Famous Gurudwaras in Haryana: हरियाणा और सिख धर्म के बीच गहरा रिश्ता है। हम सभी जानते हैं कि 1966 में पंजाब के भाषाई आधार पर पुनर्गठन से पहले, हरियाणा पंजाब का ही हिस्सा था; हरियाणा की धरती सिख गुरुओं के पवित्र चरणों से पावन हुई है और गुरबानी की गूँज से यहाँ भक्ति का माहौल बना है। सिख गुरुओं ने हरियाणा का दौरा किया और सिख धर्म को बढ़ावा देने के लिए कई अहम काम किए—ऐसे काम जिनसे आज भी श्रद्धालु श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। उनके नेक योगदान को हमेशा याद रखने के लिए वहाँ गुरुद्वारे बनाए गए। तो चलिए आपको इस लेख में, हम हरियाणा में मौजूद पाँच गुरुद्वारों के बारे में जानेंगे।
1. धमतान साहिब गुरुद्वारा – Dhamtan Sahib Gurudwara
जींद के नरवाना में नरवाना -टोहाना रोड पर स्थित है धमतान साहिब गुरुद्वारा। इतिहासकारों की माने तो ये वही स्थान है जहां सतयुग में भगवान राम के अश्वमेधा यज्ञ किया था… औऱ यहां पर महर्षि वाल्मिकी का आश्रम था। नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर साहिब अपनी यात्राओं के दौरान 1665 में इस स्थान पर भी आये थे, जहां उन्होंने संगतो के साथ काफी समय बिताया था औऱ यहां उन्होंने धर्मशाला बनवाया, कुआं खुदवाया था.. सिख इतिहासकारों की माने तो यहां गुरु साहिब को उनके परम भक्त भाई मिहान जी भी मिले थे, जो निस्वार्थ भाव से गुरु साहिब की सेवा करते थे.. उनकी भक्ती से खुश होकर गुरुसाहिब ने उन्हें सिख धर्म के प्रचार के लिए एक ढोल, एक बैल और एक झंडा दिया था, कहा जाता है कि पहले इस स्थान को धर्म का स्थान कहा जाता था, जो धीरे धीरे बदलते बदलते धमतान साहिब बन गया। यहां एक आलीशान सफेद पत्थर का बना गुरुद्वारा है। जिसे 19वी शताब्दी में पटियाला के महाराजा करम सिंह ने बनवाया था। जो कि पूरी तरह से हवेली की शैली में बनाई गई है। ये गुरुद्वारा 24 घंटे सातों दिन चलता रहता है, जहां 24 घंटे संगतों के लिए लंगर चलता रहता है। इस गुरुद्वारे की देखभाल शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति करती है।
2. गुरुद्वारा नाडा साहिब – Gurudwara Nada Sahib
हरियाणा के पंचकुला में शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में खुबसूरत दो नगियों घग्गर और हाकरा के किनारे आलीशान से खड़ा गुरुद्वारा नाडा साहिब दसवे गुरु गुरु गोबिंद सिंह की यात्रा की, उन्हें यहां विश्राम करने की याद दिलाता है। कहते है कि 1688 में भंगानी के युद्ध के बाद गुरु साहिब पोंटा साहिब से विजयी होकर जब आनंदपुर साहिब जा रहे थे, तब वो इस स्थान पर अपने सैनिको के साथ रूके थे। सभी बहुत थके हुए थे, और इस दौरान गांव के नाडू शाह लुबाना ने उन्हें और उनकी संगत को खाना और दूध दिया था। इस जगह की खोज भाई मोथा सिंह ने की थी। जहां एक पवित्र चबूतरा बनाया गया। कहा जाता है कि 1948 तक ये पटियाला और पूर्वी पंजाब राज्य संघ के धर्मार्थ के अधीन था लेकिन 1956 में पंजाब में विलय के बाद ये स्थान समिति के अधीन चला गया। ये दो मंजिला गुंबदनुमा इमारत है.. यहां एक बड़ा प्रार्थनाभवन है। एक लंगर भवन है, और आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए रहने, आराम करने के लिए कमरे है। ये 24 घंटे खुला रहता है. हर महीने पूर्णिमा के दिन यहां एक बड़ा उत्सव मनाया जाता है.. जिसमें सैकड़ो लोग जमा होते है।
3. गुरुद्वारा लखनमंजरा साहिब – Gurudwara Lakhanmajra Sahib
रोहतक जिले में मौजूद है लखन माजरा गांव, जो नौवे गुरु गुरु तेगबहादुर जी के पावन चरणों के पड़ने के बाद सिक्खी की खूश्वू से भर गया। कहा जाता है कि जिंद से दिल्ली जाते समय गुरु साहिब लखन माजरा गांव में रूके थे। जहां उन्होंने संगत सेवा को सर्वोपरि बताया। उनके भक्त 1947 तक इस स्थान पर केवल कमरा बना कर गुरु साहिब को याद करते थे, लेकिन बंटवारे के बाद पाकिस्तान से यहां आये सिखों ने गुरु साहिब की इस स्मृति को तराशने का फैसला किया औऱ 1958 में यहां वर्तमान ध्वज स्थापित किया। फिर 1967 में यहां पांच मंजिला इमारत तैयार की गई। दरबार साहिब तीसरी मंजिल पर स्थिति है। वहीं एक मंजिल पर लंगर भवन है , तो वहीं संगहालय भी मौजूद है। यहां हर मार्च में होने वाला होला मोहल्ला सबसे प्रसिद्ध त्योहार है।
4. गुरुद्वारा कपाल मोचन – Gurudwara Kapal Mochan
हरियाणा के यमुनानगर जिले के बिलासपुर गांव में स्थित गुरुद्वारा श्री मोचन साहिब, जिसे गोपाल मोचन भी कहा जाता है। कहा जाता है कि इस गुरुद्वारे के पास मौजूद है विशाल सरोवर। कहा जाता है कि यहां कभी ऐतिहासिक सरस्वती नदी बहती थी। वहीं इस सरोवर में स्नान करने से व्यक्ति सभी संसारिक कर्जो और कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। हर साल यहां कार्तिक पूर्णिमा के दौरान 5 दिन का मेला लगता है, जिसे मेला कपाल मोचन कहा जाता है। 1688 में भांगानी की लड़ाई के बाद गुरु गोबिंद सिंह कपल मोचन की यात्रा पर आये थे, जहां उनसे पहले पहले गुरु गुरु नानक देव जी भी आये थे। गुरु साहिब ने तालाब के पानी को दूषित करने वाले दुश्मनों से छुटकारा दिलनाया था, और विशाल किले का निर्माण शुरु कराय़ा था। ये गुरुद्वारा उनकी ही याद में बनवाया गया है। ये बेहद खूबसूरत और भव्य गुरुद्वारा है। जिसके चारो तरफ तालाब है। उसकी गुंबदनुमा संरचना किसी का भी मन मोह लें।
5. गुरुद्वारा नीम साहिब – Gurdwara Neem Sahib
कैथल सफ़ेद पत्थरो की चमचमाहट से पूरे वातावरण को एक अलग पवित्रता का अहसास कराने वाला गुरुद्वारा नीम साहिब, कैथल का एक बेहद पवित्र और मानयता वाला गुरुद्वारा है। नौवे गुरु गुरु तेग बहादुर जी के त्याग और समर्पण को दर्शाने वाला ये गुरुद्वारा गुरू साहिब की उस यात्रा की याद दिलाता है जब वो आनंदपुर से दिल्ली आ रहे थे। गुरु साहिब यहां मौजूद नीम के पेड़ के नीचे बैठ कर भजन कीर्तन करते थे.. जिससे सुनने के लिए सैकड़ो लोग जमा होने लगे। इस दौरान एक भक्त को काफी तेज बुखार था. लेकिन गुरु साहिब को देखने की इच्छा के कारण वो भी आ गया बस गुरु साहिब ने उस पर कृपा की और उसे नीम की कुछ पत्तियां तोड़ कर खाने के लिए दी.. जिसे खाते ही वो ठीक हो गया.. और तब से इस स्थान को नीम साहिब कहा जाने लगा। यहां हर महीने चंद्र पंचाग के पहले दिन विशान लंगर का आयोजन होता है। जो बेहद फेमस है। सफेद पत्थरो के बना इस गुरु द्वारे के आसपास विशाल तलाब है। जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा देता है।












































