Mohammed Rafi First Filmfare Award on Rejected tune: म्यूजिक कंपोजर्स की वो आइकॉनिक जोड़ी, जिसने दुनिया को एक से बढ़कर एक बेहतरीन धुनें दीं! लेकिन क्या आप जानते हैं कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की बनाई एक धुन को प्रोड्यूसर ने ‘कचरा’ कहकर रिजेक्ट कर दिया था? और ट्विस्ट देखिए, इसी ‘कचरा’ धुन पर मोहम्मद रफी ने गाया और अपने करियर का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड जीत लिया! तो चलिए इस लेख के जानते हैं इस ब्लॉकबस्टर गाने की पूरी कहानी।
धुन को बताया कचरा
बता दें कि साल 1964 में राजश्री प्रोडक्शंस एक खास फिल्म बना रहा था, जिसका नाम था ‘दोस्ती’। दो दोस्तों की बेमिसाल दोस्ती और गरीबी पर फिल्माई गई यह फिल्म आज भी लोगों की आँखों में आँसू ला देती है। दरअसल, इस फिल्म की कहानी इतनी इमोशनल थी कि इसके लिए बेहद खास म्यूजिक की जरूरत थी, लेकिन कोई भी बड़ा कंपोजर इसे हाथ लगाने को तैयार नहीं था।
ऐसे में, मेकर्स ने इस फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी उस वक्त की युवा संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल को सौंपी। काम मिलने के बाद लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने फिल्म के लिए कई बेहतरीन धुनें बनाईं, लेकिन प्रोड्यूसर ताराचंद बड़जात्या ने उनमें से एक धुन को ‘कचरा’ बताकर पूरी तरह रिजेक्ट कर दिया। पर असली ट्विस्ट तब आया, जब इसी रिजेक्टेड धुन पर मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी!
रफी साहब ने 1 रुपया ली थी फीस!
हुआ यूं कि प्रोड्यूसर के रिजेक्ट करने के बाद कंपोजर्स ने इस धुन को अलग रख दिया था। लेकिन जब मोहम्मद रफी साहब को इस फिल्म के बाकी गाने और धुनें सुनाई गईं, तो उन्हें संगीत बहुत पसंद आया। इसके बाद लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने झिझकते हुए कहा कि ‘एक और धुन है, जिसे प्रोड्यूसर साहब ने रिजेक्ट कर दिया है, आप इसे भी एक बार सुन लीजिए।’
रफी साहब ने जैसे ही वो धुन सुनी, वो इसके दीवाने हो गए और बोले- ‘इसे तुरंत रिकॉर्ड करो।’ जब प्रोड्यूसर इसके लिए तैयार नहीं हुए, तो रफी साहब ने इसकी पूरी जिम्मेदारी खुद ली। इस फिल्म की कहानी और गानों से रफी साहब को इतना लगाव हो गया था कि उन्होंने इस ब्लॉकबस्टर गाने के लिए सिर्फ 1 रुपया फीस ली थी!
मोहम्मद रफी को मिला पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड (Mohammed Rafi First Filmfare Award on Rejected tune)
ये तो हुई उस धुन को लेकर आए उतार-चढ़ाव की बात, अब बात करते हैं उस गाने की जिसमें इस धुन का इस्तेमाल किया गया। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे बोल और रफी साहब की आवाज से सजा वो गाना था— ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’। आपको जानकर हैरानी होगी कि इसी गाने के लिए मोहम्मद रफी को अपने करियर का पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था। फिल्म ‘दोस्ती’ को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता मिली और इसका म्यूजिक सुपरहिट रहा। आज दशकों बाद भी इस फिल्म के सभी गाने लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।
गाने का जादू आज भी नहीं हुआ कम
सच ही कहा गया है कि कला की असली कद्र समय और पारखी लोग ही तय करते हैं। प्रोड्यूसर का रिजेक्ट किया हुआ ‘कचरा’ आज भी संगीत की दुनिया का ‘कोहिनूर’ बना हुआ है। मोहम्मद रफी साहब का भरोसा और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के टैलेंट ने मिलकर साबित कर दिया कि जब दिल से कोई धुन बनती है, तो वो सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचती है। यही वजह है कि आज 60 से भी ज्यादा सालों बाद भी ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ का जादू कम नहीं हुआ है। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल की धुनों में आपका सबसे पसंदीदा गाना कौन सा है?






























