाट हुआ औऱ धन बचा था वो भी लूट लिया गया। इसी बीच असमत बेगम ने एक बेटी को जन्म दिया.. दोनो को चिंता हुई कि बच्ची की परवरिश कैसे करेंगे लेकिन अचानक एक फरिश्तें की तरह व्यापारी मलिक मसूद ने उनकी मदद की और अपने कारवें में शामिल कर लिया। उन्होंने गियास बेग को 300 का मनसब दिला दिया.. परिवार को अहसास हुआ कि जो बच्ची पैदा हुई वो उनके परिवार का भविष्य बदलने वाली है।
जहांगीर को मेहरूनिस्सा से प्यार
और उसे नाम दिया गया था मेहरू निस्सा। जल्द ही गियास बेग को उसकी मेहनत और इमानदारी के लिए इतिमद-उद-दौला या ‘राज्य का स्तंभ’ की उपाधि दी गई। 1594 में 17 साल की उम्र में मेहरू निस्सा की शादी फारसी शासक अली कुली इस्तजलू जिसे शेर अफगान खान भी कहा जाता है उससे हो गई थी। जो कि फारस छोड़ कर भारत कर मुगल सेना में शामिल हुआ था। ये शादी पूरी तरह से प्रशानिक गठबंधन था.. जिसके बाद वो एक बच्ची लाडली बेगम की मां भी बनी.. लेकिन 1607 में शेरअफगान की हत्या हो गई और मेहरू निस्सा को सुरक्षा की दृष्टि से आगरा लाया गया। इतिहासकार कहते है कि जहांगीर को मेहरूनिस्सा से प्यार था लेकिन पति के रहते उसे अपनी कानूनी पत्नी नहीं बना सकता था, इस लिए उसने साजिश के तहत शेर अफगान खान की हत्या करवाई और मेहरूनिस्सा को आगरा महल में ले आया। हालांकि उसने शादी करने के लिए 4 साल का इंतजार किया और 1611 में उसने मेहरूनिस्सा को अपनी 20 लीगल पत्नी बनाया था। वो मुगल काल की इकलौती ऐसी महिला थी, जिसने सल्तनत की फ्रशासनिक कार्यो में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।
नशे का आदी जहांगीर अक्सर बीमार रहता था जिसका फायदा नूरजहां ने उठाया। वो इतनी शातिर औप पारखी नजरों वाली महिला थी कि उसका जहांगीर से भी ज्यादा प्रभाव बढ़ने लगा। शिकार की शौकिन नूरजहां जहांगीर के साथ शेर का शिकार करने जाया करती थी। नूरजहां के साहस औऱ बौद्धिक शक्ति के कारण उसकी प्रसिद्धि काफी थी। इन सब के बाद भी उसके दिल में पंजाब का जालंधर शहर काफी करीब था, जहां वो अपनी पहली शादी के दौरान रहा करती थी। वो अक्सर यहां समय बीताने आया करती थी। और महारानी बनने के बाद जब वो 1618 में पंजाब की यात्रा पर आई तब पहली बार उसके लिए स्पेशल एक सराय का निर्माण कराया गया। जिसकी खूबसूरती आपको ये अहसास कराती है नूरजहां का वाकई में कितना प्रभाव रहा होगा।
17 वी सदी में जालंधर और उसके आसपास का सराय ग्रैंड ट्रंक रोड इलाका लाहौर-आगरा के ऐतिहासिक व्यापार मार्ग हुआ करता था। नूरजहां का इस क्षेत्र में ही बचपन बीता था, इसलिए उसने जालंधर के गवर्नर ज़कारिया खान को एक सराय बनाने का आदेश दिया.. ये सराय असल में एक रणनीतिक पड़ाव था जो लाहौर और आगरा के बीच व्यापारिक यात्रा को सरल और सुगम बनाने में काफी अहम था। पंजाब के जालंधर जिले से 33 किलोमीटर दूर ग्रैंड ट्रंक रोड पर एक 551 वर्ग फुट में फैला चौकोर आकार का सराय है. जिसे नूरमहल सराय कहा जाता है। आने जाने वाले यात्रियों, फौजियो और आम जनो के लिए तैयार किया गया नूरमहल का निर्माण नूरजहां ने करवाया था.. नूरजहां का व्यापारिक कौशल इसी से देखने को मिलता है कि उसने एक ऐसे सराय का निर्माण कराया, जो व्यापारियों का यात्रा आसान करें, ताकि ज्याद से ज्यादा व्यापारी आगरा आ सकें।
इस सराय में 140 कमरे है .. ये सराय इसलिए भी खास है कि इसे आम ईंटो के बजाये शाही परियोजनाओं के लिए आरक्षित लाल बलुआ पत्थर और चूने के गारे से बनाई गई थी। इस सराय को हिंदू और मुसलमान सभी काफी पसंद करते थे.. इसके दो दरवाजे है पूर्वी और पश्चिमी दरवाजा.. पूर्वी दरवाजे पर फारसी शिलालेख सराय की स्थापना की गई तो वहीं पश्चिमी द्वार पर हाथियों, ऊंटों, पक्षियों और फूलों की नक्काशी की गई है जो किसी का भी मन मोह लें। वहीं सराय के हर कोने पर अष्टकोणीय मीनारें है, जहां सेना द्वारा निगरानी करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। इसी के साथ यहां एक गुंबद वाली मस्जिद और हमाम बना हुआ था। ये असल में हिंदू मुसलमानी परंपरा को दर्शाता है। इसने कमरों में छोटे लेकिन लयबद्ध तरीके से बनाई गई खिड़किया सराय के कमरो को हवादार और ठंडी रखती है.. आर्थिक दृष्टि से भी सराय काफी अहम मानी जाती थी.. जहां आने वाले व्यापारी अच्छा खासा टैक्स देते थे। बड़े बड़े आयोजन यहां किये जाते थे। जो आय का बेहतर स्त्रोत बन गया था। नूरमहल सराय नूरजहां के कुशल नेतृत्व और शासन कौशल का जीता जागता उदाहरण है। जो उसे मुगलकाल की सबसे ताकतवर महिला बनाता है।













































