कर्पूरी ठाकुर जिन्होंने पिछड़ी जाति के लिए किया काम और बदले में मिली गलियां

vickynedrick@gmail.com | Nedrick News Published: 24 जनवरी 2024, 05:30 AM Updated: 24 जनवरी 2024, 05:30 AM
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बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत सरकार ने मरणोपरांत भारत रत्‍न देने की घोषणा की है और ये घोषणा उनके 100वीं जयंती पर की गयी है. दरअसल, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न दिए जाने की मांग की थी और अब भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत भारत रत्‍न देने का ऐलान किया है. कर्पूरी ठाकुर की पहचान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक और राजनीतिज्ञ के रूप में रही है  लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा याद पिछड़े वर्ग के लिए किये कामों की वजह से किया जाता है जिसकी वजह से उन्हें माँ-बहन-बहु-बेटियों के नाम की गलियां दी गयी.

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कम समाज के लोगों के लिए काम 

कर्पूरी ठाकुर का जन्म समस्तीपुर के पितौंझिया में 24 जनवरी, 1924 को हुआ था लेकिन अब इस जगह को कर्पूरीग्राम के नाम जाना जाता है. कर्पूरी ठाकुर ने स्वतंत्रता सेनानी के रूप में तब उभरे जब आज़ादी की लड़ाई के दौरान वो 26 महीने जेल में रहे. इसके बाद गांव में होम विलेज लाइब्रेरी के लाइब्रेरियन बने और 1942 में पटना विश्वविद्यालय में अपनी सेवा दी और इसके बाद वो समाजवादी पार्टी और आंदोलन के प्रमुख नेता बने. बिहार एक दो एक बार मुख्यमंत्री एक बार उपमुख्यमंत्री साथ ही शिक्षा मंत्री रहते हुए राज्य में कम जाति के लोगों के लिए काम किया और इस बदले में उन्हें उच्च जाति के लोगों का भारी विरोध का सामना करना पड़ा साथ ही उन्हें गालियां भी खानी पड़ी.

कर्पूरी ठाकुर के खिलाफ विरोध का दौर शुरू 1967 में हुआ जब वो बिहार के डिप्टी सीएम बने और उन्होंने मैट्रिक तक की शिक्षा में अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म किया. इस फैसले की खूब आलोचना हुई, लेकिन इस फैसले का असली मतलब  गरीब के बच्चों तक भी शिक्षा पहुंचना था.

कर्पूरी जब शिक्षा मंत्री बने तब उन्होंने मिशनरी स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई शुरू करवाई. गरीब बच्चों की स्कूल फीस माफ किया.  और इस तरह कर्पूरी देश के पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने बिहार में मैट्रिक तक मुफ्त पढ़ाई की घोषणा की थी ताकि हर समाज के लोगों को पढने का मौका मिल सकें.

आरक्षण देने की वजह से मिली गलियां 

कर्पूरी ठाकुर का विरोध और गलियां तब भी मिली जब वो दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने कर्पूरी जी 1977 में दोबारा मुख्यमंत्री बने और 11 नवंबर 1978 को महिलाओं के लिए 3 %, ग़रीब सवर्णों के लिए 3 % और पिछडों के लिए 20 % यानी सरकारी रोज़गार में 26 प्रतिशत आरक्षण लागू किया और इसके बदले में उन्हें गाली मिली.

 उन पर तंज कसते हुए ये भी बोलते थे –

  • कर कर्पूरी कर पूरा
    छोड़ गद्दी, धर उस्तुरा.
  • ये आरक्षण कहां से आई
    कर्पूरिया की माई बियाई.
    • MA-BA पास करेंगे

    कर्पूरिया को बांस करेंगे.

  • दिल्ली से चमड़ा भेजा संदेश
    कर्पूरी बार (केश) बनावे
    भैंस चरावे रामनरेश.

ठाकुर अतिपिछड़े समाज से आते थे. उनकी जाति नाई थी और इस वजह से उन्हें उनकी जाति के नाम पर माँ-बहन-बहु-बेटियों की गाली दी गयी. जहाँ उच्च जाति के लोगों ने उन्हें गाली दी तो वहीं कॉलेज स्टूडेंट्स और स्कूली बच्चे ने भी कर्पूरी ठाकुर के नाम पर मुर्दाबाद की नारे लगाए.

‘कितना राज कितना काज’ किताब में हुआ इस किस्से का जिक्र 

कर्पूरी सरकार में नंबर दो माने जाने वाले भूमिहार नेता कपिल देव सिंह ने ठाकुर के जीवनी लेखक डॉ. नरेन्द्र पाठक के हवाले से ‘कितना राज कितना काज’ किताब में इस बात का जिक्र करते हुए कहा कि आरक्षण नीति का चारों और विरोध हो रहा था. पटना के पास एक छोटे से कस्बे नौबतपुर में मैं सीएम ठाकुर के साथ गया. वहां हमने देखा क़रीब 10 हज़ार लोग लाठी, डंडों और हसिये के साथ विरोध कर रहे थे. डीएम और एसपी की गाड़ियां रोकी गयी. अब बस पुलिस गोली चलाने के लिए हमारे आदेश का इन्तजार कर रही थी. कर्पूरी ठाकुर अपने वाहन से बाहर निकले और मुझसे कहा कि ये लोग नहीं जानते कि ये किस बात का विरोध कर रहे हैं. इन्हें बताया गया है कि ये भूमिहार हैं या राजपूत हैं. ये मां की कोख से हमें गाली देना सीखकर आये हैं और मैं ये गालियां अपनी मां की कोख से सुनता आ रहा हूं. ये हमें जितना कोसते हैं, हमें उतना ही साथ मिलता है. पिछड़ा और ज़्यादा साहसी होता जा रहा है.

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