Jantar Mantar protest ban: देश की राजधानी सिर्फ हुकूमत चलाने वाली इमारतों का शहर नहीं है, बल्कि यह उन बुलंद आवाजों का भी गवाह रहा है जिन्होंने सत्ता के तख्त हिला दिए। कभी संसद भवन का मुख्य द्वार, कभी बोट क्लब पर लाखों किसानों का जमावड़ा, तो कभी जंतर-मंतर पर साल के 365 दिन गूंजते नारे। अब दिल्ली के इसी सियासी और लोकतांत्रिक नक्शे से एक बेहद अहम पता मिट गया है। दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को आधिकारिक प्रदर्शन स्थलों (Designated Protest Sites) की सूची से बाहर कर दिया है। आठ साल बाद एक बार फिर जंतर-मंतर पर सन्नाटा पसरेगा न कोई बैनर दिखेगा, न तख्तियां और न ही गूंजेंगे धरने के नारे।
इससे पहले अक्टूबर 2017 में एनजीटी (NGT) के आदेश पर यहां धरनों पर पाबंदी लगी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2018 में हटा दिया था। अब दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर की जगह तीन नए विकल्प तय किए हैं: रामलीला मैदान, बुराड़ी ग्राउंड और पूर्वी दिल्ली का सीबीडी (CBD) ग्राउंड।
संसद से बोट क्लब और फिर जंतर-मंतर: आंदोलनों का सफर| Jantar Mantar protest ban
आजादी से पहले चांदनी चौक के आजाद पार्क, टाउन हॉल और जामा मस्जिद जैसे इलाके आंदोलनों के केंद्र थे। आजादी के बाद 1966 तक संसद के ठीक सामने धरने दिए जाते थे, लेकिन गो-रक्षा आंदोलन के हिंसक होने के बाद वहां आम प्रदर्शनों पर पाबंदी लग गई। 1980 के दशक में बोट क्लब किसानों का सबसे बड़ा ठिकाना बना, जहां महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों ने बैलगाड़ियों के साथ इंडिया गेट के लॉन पर हफ्तों तक डेरा डाल दिया था। बोट क्लब बंद हुआ, तो 1993 के बाद जंतर-मंतर सबसे बड़ा अड्डा बनकर उभरा।
21वीं सदी में इसी जंतर-मंतर ने 2011 का अन्ना हजारे का ऐतिहासिक ‘जन लोकपाल आंदोलन’, 2012 का निर्भया कांड के खिलाफ फूटा जनआक्रोश, 2017 में तमिलनाडु के किसानों का 41 दिनों का प्रदर्शन, 2023 में महिला पहलवानों का धरना और हाल ही में छात्र आंदोलनों को देखा।
अब कहां होंगे प्रदर्शन? जानिए तीनों नए विकल्प
- रामलीला मैदान (क्षमता 50,000): जंतर-मंतर से 4 किमी दूर। नई दिल्ली मेट्रो स्टेशन से जुड़ा है, लेकिन यहां बड़े प्रदर्शन से दिल्ली गेट, कमला मार्केट और कनॉट प्लेस का ट्रैफिक ठप हो जाता है।
- सीबीडी ग्राउंड, कड़कड़डूमा (क्षमता 50,000): पूर्वी दिल्ली का यह मैदान जंतर-मंतर से करीब 12-13 किमी दूर है। कड़कड़डूमा कोर्ट मेट्रो पास है, लेकिन खुला मैदान होने से पुलिस को कड़े सुरक्षा घेरे लगाने होंगे।
- बुराड़ी ग्राउंड (क्षमता 1,00,000): जंतर-मंतर से करीब 21 किमी दूर। पिंक लाइन मेट्रो और आउटर रिंग रोड से कनेक्टिविटी है। यह बड़े जमावड़े के लिए उपयुक्त है।
जेब पर भारी और बुकिंग की मारामारी
जंतर-मंतर की खासियत यह थी कि वहां एक साथ दर्जनों छोटे-बड़े संगठन बिना भारी खर्च के अपनी बात रख सकते थे। लेकिन नए मैदानों में एक बार में सिर्फ एक संगठन को इजाजत मिलेगी। इसके अलावा खर्च भी बड़ा रोड़ा है… रामलीला मैदान के लिए एक दिन का किराया 50 हजार रुपये और सिक्योरिटी डिपॉजिट 55 हजार रुपये है। टैक्स मिलाकर शुरुआती खर्च करीब 1.21 लाख रुपये बैठता है। सीबीडी ग्राउंड में भी आयोजन का खर्च 1 से 3 लाख रुपये तक जाता है। साथ ही रामलीला, दशहरा और शादियों के सीजन में इन मैदानों की बुकिंग मिलना बेहद मुश्किल होगा।
व्यापारियों ने ली राहत की सांस, हाईकोर्ट ने मांगा था विकल्प
कनॉट प्लेस (CP) और जनपथ के कारोबारियों ने पुलिस के इस कदम का स्वागत किया है। व्यापारियों का कहना है कि लगातार प्रदर्शनों, बैरिकेडिंग और मेट्रो स्टेशनों के बंद होने से त्योहारी सीजन में ग्राहकों का आना बंद हो गया था। हालांकि, नई दिल्ली ट्रेडर्स एसोसिएशन (NDTA) ने रामलीला मैदान को लेकर चिंता जताई है कि पुरानी दिल्ली के बाजारों पर इसका असर पड़ेगा।
इस पूरे फैसले की पृष्ठभूमि दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया रुख से जुड़ी है। 17 सितंबर को क्षत्रिय करणी सेना और 25 सितंबर को बैंक यूनियनों की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस से साफ कहा था कि आप प्रदर्शन के अधिकार पर पूरी तरह रोक नहीं लगा सकते; अगर जंतर-मंतर पर इजाजत नहीं दे रहे, तो वैकल्पिक जगह तय करना प्रशासन की जिम्मेदारी है।













































