Jallianwala Bagh: सिखों और अंग्रेजी हुकुमत के इतिहास को देखा जाये तो अंग्रेजी हुकुमत को भले ही काफी लंबा इंतजार करना पड़ा हो पंजाब पर कब्जा करने में, लेकिन वो ये जानते थे कि एक बार सिख सम्राज्य उनके अधीन हो गया तब सिखों की सारी ताकत भी उनके पास होगी। 1839 में महाराजा रणजीत सिंह जी की मृयु के बाद अंग्रेजो को मौका मिला और उन लोगो के कुछ भेदियों को अपने साथ मिला खालसा सेना में फूट पड़वा दी नतीजा पहले 1845 में और फिर 1849 में दो आंग्ल सिख युद्ध के बाद सिख साम्राज्य की सारी ताकत अंग्रेजी हुकुमत के पास चली गई। अंग्रेज हमेशा से काफी धूर्त थे… उन्हें पता था कि अगर वो सिखों को गुलाम बनाते है तो आज नहीं तो कल फिर से पंजाब उनके हाथों से निकल जायेगा..
इसलिए उन लोगो ने सिखों को सेना का हिस्सा बना दिया.. वो उन्हें युद्द और कूटनीति मामलों में आगे करने लगे.. जिसका नतीजा ये हुआ कि 1857 का क्रांति दबाने में सिखों ने अंग्रेजी हुकुंमत का साथ दिया था.. ताकि मुगल फिर से मजबूत न हो.. लेकिन 1919 में जलियांवाला में हुआ नरसंहार, सिखों के विश्वास को डगमगा गया। लेकिन उसके बाद क्या हुआ.. क्या सिखों को सोच बदली.. और अंग्रेजी हुकुमत के खिलाफ फिर क्या था सिखों की रणनीति।
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सिख सैनिको ने क्रांति को दबाने में अहम भुमिका निभाई – Jallianwala Bagh
1857 के युद्ध में सिख सैनिको ने क्रांति को दबाने में अहम भुमिका निभाई थी.. लेकिन अंग्रेजो मे हमेशा दलील दी कि वो एक मैत्रीपूर्ण शासन करना चाहते है.. 1914 में जब पहले विश्वयुद्ध का आगाज हुआ तब 13 लाख भारतीय सैनिको ने बढ़ चढ़ हिस्सा लिया था, और अंग्रेजी शासन की तरफ से यूरोप, अफ़्रीका और मिडल ईस्ट में तैनात होकर बहादुरी से ल़ड़े थे। इस युद्ध में करीब 43,000 भारतीय सैनिक युद्ध में शहीद हुए थे।.. इस समर्थन के बदले भारतीय लोग उम्मीद कर रहे थे कि अब ब्रिटिश हुकुमत सहयोग और नरमी से पेश आयेगी लेकिन ये उनकी गलत फहमी थी, उल्टा भारत की आजादी की लड़ाई को रोकने के लिए, आंदोलनो को रोकने के लिए ब्रिटिश सरकार ने मॉण्टेगू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार लागू कर दिया..
सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी – Jallianwala Bagh
पहले विश्वयुद्ध के दौरान गदर पार्टी जैसी आंदोलनकारी संगठन भी सक्रिय हो गए थे, पंजाब और बंगाल में अंग्रेजी हुकुमत शांति स्थापित करने मे फेल हो रही थी औऱ तब 1918 में एक ब्रिटिश जज सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में रॉलेट एक्ट लगाने की तैयारी शुरु हुई जो इस बात पर नजर रखती कि आखिर कौन कौन से संगठन है जो क्रांति को हवा दे रहे है। 19 मार्च 1919 को देश भर में रॉलेट एक्ट लागू कर दिया गया..लेकिन तब ये नहीं पता था कि अंग्रेजी हुकुंमत की दमनकारी नीतियों का ये तो केवल एक नमूना था.. देश भर में इसका विरोध हो रहा था, आजाद की मांग करने वाले सिख भी इसका विरोध कर रहे थे लेकिन जब आंदोलन के दो नेताओं सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर कालापानी की सजा दे दी गई तब पंजाब में बड़े स्तर पर विरोध शुरु हो गया.. और 13 अप्रैल 1919 को दोनो नेताओं की गिरफ्तारी के बाद ये आंदोलन और व्यापक हो गया।
डायल उनका कत्लेआम करने के इरादे से आया – Jallianwala Bagh
उस दौरान हजारो लोग अमृतसर के वैशाखी मेले में शामिल होने आये थे, वो भी जलियांवाला में जमा हो गए.. लेकिन तब किसी को नहीं पता था कि उस दिनो जो होने वाला था वो केवल भारत के ही नहीं ब्रिटिश इतिहास पर भी धब्बा लगाने वाला था। तत्कालिन ब्रिगेडियर जनरल रेजीनॉल्ड डायर 90 ब्रिटिश सैनिकों को लेकर वहां पहुँच गया। उस बाग बाग का फी सारे घरो से बीच में था जिससे गली काफा संकरी थी.. इसलिए डायल अपनी दो तोपो को छोड़ कर केवल हाथियारो से लैस सैना ले गया था। उन सब के हाथों में भरी हुई राइफलें थीं..तब नेताओं को ये अंदाजा नहीं था कि डायल उनका कत्लेआम करने के इरादे से ही आया था.. उसमे शांत भीड़ पर फायर करने का आदेश दे दिया.. एक पल में अफरा तफरी मच गई।
आकड़े बताते है कि दस मिनट में कुल 1650 राउंड गोलियां चलाई गई थी। । अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है, जबकि वहां मौजूद कुएं ये ही करीब 120 लाशें निकली थी, वहीं अमृतसर के तत्कालीन सिविल सर्जन डॉक्टर स्मिथ के अनुसार मरने वालों की संख्या 1800 से ज़्यादा थी.. और 3000 हजार से भी ज्यादा घायल थे। यानि की सही आकड़ो को आज भी छिपाया जा रहा है। ये हत्याकांड अंग्रेजी हुकुमत की दमनकारी नीतियों का पर्दाफाश कर गई.. पंजाब जो 1919 से पहले अंग्रेजी हुकूमत के साथ चलता था वो अब पूरी तरह से खिलाफ हो गया था। और भारत को आजाद कराने की लड़ाई में शामिल हो गया।
क्या हुआ 1919 के बाद – Jallianwala Bagh
कहा जाता है ये खबर जंगल की आग की तरह फैली थी, अब पंजाब का बच्चा बच्चा अंग्रेजी हुकुमत को उखाड़ फेंकने के लिए जलियांवाला बाग की मिट्टी को माथे से लगाकर आजादी की लड़ाई में शामिल होने लगे। पहली बार हुआ जब पंजाब पूरी तरह से गांधी जी के आजादी की लड़ाई में शामिल हुआ और 1920 में असहयोग आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। इतना ही नहीं उन्होंने गुरूद्वारो को अंग्रेजी हुकूमत से छुड़ाने के लिए अकाली आंदोलन शुरु किया.. और शिरोमणी गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन किया। सिख का एक बड़ा धड़ा अंग्रेजो के खिलाफ हो गया.. हालांकि दूसरे विश्वयुद्ध में सिखों ने युद्ध में हिस्सा लिया था.. लेकिन शायद ये अंग्रेजी हुकुमत के पतन की आखिरी कहानी थी।
जिसके प्रत्यक्षदर्शी सिख भी बनना चाहते थे। गुरुद्वारों का छिन जाना साफ था कि आर्थिक तौर पर पंजाब से अंग्रेर्जी हुकुमत को कुछ हासिल नहीं होगा। नजीता साफ था.. 1857 के बाद जहां अंग्रेजी हुकुमत 60 सालों तक फलती फूलती रही वहीं 1919 में जलियावाला हत्याकांड के बाद 3 दशक तक भी खुद को संभाल नहीं पाई थी। यानि की सिखों ने अगर 1857 में अंग्रेजी हुकुमत का साथ न दिया होता तो वो और पहले ही भारत से जा चुके होते.. लेकिन सिखों ने फिर से मुगलो को देश में स्थापित होते हुए देखने के बजाय उन्होंने अंग्रेजो का साथ दिया.. जो कहीं न कही भारत को आधुनिकता के रास्ते पर ले गए थे.. ये थी सिखों की दूरगामी सोच और उनकी बहादुरी का नतीजा।




























