पंजाब के गांवों में बढ़ते जा रहे हैं ‘पगड़ी वाले ईसाई’, जानें क्यों बड़ी तादात में मजहबी सिख और वाल्मीकि हिन्दू कर रहे हैं धर्मांतरण

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 25 अप्रैल 2024, 12:00 AM 🔄 Updated: 25 अप्रैल 2024, 12:00 AM
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यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट के आंकड़ों के मुताबिक, पंजाब के 12,000 गांवों में से कम से कम 8,000 में ईसाई धार्मिक समितियां हैं। जानकारी के मुताबिक, अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में चार ईसाई समुदायों के 600-700 चर्च हैं। परेशान करने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 60-70 फीसदी चर्च पिछले पांच साल में अस्तित्व में आए हैं। पिछले कुछ सालों से बटाला, गुरदासपुर, जालंधर, लुधियाना, फतेहगढ़ चूड़ियां, डेरा बाबा नानक, मजीठा, अजनाला, अमृतसर समेत पंजाब के कई ग्रामीण इलाकों से धर्मांतरण की खूब खबरें आ रही हैं। प्रदेश में दस्तार वाले ईसाइयों की लगातार बढ़ती संख्या इसका जीता जागता सबूत है। वैसे तो पंजाब की केवल 1.26 प्रतिशत आबादी ही ईसाई है, लेकिन यहां लगातार बढ़ते धर्मांतरण के कारण जमीनी हकीकत पूरी तरह बदल गई है।

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सिख संगठन हुए चिंतित

राज्य सरकार इस धर्मांतरण के खेल पर चुप है, लेकिन अकाल तख्त ने इस मुद्दे पर हस्तक्षेप किया है और मुखर होकर बोला है। अकाल तख्त के मुताबिक, ईसाई मिशनरियां पंजाब की सीमाओं के आसपास के गांवों में सिखों और हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रही हैं। अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने पहले कहा था कि सीमावर्ती ग्रामीण इलाकों में ईसाई मिशनरियां सिख और हिंदू परिवारों को पैसे का लालच देकर जबरन धर्म परिवर्तन करा रही हैं।

धर्मांतरण की क्या हैं वजहें

पंजाबी गांवों में, खस्ताहाल ‘दलित’ गुरुद्वारे और आलीशान ‘जट्ट’ गुरुद्वारे आम दृश्य हैं। विभिन्न जातियों के लिए अक्सर दो या तीन गुरुद्वारे होते हैं, जो इस क्षेत्र में जातिवाद की लंबी जड़ों को प्रदर्शित करता है। इससे अलगाव की भावनाएँ पैदा होती हैं और चर्च समुदाय की भावना प्रदान करते हैं। चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया में सामाजिक-आर्थिक मुद्दों के निदेशक डेनियल बी. दास ने दिप्रिंट को बताया कि ‘पंजाब में 95 प्रतिशत ईसाई एक ही वर्ग और एक ही जाति से आए हुए हैं, इसलिए यहां भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है, जैसा कभी-कभी दक्षिण भारत में होता है। दलित ईसाई धर्म में मिलने वाली सुरक्षा और समानता के लिए ही धर्मांतरण का रास्ता अपनाते हैं।’

वह आगे कहते हैं, ‘हम लोगों को पैसे का प्रलोभन देते हैं जबकि सच्चाई यह है कि लोग चर्च में समानता की तलाश करते हैं। अन्य धर्मों में छुआछूत जैसी कुछ कुप्रथाएं हैं जिन्हें वे दूर करना चाहते हैं।’

दलित बदल रहे धर्म

जिस प्रकार 1980 और 1990 के दशक में तमिलनाडु में ईसाइयों की संख्या में वृद्धि देखी गई थी, वही स्थिति पंजाब में भी हो रही है। गुरदासपुर के कई गांवों की छतों पर छोटे-छोटे चर्च बनाए जा रहे हैं। सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था और अन्याय से तंग आकर पंजाब के सीमावर्ती जिलों में मजहबी सिखों और वाल्मीकि हिंदू समूहों के कई दलितों ने बेहतर जीवन और शिक्षा की तलाश में ईसाई धर्म अपनाना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मुख्य कारण यह है कि जट सिख मजहबी सिखों को अपने बराबर नहीं मानते हैं। इस कारण धार्मिक सिखों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया जाता। इसी कारण मजहबी सिख और वाल्मीकि हिंदू ईसाई बन रहे हैं। बाकी कसर ईसाई मिशनरियों की चिकनी-चुपड़ी बातों और प्रलोभन से पूरी हो रही है।

पंजाब में ईसाइयों की आबादी

2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब की जनसंख्या 2.77 करोड़ थी। कुल आबादी में सिखों की संख्या 57.70 फीसदी है। राज्य के कुल 23 जिलों में से 16 में सिख बहुसंख्यक हैं, शेष 7 में हिंदू बहुसंख्यक हैं। हिंदुओं की जनसंख्या 38.40 प्रतिशत है, मुसलमानों की संख्या 1.90 प्रतिशत है, जबकि ईसाइयों की संख्या केवल 1.30 है प्रतिशत। पंजाब में ईसाई मिशनरियों के ट्रेंड देखें तो पिछले 11 बरसों में ईसाइयों की संख्या इससे कहीं अधिक बढ़ी है। लेकिन यह आंकड़ा इस कारण सामने नहीं आ पाता है क्योंकि कई लोग ईसाई बनने के बाद भी कागजों में अपना नाम नहीं बदलते हैं।

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