Sikh chiefs Punjab: जब अंग्रेज पहली बार भारत आये थे तब मुगलो का शासन था, पहले वो केवल व्यापार के लिए आये थे, लेकिन धीरे धीरे उन्होंने यहां के बाजार पर कब्जा जमाना शुरु कर दिया.. वो लोगो को बेहतर जिंदगी देने, ढेर सारा पैसा कमाने का लालच देकर उनसे अपने काम निकलवाने की पूरी फिराक में रहते थे। जैसे जैसे वो शक्तिशाली होते गए वैसे वैसे मुगल कमजोर होते गए.. साल 1771 तक तो आलम ये था कि सम्राट शाह आलम को अंग्रेजो के सानिध्य में रहना पड़ रहा था, और उनकी दी गई अच्छी खासी पेंशन पर जिंदगी गुजार रहे थे। लेकिन वहीं दूसरी तरफ पंजाब की स्थिति बिल्कुल अलग थी। अलग अलग 12 मिसलो ने पंजाब को बांट रखा था.. और वो अंग्रेजो को अपने करीब भी नहीं भटकने देते थे..वहीं अंग्रेजो की चाल की सिख पहले ही अच्छी तरह से समझ चुके थे,,वहीं लाहौर के मुगल गवर्नरों और अहमद शाह अब्दाली के साथ भिड़त होने के बाद सिखों का दबदबा और बढ़ गया..और सिख 18वी सदी के अंत में एक मजबूत पावर ब्रोकर बनने लगे थे।
18वीं शताब्दी में सिख सरदारों का उदय
मुगल शासक शाह आलम करीब 6 सालो से इलाहाबाद में अंग्रेजो को टुकड़ों पर पल रहे थे.. लेकिन 1768 में सरदार जस्सा सिंह अहलूवालिया ने शाह को एक पत्र लिख कर कहा था कि अगर वो वापिस दिल्ली की सत्ता पर काबिज होते है तो वो उन्हें अपना समर्थन देने के लिए तैयार है.. लेकिन सिखों की बढ़ती ताकत से शाह वाकिफ थे और उन्हें डर था कि कहीं सिख सरदार अपना इरादा न बदल लें.. सिखों ने दिल्ली पर कब्जा कर लिया तो हो सकता है कि वो ऐसे कठपुतली मुगल राजकुमार को सत्ता पर बिठा दें और खुद शासन करें। लेकिन विडंबना ये थी कि उस वक्त सिखों के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं था, जो मुगलो का साथ थे। लेकिन करीब 10 सालो के बाद 6 जनवरी 1772 को सम्राट ने मराठो के दिल्ली पर कब्जा करने के बाद मधाजी सिंधिया के साथ दिल्ली में प्रवेश का था। मुगलो ने इसके लिए 25 लाख रूपय औऱ मेरठ औऱ उसके आसपास के हिस्से दिये थे।
पंजाब पूरी तरह से सिख सरदारों के नियंत्रण में
वहीं इस बीच पंजाब पूरी तरह से सिख सरदारों के नियंत्रण में था। अहमद शाह अब्दाली और नजीब खान रोहिल्ला की मौत हो गई थी.. यानि फिलहाल के लिए विदेशी खतरा टल गया था, वही मराठा पानीपत की हार से उबर नहीं पाये थे, भले ही वो सत्ता में आ गए हो. रोहिल्ला और जाट दोनो युद्ध की मार के कारण कमजोर हो चुके थे। अवध राज्य जिसमें बिहार, बंगाल और उसके आसपास के क्षेत्र थे, अंग्रेजों के अधीन थे.. अब बचे थे केवल सिख सरदार। सरबप्रीत सिंह द्वारा लिखी किताब “काल्ड्रॉन, स्वॉर्ड एंड विक्ट्री: द राइज़ ऑफ़ द सिख्स” में उन्होंने सिख सरदारों के 18 वी सदी के अंत में एक ताकतवर संगठन बन कर उभरने को लेकर जिक्र किया है। मुगल सम्राज्य के पतन और अफगानी सेना के हमलो से कमजोर होने के बाद सिख सरदार ने पंजाब को 12 हिस्सों में बांटा.. और अपने अपने तरीके से शासन करने लगे.. वे सभी अपने में बेहद ताकतवर थे।
पंजाब के आसपास के क्षेत्रिय ताकते
उन्होंने पंजाब और सरहिंद की उन जमीनों और संसाधनो पर कब्जा करना शुरु कर दिया जो उपजाई हो, और जिससे उनकी सेना मजबूत हो.. वो अपनी सेना को घुड़सवारी जैसी ट्रेनिंग देते थे.. साथ ही राखी प्रणाली, यानि की किसी भी राज्य को सुरक्षा देने के बदले मिलने वाली अच्छी खासी रकम से वो आर्थिक रूप से तो मजबूत हुए ही साथ ही उन्होंने अपनी सेना को भी और बहुत मजबूत करना शुरु कर दिया। वहीं पंजाब के आसपास के क्षेत्रिय ताकते युद्ध जैसी स्थिति में सिख सरदारों पर निर्भर होने लगी थी। वहीं सिख सरदार राजाओं की आपसी लड़ाईयों में मीडीएटर की भूमिका निभाने लगे थे। जिससे उनकी भूमिका एक निर्णायक शक्ति की तरह काम करती थी। वहीं 18वी सदी के अंत में सिख सम्राज्य में सुकरचकिया मिसल के नेता रणजीत सिंह ने अपनी सास की मदद से सभी मिसलो को एकजुट करना शुरु कर दिया।
महाराजा रणजीत सिंह ने पंजाब को किया मजबूत
वो बातचीत से या फिर सैन्य ताकत से पंजाब के मिसलो को एकजुट कर एक सिख सम्राज्य स्थापित करने में सफल हुए.. उन्होने कूटनीति, शक्ति और समझौते को इसके लिए जरिया बनाया औऱ 1801 में उन्होंने लाहौर में भंगी मिसल को हराकर सिख सम्राज्य की नींव रखी। महाराजा रणजीत सिंह ने सैन्य ताकत को बढ़ाने के साथ राजनैतिक, समाजिक आर्थिक रूप से भी पंजाब को संपन्न बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के प्रशासन और सेना में सिखों के साथ साथ हिंदू और मुसलमान अधिकारियों को उनकी योग्यता के अनुसार पद दिये.. साथ ही उन्होंने यूरोपियन पद्दति के जरिए आधुनिक सेना को तैयार किया जिसने एक मजबूत खालसा सेना को तैयार किया। अंग्रेज हूकूमत डायरेक्ट सिख सम्राज्य से नहीं टकरा सकते थे इसलिए उन्होंने महाराजा को कई बार उलझाने की कोशिश की। 1809 में अमृतसर की संधि की.. जो राजनीतिक शांति औस सीमा निर्धारण की संधि थी.. जिसे अंग्रेजो ने केवल भरोसा जीतने के लिए किया था, ताकि महाराजा को ये यकीन हो जाये कि अंग्रेज उनके भिड़ने की कोशिश नहीं करेंगे।
अक्टूबर 1831 में महाराजा रणजीत सिंह और ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक के पंजाब के रोपड़ जिले में एक बैठक हुई.. ये बैठक रूस के खतरे को भापते हुए अंग्रेजो ने महाराजा से मदद मांगने के लिए की थी..वहीं महाराजा सिँध के बंदरगाहो तक कब्जा चाहते थे, ताकि यूरोप तक सीधे समुद्र के रास्ते व्यापारिक मार्ग खुले.. वहीं अंग्रेज भी यहीं चाहते थे, जिसके कारण 1832 में सिंधु नौवहन संधि हुई.. और सिख सम्राज्य के साथ साथ ब्रिटिश सरकार को भी नदियों के रास्ते व्यापार करने की अनुमति मिल गई। सिख सरदारों की ताकत महाराज रणजीत सिंह के जिंदा रहते बरकरार रही.. और उन्होंने पंजाब को एक मजबूत व्यापारिक और राजनैतिक केंद्र बना दिया.. जो आर्थिक रूप से एक संपन्न और ताकतवर राज्य था। लेकिन 1839 में महाराजा की मौत के बाद सब बदल गया.. और मात्र 10 सालो के बाद ही पंजाब पर अंग्रेजो की हूकूमत शुरु हुई जो भारत की आजादी तक रही थी। अंग्रेजो ने सिखों को बांट दिया, एक वो जो अंग्रेर्जी हूकूमत के वफादार थे और दूसरे जो उनके खिलाफ थे.. इस कारण सिख फिर से कभी एकजुट होकर मजबूत नहीं हो पायें।













































