Guru Amar Das Ji : हम सिख धर्म को एक महान धर्म के रूप में देख सकते हैं जहाँ कोई भाई-भतीजावाद नहीं है.. सिर्फ़ काबिल ही वारिस होगा.. पिता के बाद बेटे को वारिस तभी चुना जाएगा जब वो गुरु साहिब के सभी टेस्ट पास कर लेगा.. जिसे गुरु चुनते हैं.. उसे भगवान चुनता है.. गुरु के शब्द भगवान के शब्द होते हैं.. फिर न खून के रिश्ते काम आते हैं और न दिल के.. सिर्फ़ सच्चे राजा का हुक्म चलता है.. सचखंड जाने से पहले, सिख धर्म के पहले गुरु, गुरु नानक देव जी ने अपने वादा किए बेटों लखमी दास और श्री चंद की जगह अपने एक शिष्य भाई लहना को अपना वारिस चुना था। यह घटना गवाह है.. अगर बेटा काबिल नहीं होगा तो उसे गुरु गद्दी नहीं मिलेगी.. इसी तरह, क्या आप सोच सकते हैं कि जो लोग कभी सिख धर्म के बारे में जानते भी नहीं थे.. वे गुरु नानक देव जी के भजनों से इतने प्रभावित हो जाएंगे कि वे न सिर्फ सिख बन जाएंगे बल्कि एक दिन तीसरे गुरु भी बन जाएंगे.. जी हां, हम बात कर रहे हैं गुरु अमरदास जी की.. जिन्हें देखते ही दूसरे गुरु अंगद देव जी ने अपना शिष्य बना लिया था।
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गुरु अमर दास जी सिख धर्म से कैसे जुड़े
सिख धर्म के तीसरे गुरु, जो 73 साल की उम्र में गुरु गद्दी पर बैठे, उन्होंने न सिर्फ़ सिख धर्म का प्रचार किया, बल्कि महिलाओं के लिए बराबरी की भी बात की। उन्होंने सिख धर्म का प्रचार करने के लिए 22 मंजी (प्रचार केंद्र) बनाए, और महिलाओं को सिख धर्म से जोड़ने के लिए पीढ़ी सिस्टम भी शुरू किया, जिसमें 52 महिला प्रचारकों को रखा गया। उन्होंने सती प्रथा का विरोध किया, इसे महिलाओं के लिए श्राप बताया, और विधवाओं की दोबारा शादी की वकालत की। उनका इतना असर था कि मुगल बादशाह अकबर भी गोइंदवाल में उनके दरबार में आते थे। गुरु अमरदास जी ने “पहले, फिर संगत” की प्रथा को बढ़ावा दिया, जिसका मतलब था “लंगर” की प्रथा, जिसे उन्होंने न सिर्फ़ ज़रूरी बनाया, बल्कि आपसी मेलजोल और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए यह भी तय किया कि जो कोई भी गुरु से मिलने आएगा, उसे पहले जाति-पाति का भेदभाव छोड़कर, सबके बीच बैठना होगा, और लंगर खाना होगा, तभी वे उनसे मिलने के लायक होंगे।
बीबी अमरो जी की गुरबानी
गुरु साहिब ने खुद आनंद साहिब प्रार्थना की रचना की थी, जिसे सिख समुदाय खुशी और आनंद के समय में पढ़ता है। गुरु नानक देव जी के भजन सुनकर उन्हें जो खुशी महसूस होती थी, ताकि उनके अनुयायी भी उस खुशी को महसूस कर सकें। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुरु अमर दास जी ने अपने जीवन के लगभग 6 दशक एक सच्चे गुरु की तलाश में बिताए। जब गुरु अमर दास जी 60 साल के हुए, तो वे अपने भाई के घर गए, जहाँ उनके भतीजे की बहू बीबी अमरो गुरु नानक देव जी के भजन गा रही थीं। बीबी अमरो दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी की बेटी थीं। बीबी अमरो जी गुरबानी को इतनी मधुरता से गाती थीं कि उन्हें सुनने वाले उनकी ओर खिंचे चले आते थे।
बीबी अमरो जी ने गुरु अमर दास जी को कैसे प्रभावित किया
उनकी शादी भाई मानक चंद के बेटे बाबा जस्सू जी से हुई थी। गुरु अमर दास जी उनके चाचा थे। हमेशा की तरह, बीबी अमरो उस सुबह गुरु नानक देव जी का भजन, ‘आसा दी वार’, बहुत सुरीली आवाज़ में गा रही थीं। जब गुरु अमर दास जी ने उन्हें सुना, तो वे खुद को रोक नहीं पाए और फूट-फूट कर रोने लगे। उन्हें लगा कि जिस आध्यात्मिक गुरु की उन्हें तलाश थी, वह अब पूरी होने वाली है। वे तुरंत बीबी अमरो के पास गए और भजन के बारे में पूछा। बीबी अमरो ने उन्हें प्यार और गर्व से बताया कि यह भजन उनके पिता के गुरु, गुरु नानक देव जी का है, जो उस गद्दी पर हैं जिस पर अब उनके पिता बैठते हैं।
12 सालों तक गुरु अमरदास जी गुरु साहिब की सेवा की
गुरु अमरदास जी ने तुंरत गुरु अंगद देव जी से मिलने की इच्छा जाहिर की.. औऱ वो बीबी अमरो के साथ ख़ड़ूर साहिब पहुंचे.. जब उन्होंने 35 से 40 साल के गुरु अंगद देव जी को देखा तो उनकी आभा को देखकर वो भावविभोर हो उठे.. वो उम्र का फासला भूल गए.. उन्हें उनका सच्चा गुरु मिल गया था.. तुरंत वो गुरु अंगद देव जी के चरणों में गिर पड़े। गुरु अंगददेव जी ने गुरु अमर दास जी को देखते ही पहचान लिया था कि वो अंहकार से रहित है.. जिनके अंदर केवल विनम्रता औऱ समर्पण ही शेष है। उन्होंने तुरंत गुरु अमर दास जी को शिष्य स्वीकार कर लिया.. करीब 12 सालों तक गुरु अमरदास जी गुरु साहिब की सेवा करते रहे।
गुरु साहिब ने अमरदास जी 12 वरदान दिए
एक बार ऐसे ही जब गुरु अमर दास जी 73 साल की उम्र में भी व्यास नदी से भारी मटके में पानी भर कर लाते देखा तो ताना मारते हुए निथावां कह कर बुलाने लगे.. जिसका मतलब होता है जो बेघर हो या जिसका कोई स्थाई ठिकाना न हो। गुरु साहिब को जब अपने भक्त के बारे में ये बात पता चली तो उन्हें बहुत दुख हुआ औऱ उन्होंने गुरु अमरदास को 12 वरदान दिये थे। गुरु अरदास की निश्छलता, गुरुघर के प्रति उनका सेवाभावना, उनका अंहकार रहित स्वाभाव देखकर गुरु साहिब को अहसास हुआ कि तीसरे गुरु के लिए वहीं सही उम्मीदवार है..और 73 साल की उम्र में उन्होंने गुरु गद्दी संभाली थी।
उन्होंने समाजिक सुधारक के रूप में जो छवि बनाई.. उसे सिख धर्म के लिए पत्थर की मील कहा जा सकता है। जिन्होंने सिख धर्म को एक महान धर्म बनाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। वो 95 सालों तक जीवित रहे थे औऱ 1 सितंबर 1574 में गोइंदवाल साहिब में ज्योति जोत में समा गए। उन्होंने भी परिवारवाद को मानने के बजाय अपने बड़े दामाद भाई जेठा जी कि शालीनता, सहनशीलता और अहंकार रहित स्वाभाव को देखते हुए उन्हें ही गुरु गद्दी सौंप दी थी.. जो आगे जाकर चौथे गुरु गुरु रामदास कहलायें।













































