फुले vs तिलक: यह जानने के बाद आप कभी गणेश उत्सव नहीं मनाएंगे

👤 vickynedrick@gmail.com | Nedrick News 🕒 Published: 17 जून 2023, 12:00 AM 🔄 Updated: 17 जून 2023, 12:00 AM
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Bal Gangadhar Tilak vs Jyotirao Phule – बाल गंगाधर तिलक, और ज्योतिराव फुले ये दोनों ही ऐसे महान नायक थे जो पाने क्षेत्रों में अपने हमेशा से अपने सिद्धांतों के लिए जाने जाते थे हैं और रहेंगे. और जब तक देश में जातिवाद, वर्णव्यवस्था जैसे मुद्दों पर मामले सामने निकल कर आएंगे तब तक इन दोनों नायकों का जिक्र होता रहेगा.

जहां एक तरफ ज्योतिराव फुले देश भर में व्याप्त जाति और वर्णव्यवस्था के खिलाफ थे इसे समाज से उठाना चाहते थे तो वहीँ बाल गंगाधर तिलक जिन्हें हम एक महान स्वतंत्रता सेनानी मानते हैं और थे भी महान लें सिर्फ चंद ब्राह्मणों की नजरों में ना की देश कि 50 फ़ीसदी से भी ज्यादा संख्या में रहने वाले हमारे दलित भाइयों बहनों के लिए. क्योंकि उन्होंने हमेशा से ही उन्हें आगे बढ़ने के लिए रोका है उनका विरोध किया है. यहाँ तक की वो महिला शिक्षा तक का विरोध करते थे. और वहीँ अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली पर कभी सवाल नहीं किया. हम ऐसा क्यों कह रहे हैं आइए इस पूरे मामले को विस्तार से पढ़ते हैं.

क्या दलित विरोधी थे बाल गंगाधर तिलक

  • साल 1881 में बतौर पत्रकार तिलक का करियर उनके तीन विरोधाभासी कामों से शुरू हुआ. पहला था कि , उन्होंने ब्रिटिश प्रेस (1 मई 1881) में कुछ पुराने लेखों को छपवाकर कार्ल मार्क्स की जमकर तारीफ की थी.
  • दूसरा, उन्होंने लागू हुए, दक्कन के किसानों की राहत के लिए बने क़ानून की जमकर आलोचना की. जबकि ये कानून ग़रीब किसानों को उन लालची सूदखोरों से बचाने के लिए था जो उनकी बची-खुची संपत्ति भी हड़प जाते थे और कर्ज़ ना चुकाने के जुर्म में उन्हें जेल भिजवा देते थे.
  • तीसरा, उन्होंने जाति व्यवस्था का बचाव किया.
  • उस दौरान ‘सहमति का बिल’ (विवाह की उम्र को लेकर) भी आया. तिलक इन दोनों के विरोधी बन कर उभरे.

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Bal Gangadhar Tilak vs Jyotirao Phule

तिलक का किसान विरोध सिर्फ किसों के विरोध से नहीं बल्कि जाती व्यवस्था के उनके समर्थन से जुड़ा हुआ था. और यही नहीं अपनी शिक्षा के इस एजेंडे के जरिए ही वो हमेशा से जाति-व्यवस्था का बचाव भी करते रहे. तिलक का कहना था कि ‘कुनबियों (किसानों) के बच्चों को शिक्षा देना बेकार है, पढ़ना-लिखना सीखना और गणित, भूगोल की जानकारी का उनकी व्यावहारिक ज़िंदगी से कोई लेना-देना नहीं है. पढ़ाई-लिखाई उन्हें फ़ायदा नहीं, नुक़सान ही पहुँचाएगी.’

उनका कहना था कि, “ग़ैर-ब्राह्मणों को तो बढ़ईगिरी, लुहार, राज मिस्त्री के काम और दर्जीगिरी सिखाई जानी चाहिए. उनका जो दर्जा है, उसके लिए यही काम सबसे मुफ़ीद हैं.” तिलक इसे ‘शिक्षा का तार्किक सिस्टम’ बताते थे. साल 1881 में पूना सार्वजनिक सभा ने सरकार से 200 लोगों की आबादी वाले हर गाँव में एक स्कूल खोलने की माँग की. तिलक ने फ़ौरन इसका विरोध किया.

महात्मा फुले और तिलक के बीच संघर्ष

मसला न. 1- तिलक इस बात पर जोर देते थे कि जाति पर भारतीय समाज की बुनियाद टिकी है, जिसका समर्थन देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी करते थे. जाति-व्यवस्था की समाप्ति का मतलब ये हुआ कि भारतीय समाज की जो बुनियाद है उसको खंडित कर देना. और साथ ही साथ साथ राष्ट्र और राष्ट्रीयता को तो़ड़ना है. इन सबके परे जोतीराव फुले….जाति को असमानता ,गैरबराबरी, भेदभाव की बुनियाद मानते थे और जबसे इसके बारे में जानने और समझने लायक हुए इसे समाप्त करने का संघर्ष कर रहे थे. तिलक ने ज्योतिराव फुले को राष्ट्रद्रोही तक कहा, क्योंकि वे राष्ट्र की बुनियाद जाति व्यवस्था को तोड़ना चाहते थे.

मसला न. 2- तिलक ने…प्राथमिक शिक्षा को सबके लिए अनिवार्य बनाने के फुले के प्रस्ताव का कड़ा विरोध तक किया. लोकमान्य तिलक का कहना था कि, ‘शूद्र, अतिशूद्र समाज के बच्चों को इतिहास, भूगोल और गणित पढ़ने की क्या जरूरत है, उन्हें अपने परंपरागत जातीय पेशे को अपनाना चाहिए. आधुनिक शिक्षा उच्च जातियों के लिए ही उचित है. क्योंकि वो उससे वो काम भूल जाएंगे जो उन्हें वास्तव में करने चाहिए.

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मसला न. 3- तिलक (Bal Gangadhar Tilak vs Jyotirao Phule) का तो ये तक कहना था कि…सार्वजनिक धन से नगरपालिका को सबको शिक्षा देने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि यह धन कर-दाताओं का है, और शूद्र-अतिशूद्र कर नहीं देते हैं. तो ऐसे में नगरपालिका का पैसा उनकी शिक्षा के बजाय ऐसे लोगों को शिक्षा दी जाए जो उसके योग्य हो.

मसला न. 4- तिलक ने…लड़कियों को शिक्षित करने का तीखा प्रतिरोध और प्रतिवाद किया और लड़कियों के लिए स्कूल की स्थापना के विरोध में आंदोलन चलाया. तिलक कहते थे कि, “अंग्रेज़ी शिक्षा महिलाओं को स्त्रीत्व से वंचित करती है, इसे हासिल करने के बाद वे एक सुखी सांसारिक जीवन नहीं जी सकतीं.”

क्यों मनवाया गणेश महोत्सव?

लोकमान्य तिलक ने समाचार पत्रों केसरी और मराठा के संपादक के रूप में, हिंदुओं की ओर से उनका मोर्चा संभाला. और इस बात पर उन्होंने जोर देकर कहा कि हर सांप्रदायिक संघर्ष के दौरान, अंग्रेजों को निष्पक्ष होना चाहिए न की किसी एक समुदाय के पक्ष में.  लेकिन हिंदुओं ने आत्मरक्षा में काम किया था, जिसके बावजूद गवर्नर लॉर्ड हैरिस ने उन्हें ही दोषी ठहराया था.  इस तरह से, यह न केवल हिंदुओं और मुसलमानों के बीच का विवाद बना, बल्कि इसमें ब्रिटिश सरकार की भी उतनी ही हिस्सेदारी थी जितनी की मुसलमानों की. जिसके बाद से यह एक ऐसी लड़ाई बन गयी थी जिसमें हिन्दू मुस्लिम तो शामिल थे ही फिरंगी भी शामिल हो गए थे.

लेकिन इस तरह के सांप्रदायिक संघर्षों के वक़्त हिन्दू कारण के आक्रामक समर्थन ने रूढ़िवादी ब्राह्मणों से परे तिलक के प्रभाव को और भी बढ़ा दिया. और मुंबई में श्रमिक वर्गों और गुजराती और मारवाड़ी व्यापारियों में उनके लिए एक निर्वाचन क्षेत्र बनाया. अगले साल, (अप्रैल 1894), पुणे के दुल्या मारुति मंदिर में एक उत्सव को लेकर सांप्रदायिक तनाव हो गया और जून में, श्रद्धेय भक्ति संत ज्ञानेश्वर की ‘पालखी’, जो पंढरपुर जा रही थी, पर पथराव किया गया.

आपको जानकर और भी हैरानी होगी कि हिन्दू बाहुल्य जैसे देश में उस समय, बॉम्बे प्रेसीडेंसी में मुहर्रम सबसे लोकप्रिय कार्यक्रम था.

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हिन्दुओं ने किया मुहर्रम मनाने से इनकार

महाराष्ट्रीयन हिंदुओं की उपस्थिति के साथ ही मुहर्रम देश के और भी कई हिस्सों में भी लोकप्रिय था. लेखक-पत्रकार ए जे करंदीकर ने मुहर्रम पर लिखा था कि मुधोल (वर्तमान कर्नाटक) में मुहर्रम हिंदुओं द्वारा चिह्नित किया गया था, यहां तक ​​कि उन गांवों में भी जहां कोई मुस्लिम निवासी नहीं था.

सांप्रदायिक हिंसा के बाद राज्य में बढ़े तनाव ने इस संशय को समाप्त कर दिया. जहाँ एक तरफ हिन्दुओं ने मुहर्रम को अपने त्यौहार के रूप में मनाने से इनकार कर दिया. जिसके बाद 1894 में, पुणे में वर्जितों की संख्या पिछले वर्ष के लगभग 300-400 की तुलना में घटकर मात्र 50-75 रह गई. उस साल, तिलक ने गणेश उत्सव के उत्सव को बढ़ावा देना शुरू कर दिया, जिसने जल्द ही इसकी लोकप्रियता में मुहर्रम का स्थान ले लिया. संयोग से, मुहर्रम की तरह, गणेश उत्सव भी जुलूस के साथ समाप्त होता है.

…और तिलक ने कर दी गणेश महोत्सव की शुरुआत

Bal Gangadhar Tilak vs Jyotirao Phule details in Hindi – ऐसा माना जाता है कि तिलक ने गणेश उत्सव को सार्वजानिक रूप से मनाने की शुरुआत की थी, ये त्यौहार इससे पहले भी महाराष्ट्र के पुणे में यह तीन स्थानों पर मनाया जाता था, मतलब ये हुआ कि अन्नासाहेब खासगीवाले, भाऊ लक्ष्मण जावले उर्फ ​​भाऊसाहेब रंगारी और गणेश नारायण घोटावाडेकर द्वारा. इन उत्सवों को दंगों के बाद तिलक द्वारा व्यापक और लोकप्रिय बनाया गया.

बाल गंगाधर तिलक पर जीवनी लिखने वाले लेखक धनंजय कीर ने लिखा है कि: “तिलक के आगमन से पहले, गणेश उत्सव एक सार्वजनिक मामला नहीं था. यह उनकी आयोजन क्षमता थी जिसने इसे एक सार्वजनिक उत्सव में बदल दिया. जल्द ही, पूरे महाराष्ट्र में गणेश मंडल या त्योहार समाज शुरू किए गए. यह कोई संयोग नहीं था कि चितपावन ब्राह्मण पेशवा, जो मराठा संघ के वास्तविक प्रमुखों के रूप में, एक बार पुणे से भारतीय उप-महाद्वीप के बड़े हिस्से पर शासन करते थे, भगवान गणपति के श्रद्धेय थे. इन सार्वजनिक उत्सवों ने गणेश पूजा को गैर-ब्राह्मण जनता तक ले जाने में भी मदद की”.

जाति-व्यवस्था विरोधी क्यों करने लगे एकजुट होने की बात?

दरअसल अब आप भी थोड़ा ये समझने की कोशिश में लग गए होंगे की आखिर जाति-व्यवस्था से लेकर महिला शिक्षा तक सब के विरोधी अचानक गणेश महोत्सव जैसे कार्यक्रम के जरिए पूरे हिन्दू समुदाय पिछड़ी जातियों के लोग को लेकर चलने की बात क्यों करने लगे?

1) जो व्यक्ति किसानों का विरोधी था, महिला शिक्षा का विरोधी था, पिछड़ी जातियों को लेकर जिसकी विचारधारा विरोधाभाषी थी वो अचानक कैसे पलट गया? तो जवाब आता है सांप्रदायिक हिंसा. लेकिन इसका एक पहलू ये भी हो सकता है कि देश की राजनीति बदल रही थी लोगों की विचारधारा बदल रही थी, पिछले जाती के लोग अपनी हक़ की लड़ाई के लिए मुखर हो रहे थे. ऐसे में बालगंगाधर तिलक को इस बात का आभास हो गया था कि अगर देश को एकजुट करना है तो  भारत में सांप्रदायिक हिंसा सिर्फ दो समूहों में होती है वो है हिन्दू और मुस्लिम. सांप्रदायिक हिंसा के मौके पर सारे हिन्दुओं को चाहे वो ब्राह्मण हो या गैर-ब्राह्मण सबको साथ लेकर चलना चाहते थे. और यही वजह रही हो कि उन्होंने ने गणेश महोत्सव मानाने के लिए हिन्दुओं को प्रोत्साहित किया न कि ब्राह्मणों को.

2) 1892-93 के मुंबई दंगो से पहले मुहर्रम मुंबई में सबसे लोकप्रिय घटना होती थी कोई खास हिन्दू त्यौहार उस वक़्त ऐसा नहीं था जो इतने बड़े स्तर पर मनाया जाता हो कि एक सम्प्रदाय की जनता एक मजबूत ताकत के रूप में एकजुट हो. तो शायद दूसरी वजह यही रही हो कि जनाधार इकठ्ठा करने के लिए उन्होंने देश की वास्तविक एकता को प्रदर्शित करने के लिए उन्होंने ऐसा किया.

बालगंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak vs Jyotirao Phule) के इन दो पहलुओं से आप कितना सहमत हैं ये हमें अपने कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

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